श्रावण मास में भगवान शिव के रुद्राभिषेक का पौराणिक महत्व:
पौराणिक कथानक के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय हलाहल प्रचंड विष निकला तो, वहां पर उपस्थित सभी देव और असुर घबरा उठे और कितने के तो वही प्राण निकल गए, इस प्रकार से संपूर्ण ब्रह्मांड सहित सृष्टि में त्राहि त्राहि होने लगा। कोई भी देवता और असुर तथा अन्य शक्तिशाली लोग उस विष के दर्शन मात्र से अपने प्राण त्याग देते थे। तो, इसमें जीव जगत और अन्य दूसरे मनुष्य की बात ही क्या कही जाए। यानी संसार का संपूर्ण विनाश विष के रूप में जब समुद्र से निकला तो, उस समय इस संपूर्ण सृष्टि ब्रह्मांड तथा विश्व की रक्षा करने की ताकत किसी में नहीं थी। किंतु भगवान शिव ने संपूर्ण सृष्टि तथा संसार और जीव जगत मनुष्यों के कल्याण के लिए उस अत्यंत प्रचंड हलाहल विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। क्योंकि वह साधारण और कोई छोटा-मोटा विष नहीं था।
वह अत्यंत विकराल प्रचंड रूप में था। जिसके दर्शन से ही प्राण निकल जाते थे, उसे भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया। जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और भगवान महाशिव आदि देव नीलकंठ कहलाए। उस विष की तपिश को शांत करने हेतु देव समूह सहित संपूर्ण लोग भगवान शिव का अभिषेक करने लगे। देव दनुज मनुज सहित संपूर्ण भक्तगण भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने लगे। जिससे यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है और आज भी लोग श्रद्धा भक्ति भाव से आदि देव भगवान महाशिव का रुद्राभिषेक पूरे वर्ष कहीं ना कहीं किसी मौके पर करते ही रहते हैं किंतु, श्रावण महीने में पावन अभिषेक जरूर करते हैं। जिससे उनका परम कल्याण होता। इसमें कहीं कोई संशय नहीं है
श्रावण मास शुक्ल पक्ष के दो सोमवार में महायोग:
इस श्रावण मास के प्रथम और द्वितीय सोमवार कृष्ण पक्ष पर ग्रह नक्षत्रों का महासंयोग बन रहा है। पंचांग के अनुसार तिथि और योग आदि जो बन रहे हैं, बहुत ही ज्योतिषीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण और शुभ तथा सकारात्मक फल को देने वाले हैं। इसी प्रकार शुक्ल पक्ष के सोमवारों में भी बहुत अच्छा दुर्लभ योग बन रहा है।
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शुक्ल पक्ष श्रावण सोमवार में नाग पंचमी का महायोग:
श्रावण मास का तृतीय सोमवार शुक्ल पक्ष की पंचमी को चित्रा नक्षत्र में 17 अगस्त को पड़ रहा है। यहां पर तीसरे सोमवार में भी अद्भुत संयोग बन रहा है, यहां नाग पंचमी का महापर्व रहेगा। जिसे, संपूर्ण भारत में मनाया जाता है। इस दौरान नाग पंचमी होने से इस श्रावण के सोमवार का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इस श्रावण सोमवार का व्रत करने से क्योंकि नाग पंचमी भी है तो, इसके जातकों के या जातिकाओ के कुंडली में कालसर्प दोष होता है तो, भगवान शिव के परिवार के सहित नागों की पूजा उनकी विशेष अर्चना करने से कालसर्प दोष दूर हो जाता है। इस प्रकार से इस श्रावण सोमवार जो 2026 को 17 अगस्त को तीसरा सोमवार व्रत पड़ रहा है, बहुत ही महत्वपूर्ण है, इसकी पूजा विधि विधान के सहित करना चाहिए तथा भगवान शिव का रुद्राभिषेक करवाना चाहिए व्रत और उपवास के जो नियम है, उनका पालन भी करना चाहिए।
