नवरात्र में प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा 2026
हिंदू धर्म में भगवती की पूजा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। नवरात्र चाहे वसंत नवरात्र हो या फिर शरदीय नवरात्र हो, किंतु इसमें जो पूजा का विधान है, वह पहले देवी से ही शुरू होता है। पहले नवरात्रि की जो देवी है, उनका नाम मां शैलपुत्री है। शास्त्रों का कथन है कि, हिमालय राज की तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी पुत्री के रूप में उत्पन्न होने का उन्हें वरदान दिया था। अपने भक्त के वरदान को पूरा करने के लिए वहां पुत्री के रूप में हिमाचल के घर में उत्पन्न हुई। इन्हें पार्वती देवी भी कहा जाता है। शैल यानी हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण उन्हें शैलपुत्री भी कहा जाता है और इनका नाम पार्वती देवी भी है। पार्वती देवी संपूर्ण जगत की अधीश्वर देवी है। यह अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल पुष्प को धारण किए हुए हैं। जो माता के करुणा और स्नेह को दर्शाता है। यह रूप मूर्ति की क्षमता और शक्ति तथा सृजन की क्षमता को यह दर्शाता है, यानी इन प्रतीकों के द्वारा यह ज्ञात होता है कि, मानव मात्र का पालन करने वाली और सृष्टि का सृजन करने वाली जगत की अधिष्ठात्री मां शैलपुत्री है। तथा वृषभ की सवारी करती है और उनकी पूजा विधि विधान के द्वारा शास्त्रोक्त ढंग से की जाती है। भगवती मां शैलपुत्री की पूजा के लिए एक दिन पूर्व व्यक्ति को अपने मन में देवी की पूजा की प्रतिज्ञा करनी चाहिए। तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शुद्ध होकर स्नान आदि करने के पश्चात पूजन की सभी सामग्री को एकत्रित करते हुए माता की आराधना और पूजा करनी चाहिए।
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मां शैलपुत्री की पूजा का विधान और संकल्प के नियम:
मां शैलपुत्री की पूजा के जो विधान कह गए हैं, जैसे पवित्र होना, ब्रह्मचर्य का पालन करना और पूजन के लिए जो विहित सामग्री है, यानी पूजा राजसोपचार पंचोपचार अष्टोदश उपचार से किए जाने का विधान मिलता है। यानी आप जिस तरह की पूजा करना चाह रहे हैं। उसका परामर्श ब्राह्मण पंडितों से लेकर पूजन की सामग्री एकत्रित कर लें। यदि आप स्वयं पूजा करना चाह रहे हैं तो, पवित्र जल लेकर के अपने ऊपर छिड़क ले और तीन बार आचमन कर लें। तथा अपने आसन को भी पवित्र कर लें और ग्रंथि बंधन अपनी शिखा को बांध लें। इसके बाद प्राणायाम करें और हाथ धुल लें तथा अपने दाहिनी और घी का दिया रखें और उसे प्रज्वलित करें और धूप भी जला ले। इसके बाद मंगलाचरण और शांति के मंत्र पढ़ें। यदि मंत्र नहीं आते हैं तो, माता को प्रणाम करें और ऐसी भावना करें कि, हे माता मेरा सब प्रकार से आप कल्याण करें। मैं पूरे परिवार के साथ में आपकी शरणागत हूं।
पूजा के लिए प्रथम नवरात्र में संकल्प का विधान:
अपने हाथ में आप जल और पुष्प तथा कुछ दक्षिणा और पुंगी फल यानी सुपारी पान और दूर्वा रखकर प्रसन्न मुद्रा से आसन में सीधा आसन पर बैठ जाएं और भगवान विष्णु का तीन बार स्मरण करें। हरिओम विष्णु विष्णु विष्णु…इस तरह से जो नूतन संवत्सर है उसका उच्चारण करें तथा जो संकल्प के पूरे नियम हैं। उनका संपूर्ण उच्चारण करें और अपने नाम गोत्र तथा वांछित कामना का चिंतन करते हुए देवी से प्रार्थना करें कि, मेरी स्वास्थ्य की कामना धन की कामना पुत्र की कामना वांछित कामना को पूर्ण करें। मैं आपकी शरणागत हूं। और उस संकल्प को गणपति भगवान के पास छोड़ दे। इस प्रकार से पृथ्वी पूजन, गणपति पूजन और वरुण आदि कलश की स्थापना जिसे घट स्थापना कहा जाता है। करते हुए मातृका मंडल तथा सूर्य आदि नौ ग्रहों का मंडल चक्र बनाकर उसकी पूजा अर्चना करें। इसके बाद प्रधान देवी की आराधना मां शैलपुत्री की पूजा अर्चना करें।
मां शैलपुत्री की पूजा मैं पुष्प तथा वस्त्र और भोग प्रसाद:
मां शैलपुत्री पार्वती को प्रथम नवरात्रि के दिन श्वेत तथा गुलाबी पुष्पों और माला को अर्पित करना चाहिए। इन्हें दोनों ही तरह के पुष्प अत्यंत प्रिय होते हैं। ध्यान रहे, पुष्प सुगंधित और आकर्षक हो, मुर्झाए हुए और सुगंधहीन पुष्प को देवी में कभी ना चढ़ाएं। माता सफेद तथा हल्का गुलाबी वस्त्र भी धारण करती हैं। देवी शैलपुत्री दुर्गा को खीर, बर्फी, मालपुए तथा मीठे फलों का भोग लगाना चाहिए। जो फल मीठे हो, खट्टे फलों का भोग नहीं लगाना चाहिए। क्योंकि इन्हें इस तरह के फल और पुष्प अधिक प्रिय होते हैं। ऐसा शास्त्रों का कथन है। अतः इस प्रकार के वस्त्र आभूषण तथा भोग प्रसाद माता को अर्पित करना चाहिए।
प्रिय रंग और भोग प्रसाद:
रंगों की बात करें तो, माता को सफेद और हल्के गुलाबी रंग के वस्त्र आभूषण आदि बहुत ही पसंद होते हैं तथा भोग प्रसाद में खीर और मीठा प्रसाद तथा सूखे मेवे का प्रसाद भी अत्यंत प्रिया होता है। माता का पूजन उनका ध्यान करते हुए आसन के लिए सुगंधित पुष्प अर्पित करना चाहिए। तथा उनकी आरती करना चाहिए। अंत में उन्हें प्रणाम भी करना चाहिए। और हाथ में कुछ जल लेकर के पुनः उस पूजन का समर्पण माता को कर देना चाहिए।
मां ब्रह्मचारिणी नवरात्रि की द्वितीय देवी:
माता का यह रूप अत्यंत शक्ति से समृद्ध और कल्याणकारी है। इन्होंने तप बल द्वारा भगवान शिव को पाने के लिए कठिन तपस्या और भक्ति श्रद्धा विश्वास का अनुसरण किया। आदि देव महादेव जो अनंत हैं, अविनाशी हैं, उन्हें यह देवी भगवती पति के रूप में वरण करने के लिए अत्यंत कठिन तपस्या किया। इस कारण इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। माता के दाहिने हाथ में माला और बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित हो रहा है, यह नवरात्र महापर्व की प्रमुख द्वितीय देवी है। जो शक्ति और श्रद्धा तथा कल्याण को देने वाली है।
मां ब्रह्मचारिणी की पौराणिक कथा:
इस देवी शक्ति माता के विषय में पुराणों का अध्ययन यह बताता है कि, इन्होंने पार्वती के रूप में आदि देव महादेव को पाने के लिए अत्यंत घोर तथा कठिन तप किया था। इस ताप में उन्होंने पहले कंदमूल फल फूल का प्रयोग किया। किंतु जब उन्हें भगवान शिव नहीं मिले तो, उन्होंने अपने तपस्या को और घोर तथा अत्यंत कठिन बना दिया। जिसमें उन्होंने सभी तरह के पुष्प और यहां तक को जल को भी त्याग दिया। इसी तरह से हजारों वर्ष तक तप किया। जिस कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा जाता है।