श्रावण महीने का अंतिम सोमवार विशेष योग:
24 अगस्त 2026 को अंतिम सोमवार यह भी द्वादशी तिथि में पड़ रहा है। जो, अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अंतिम सोमवार पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में पड़ रहा है, श्रावण शुक्ल पक्ष में यह सोमवार पड़ रहा है, जो इस श्रावण महीने का अंतिम एवं चौथा सोमवार होगा। इसमें पूजा पाठ भगवान शिव के रुद्राभिषेक के महत्व को कई हजारों गुना बढ़ा देता है। इस प्रकार से सोमवार के जो व्रत का महत्व है जो, रुद्राभिषेक भगवान शिव की पूजा और अर्चना का महत्व बहुत ही कल्याणकारी और सुख शांति धनेश्वर देने वाला मनुष्य के जीवन से दुख दर्द दूर करने वाला आयु आरोग्यता को देने वाला कहा गया है। इसलिए विधि विधान के साथ प्रत्येक व्यक्ति को भगवान शिव की पूजा अर्चना करना चाहिए। तथा सोमवार का व्रत भी करना चाहिए और रुद्राभिषेक भी करवाना चाहिए। अगर हो सके तो, संपूर्ण श्रावण के महीने भगवान शिव का रुद्राभिषेक और उनका पूजन करते रहना चाहिए। इस महीने में यदि पार्थिव शिवलिंग का पूजन किया जाता है या पूरे श्रावण महीने का व्रत नियम का पालन किया जाता है तो, अत्यंत दुर्लभ होता है, जिसके पूजन पाठ करने से व्यक्ति के जीवन के समूचे पाप रोग दोष नष्ट हो जाते हैं। व्यक्ति सुख शांति ऐश्वर्या पूरक जीवन जीता है। उसके कुंडली में जो उत्पन्न दोष है जो, अकाल मृत्यु का दोष, कालसर्प का दोष है, इस तरह से कई दोष श्रावण महीने की पूजा से नष्ट होते हैं। व्यक्ति को धर्म लक्ष्मी ईश्वर की प्राप्त होता है।
इस प्रकार से करें पूजा:
भगवान शिव की पूजा करने से पूर्व जैसे कि पहले बता जा चुका है, नियम में पवित्र आसमान आदि कर लें, इसके बाद भगवान शिव को अच्छी तरह से शुद्ध जल से स्नान करवा तथा उसके पश्चात दूध दही पंचामृत आदि से स्नान कराने के बाद उन्हें शुद्ध जल से स्नान कराएं फिर पुनः उन्हें चंदन लगाएं चंदन इस प्रकार से लगाए की शिवलिंग पर त्रिपुंड की आकृति बन जाएं। फिर अक्षत चढ़ाएं तथा विविध तरह के पुष्प माला और बेलपत्र शमी पत्र धतूरे के फूल आदि अर्पित करें और भोग लगायें दक्षिणा चढ़ाएं, कपूर से आरती करें। भगवान को भांग आदि अर्पित करें, इसके पश्चात उनकी प्रार्थना अर्चना करें।
पूजा और सोमवार व्रत के जरूरी नियम:
सोमवार के व्रत और प्रदोष व्रत में व्यक्ति को लहसुन प्याज हींग आदि तामसिक आहारों के सेवन से बचना चाहिए। दिन में व्रत करने के बाद संध्या काल में आरती पूजन के बाद फलाहार लेना चाहिए। जिसमें उबले हुए आलू भी शामिल हैं। मखाने की खीर तथा साबूदाना आदि की खीर का भी प्रयोग किया जा सकता है। सोमवार व्रत के समय प्यास लगने पर एक-दो घंटे के अंतराल पर पानी पी सकते हैं। इसमें कोई दोष नहीं होता है। जिससे शरीर में जो एनर्जी का लेवल है वह डाउन ना हो और आपको किसी तरह के कोई परेशानी ना हो इसका ध्यान रखें। यानी शरीर की क्षमता के अनुसार ही पानी का उपयोग करें, यानी उसका ज्यादा अंतराल उसी हिसाब से रखें, जिस हिसाब से आपकी शरीर की क्षमता हो। इस प्रदोष व्रत में या इस सोमवार में गन्ना का रस दूध आदि से भगवान शिव का रुद्राभिषेक करना चाहिए। भगवान के इस रुद्राभिषेक में रुद्राष्टाध्याई का पाठ किया जाता है। यह रुद्राभिषेक साधारण और नमक चमक तरीके दोनों तरीके से होता है।
रुद्राभिषेक का महत्व
श्रावण महीने में भगवान शिव के रुद्राभिषेक का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान शिव का रुद्राभिषेक अपने वांछित कामनाओं के लिए आप किसी भी पदार्थ जैसे दूध शहद गन्ने का रस, घी आदि किसी भी पदार्थ से कर सकते हैं। जो शास्त्रों में विहित है, उसके अनुसार आप द्रव्यों का चुनाव करते हुए भगवान शिव का अभिषेक करें और करवायें। भगवान शिव के ऊपर निरंतर धारा चलने से दूध या जल की धारा से अभिषेक करने से व्यक्ति का कल्याण होता था उसके वंश की वृद्धि बनी रहती है। उसका सदैव शुभ मंगल होता रहता है। वह यश कीर्ति का भागी होता है तथा दुख दरिद्रता का नाश होता रहता है और उसे दीर्घायु स्वास्थ्य धन सब कुछ प्राप्त होता है। यानि भगवान महादेव भोले भाले है, उसको उसकी सोच से अधिक बहुत कुछ दे देते हैं, जो उसकी किस्मत में नहीं था। उसको भी वह दे देते हैं। पर यहां श्रद्धा भक्ति विश्वास पूरक भगवान शिव का अभिषेक निश्चित रूप से करवाना चाहिए जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण आप देख सकते हैं।
पूजा हेतु सावधानियां
भगवान शिव की पूजा में विशेष रूप से आपको शुद्धता का ध्यान देना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करना और व्रत रखते हुए किसी से लड़ाई झगड़ा न करें, क्रोध से बचें। श्रद्धा विश्वास भक्ति पूरक भगवान की पूजा करनी चाहिए। ध्यान रहे तांबे के पात्र में भगवान शिव को दूध अर्पित ना करें, क्योंकि तांबे के पात्र में जो दूध अर्पित किया जाता है, वह विष के समान हो जाता है।
व्रत में प्रयोग किए जाने वाले फलहार
सावन सोमवार के व्रत के समय व्यक्ति को पूर्ण रूप से सात्विक रहते हुए व्रत करना चाहिए। इसमें भगवान के पूजन के पश्चात अपनी रुचि के अनुसार सात्विक दूध से बनी हुई मिठाइयां मेवे ताजे फल और जूस तथा शुद्ध गाय का दूध घी दही आदि का प्रयोग किया जाना चाहिए। यदि किसी कारण से आपको कमजोरी महसूस हो रही हो या शरीर स्वस्थ ना हो तो, ऐसे में कूटू के आटे का प्रयोग उपवास काल में संध्या के समय कर सकते हैं। इसी प्रकार अलग-अलग देश प्रदेश में जो प्रचलित नियम हैं, उनके अनुसार देश काल परिस्थित के अनुसार आप दूध घी और फलाहारों का प्रयोग कर सकते हैं। साबूदाना की खिचड़ी या खीर व्रत वाले नमक के साथ प्रयोग कर सकते हैं। व्रत तथा उपवास के दौरान नमक का प्रयोग कम से कम करना चाहिए। इस प्रकार संध्या काल की आरती और पूजन के बाद भगवान शिव की महिमा का वर्णन करना चाहिए। उनके मंत्र का जाप शिवाय नमः निरंतर करते रहना चाहिए। इसके पश्चात फिर पुनः विश्राम और रात्रि शयन करना चाहिए। प्रातः काल पुनः स्नान आदि पूजन के बाद अपने व्रत का पारण करना लेना चाहिए।
रुद्राभिषेक में सावधानियां