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का महत्व:
देवी ब्रह्मचारी की पूजा से भक्तों को सुख समृद्धि तथा शारीरिक आरोग्यता प्राप्त होती है। धन का अभाव और गरीबी भी दूर होती है। व्यक्ति में बौद्धिक कौशल तथा शारीरिक शक्ति मानसिक शांति और उसका आत्मतत्व पुष्ट हो जाता है। अपने कल्याण की कामना तथा विश्व कल्याण के लिए माता के भक्तों के द्वारा प्रति नवरात्रों में उनकी विधवत पूजा अर्चना की जाती है। यह भक्तों के मनोवांछित फल देने वाली है।
मां ब्रह्मचारिणी के पूजा का संकल्प विधान:
देवी के इस शक्ति स्वरूप का पूजन और संकल्प है, वह पूर्व की तरह ही होगा। किंतु यहां संकल्प में वसंत नवरात्रि द्वितीय दिवस मध्ये प्रातः मध्यान और संध्या बेला आदि का उच्चारण अपने गोत्र और नाम के साथ करना अनिवार्य हो जाता है। यानी प्रत्येक नवरात्रि के प्रथम द्वितीय तृतीय चतुर्थ पंचम 6वां सातवां आठवां नवमं दिवस मध्ये तिथि दिन नक्षत्र योग करण आदि का उच्चारण समुचित रूप से कर लेना चाहिए। यानी सभी तिथियां में कौन से दिन और किस देवी की पूजा कर रहे हैं। किस तिथि के निमित्त तथा किस देवी की पूजा कर रहे हैं। भगवती आदि शक्ति दुर्गा के सम्मुख इसका संकल्प आपको प्रतिदिन ले लेना चाहिए। यही विधान रहेगा सभी देवियों के पूजन का संकल्प जो होगा उसमें।
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए वस्त्र तथा भोग:
इस देवी को विशेष रूप से जो भोग चढ़ाया जाता है, उसमें मेवे का प्रसाद तथा खीर इन्हें विशेष रूप से पसंद होती है। यह सफेद वस्त्र धारण करती हैं और सफेद तथा सात्विक चीजों का प्रयोग उन्हें अत्यंत पसंद होता है, अतः यह माता सुगंधित फूलों से और सात्विक प्रसाद से प्रसन्न होती है। अतः इनकी पूजा में सुगंधित पुष्प और सुगंधित मालाओं का प्रयोग करना चाहिए। विशेष रूप से इनको पसंद के अनुसार यदि फूल मिल जाएं तो उन्हीं का प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि इन्हें सफेद फूल अधिक पसंद होते हैं। जिसमें चमेली गुलदावरी के पुष्प में अधिक पसंद होते हैं। इसके अतिरिक्त माता को गुड़हल और कमल तथा गुलाब के भी पुष्प अर्पित किए जाते हैं। क्योंकि यह भी पुष्प देवी कोपसंद होते हैं। अतः ने भी चढ़ाया जा सकता है। इसी तरह माता को मीठे फल और स्वच्छ फलों को अर्पित करना चाहिए। ऐसे फल जो सड गए हो तथा उपयोग में आने वाले ना हो। उन्हें कदापि माता की पूजा में अर्पित ना करें।
मां ब्रह्मचारिणी के वस्त्र और रंग:
सफेद और गुलाबी रंग के वस्त्र अधिक पसंद होते हैं और देखा जाए तो सफेद रंग माता को अधिक पसंद होता है।
मां चंद्रघंटा:
इस मूर्ति को देवी का तृतीय स्वरूप माना जाता है। इस दुर्गा देवी के स्वरूप पर मस्तक पर अर्धचंद्र की आकृति के दर्शन होते हैं। जिस कारण इन्हें मां चंद्रघंटा कहा जाता है। क्योंकि यह अपने मस्तक पर अर्धचंद्र को धारण करती है। चंद्र मन और प्रकृति का अत्यंत निर्मल और सुकुमार रूप है। जो मन की निर्मलता और पवित्रा को दर्शाती है। यह देवी व्यक्ति के मनोरोगों और विकारों को दूर करती हैं। शरीर में उत्पन्न मानसिक डिसेबिलिटी को दूर करने में उनकी प्रथम और बहुत बड़ी भूमिका है। व्यक्ति के मन के विचारों की पवित्रता तथा उसके सोचने समझने की क्रिएशन की शक्ति मां चंद्रघंटा ही देती है। यह नवरात्रि महापर्व की तीसरी प्रमुख देवी है। भगवती आदि शक्ति दुर्गा का यह प्रमुख तीसरा स्वरूप है। जिसे तृतीय नवरात्र की पूजा की प्रमुख देवी के रूप में स्वीकार किया गया है। यह देवी भगवती माता सिंह की सवारी करती हैं तथा अपने सभी 10 हाथों में कई तरह के अस्त्र और शास्त्रादि धारण किए हुए हैं। जिसमें गदा, त्रिशूल तलवार आदि प्रमुख हैं, जो अधर्म का नाश करने वाले तथा धर्म की स्थापना का प्रतीक है। धर्म के सृजन के संकल्प को यह अस्त्र-शास्त्र देवी के रूप को दर्शाता है। भक्तजनों के कल्याण के लिए तथा उनके दुख और दरिद्र को नाश करने के लिए नकारात्मक शक्तियों से सदैव युद्ध यह देवी का रूप करता हुआ रहता है। जिससे देश ही नहीं, बल्कि विश्व के सभी भक्तों की रक्षा होती है और उनका परम कल्याण होता है। राक्षसों के लिए यह क्रूर तथा हमेशा उग्र बनी रहती है और भक्त जनों के लिए सौम्य तथा शुभ फलों को देने वाली कही जाती है।
मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा:
इस देवी दुर्गा के रूप की जो पौराणिक कथा है, उसके अनुसार जब भू लोक सहित देवलोक और स्वर्ग सभी लोको में महिषासुर का अत्याचार बढ़ गया था। उस समय इस भूमंडल सहित देवलोक में सभी लोग भय से आक्रांत होकर परम पिता ब्रह्मा से स्तुति करने लगे और इस कष्ट के निवारण हेतु उनसे स्तुति और प्रार्थना की। जिससे महिषासुर को ऐसा वरदान था कि, वह किसी के हाथों नहीं मारा जाएगा। जिस कारण से इसने बहुत भयानक उत्पाद मचाया जिससे देवराज इंद्र का भी सिंहासन हिलने लगा। यानी देवता भी इसके शक्तियों के आगे कमजोर पड़ने लगे और भयभीत होकर के परमपिता से स्तुति की।
तब उन्हें परम पिता ने देवी के अवतरित होने का वरदान दिया। जिससे सभी देवी देवताओं ने देवी के स्वरूप में अपने शक्ति को संग्रहित करके उसको अवतरित किया। भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल प्रदान किया और विष्णु ने चक्र इंद्र ने घंटा और भगवान सूर्य ने अपना तेज प्रदान किया। जिसे देवी ने धारण कर महिषासुर सहित अनेक असुरों का संघार किया। इसी प्रकार अन्य कथानक के अनुसार यह ज्ञात होता है कि, जब भगवान शिव रूद्र रूप में भूतो की बारात लेकर के पहुंचे तो देवी ने अपने अत्यंत सौम्य और आकर्षक रूप को धारण किया। जिससे वहां लोगों का भय समाप्त हुआ तथा भगवान शिव भी देवी के रूप को देखकर सौम्य रूप में आ गए।
मां चंद्रघंटा की पूजा 2026 का महत्व:
दुर्गा के इस तीसरी शक्ति की पूजा का नवरात्रि महापर्व में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। अतः इनकी पूजा में जिस प्रकार पूर्व में बताया गया था की पवित्रता शुद्धता श्रद्धा और ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। शक्ति के सृजन और सौम्यता की मूर्ति की उपासना परम कल्याणकारी और भक्तों का आनंद करने वाली, मंगल करने वाली तथा उनके सभी भय को मिटाने वाली इस देवी की पूजा को प्रत्येक भक्त को करना चाहिए। इसमें विविध प्रकार के सुगंधित पुष्प और माला अर्पित करना चाहिए।