आदि देव भगवान महाशिव का रुद्राभिषेक बहुत ही महत्वपूर्ण और अत्यंत प्रिय अनुष्ठान होता है। इसमें व्यक्ति यदि लापरवाही या अनजाने जाने कोई गलती करता है तो, उसके विपरीत परिणाम और गंभीर परिणाम उसे मिल सकते हैं। इसलिए तांबे के लोटे का प्रयोग केवल जल चढ़ाने के लिए करना चाहिए। उसमें ना दूध दही घी पंचामृत और कोई रस डालकर भगवान शिव को अर्पित नहीं करना चाहिए। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जो तांबे के साथ अन्य पदार्थ की क्रिया होती है, वह जीवनी शक्ति को नष्ट करने वाली और विषाक्त चीजों को उत्पन्न करने वाली होती है। इसलिए इसके लिए चांदी के बर्तनों का ही प्रयोग या ऐसे बर्तन जो उन धातुओं से रासायनिक अभिक्रिया उत्पन्न ना करें।
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भगवान शिव की आरती कपूर से जरूर करना चाहिए।
पूजा के बाद पुष्पांजलि देना चाहिए और उन्हें प्रणाम करना चाहिए तथा परिक्रमा करने के बाद पुनः भगवान को प्रणाम करना चाहिए। भगवान शिव की आधी प्रदीक्षणा करना चाहिए। सोम सूत्र का लंगन नहीं करना चाहिए। अपनी भूल चूक की माफी मांगते हुए अपने पूजा का समर्पण भगवान को कर देना चाहिए। दान और दक्षिण का महत्वपूर्ण स्थान है इसलिए शिव की पूजा अर्चना या रुद्राभिषेक के बाद ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देना जरूरी होता है। दक्षिणा बिना और दान बिना जो यज्ञ जप तप पूजा आदि किए जाते हैं। वह तामसिक प्रवृत्ति में चले जाते हैं और उनका फल व्यक्ति को नहीं मिल पाता है। श्रद्धा भक्ति विश्वास पूरक भगवान शिव के श्रावण मास के नियमों का पालन करें और उनकी पूजा अर्चना रुद्राभिषेक जरूर स्वयं और घर के कल्याण के लिए करवाना चाहिए।
FAQS\ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-
Q1. श्रावण मास में रुद्राभिषेक क्यों किया जाता है?
An. पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने कंठ में धारण किया था। विष की तपिश शांत करने के लिए देवताओं ने उनका अभिषेक किया। इसी परंपरा से श्रावण मास में शिव रुद्राभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है।
Q2. सावन सोमवार में रुद्राभिषेक का क्या महत्व है?
An. सावन सोमवार भगवान शिव की पूजा और व्रत के लिए विशेष माना जाता है। इस दिन रुद्राभिषेक करने से सुख-शांति, आरोग्य, समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की धार्मिक मान्यता है।
Q3. श्रावण 2026 का तीसरा सोमवार कब है?
An. श्रावण मास का तीसरा सोमवार 17 अगस्त 2026 को है। इस दिन नाग पंचमी का संयोग भी रहेगा, जिससे धार्मिक दृष्टि से इसका महत्व और बढ़ जाता है।
Q4. श्रावण 2026 का अंतिम सोमवार कब है?
An. श्रावण मास का अंतिम सोमवार 24 अगस्त 2026 को पड़ेगा। इस दिन भगवान शिव की पूजा, व्रत और रुद्राभिषेक करना विशेष फलदायी माना जाता है।
Q5. रुद्राभिषेक में किन चीजों का प्रयोग किया जाता है?
An. रुद्राभिषेक में जल, दूध, दही, पंचामृत, शहद, घी और गन्ने के रस जैसे द्रव्यों का प्रयोग परंपरा के अनुसार किया जाता है। पूजा में बेलपत्र, पुष्प, अक्षत, धतूरा और शमी पत्र भी अर्पित किए जाते हैं।
Q6. क्या शिवलिंग पर दूध तांबे के पात्र से चढ़ाना चाहिए?
An. परंपरागत पूजा-विधि में तांबे के पात्र का प्रयोग मुख्यतः जल अर्पित करने के लिए किया जाता है। दूध, दही, घी या अन्य द्रव्यों के लिए उपयुक्त अन्य पात्र का प्रयोग करना बेहतर माना जाता है।