मां चंद्रघंटा देवी के प्रिय रंग और भोग तथा वस्त्र:
इन्हें वस्त्र लाल पीले अधिक प्रिय होते हैं तथा सुनहरा रंग भी इन्हें बहुत प्रिय लगता है। अतः इस रंग के वस्त्र माता को अर्पित करना चाहिए। इसी तरह माता को पुष्प लाल रंग के पीले रंग के तथा सुनहरे रंग के पुष्प जो सुगंधित हो, मुरझाए हुए ना हो, उन्हें अर्पित करना चाहिए। माता को दूध से बनी हुई मिठाइयां खीर तथा ऐसे पंच मेवे और मिठाइयां जो शुद्ध हो और किसी तरह से उनमें अपवित्र चीज ना मिलाई गई हो वह माता को अत्यंत प्रिय होती है। इनकी पूजा में इस बात का भी ध्यान देना चाहिए।
मां कुष्मांडा: यह नवरात्रि के चतुर्थ देवी
मां कुष्मांडा: यह नवरात्रि के चतुर्थ देवी है। दुर्गा देवी के इस रूप का नाम कुष्मांडा है। जो चतुर्थ मूर्ति के रूप में इस संसार में पूजी जाती है। यह भक्तों का परम कल्याण करने वाली और उन्हें वांछित फलों को देने वाली कही गई है। यह संपूर्ण जगत का पालन करने वाली है और अपने शक्ति तथा समर्थ के कारण यह आदि देवी दुर्गा का चतुर्थ रूप संसार को उत्पन्न करने वाला कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार कुष्मांडा उस देवी का नाम है। जिसके उदर में यह संसार स्थित है। उस भगवती आदि शक्ति जगदंबा दुर्गा के चतुर्थ रूप को कूष्मांडा के नाम से जाना जाता है। यह नवरात्र की प्रमुख चतुर्थ देवी है। जिसकी शक्ति और मातृत्व से पूरा संसार अभिसंचित हो रहा है। तथा इस माता की कृपा दृष्टि से इस संसार का पालन और पोषण हो रहा है। उस देवी के परम ममतामयी और कल्याणकारी रूप को वेद शास्त्रों में कुष्मांडा की संज्ञा दी गई है।
यह सूर्य लोक की ऊर्जा को भी सृजित करने की क्षमता रखती है। इस देवी को संपूर्ण ब्रह्मांड के उत्पादक और उसे सृजित करने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता है। ऐसा शास्त्रों में वर्णन मिलता है। उससे अभिप्राय यह है कि जो छोटा सा संसार है, ऊष्म का अर्थ ऊष्मा अर्थात गर्मी या ऊर्जा से और अंड का अर्थ समूचे ब्रह्मांड से है। यानी जो माता समूचे ब्रह्मांड की उत्पादक है। जिस देवी की मूर्ति ने इस संसार के अंधकार को नष्ट करके जीवन को सृजित किया और ब्रह्मांड को उत्पन्न किया उस अष्टभुजी माता को कुष्मांडा देवी कहा जाता है। यह देवी अपने हाथों में नाना प्रकार के अस्त्र-शास्त्र को धारण करती है, जिसमें धनुष बाण चक्र गदा और अष्ट सिद्धि तथा नव निधि को देने वाली माला को धारण किए हुए है।
मां कुष्मांडा की पौराणिक कथा:
यह माता परम कल्याणमयी और करुणामई वत्सल से युक्त है तथा शांति और शक्ति को भक्तों को देने वाली कही जाती हैं। ऐसा शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि, यह संसार जब अंधेरे से ढका हुआ था तो इनकी कांति और दिव्य प्रभाव के कारण संसार का अंधकार दूर हुआ। क्योंकि यह सूर्य की ऊर्जा को सज्जित करने की शक्ति से युक्त हैं। यह देवी अपने सत्य के कारण संपूर्ण संसार को सुरक्षित करने वाली और ब्रह्मांड की रचना करने वाली प्रमुख शक्तियों में से एक है। यानी शास्त्रों का कथन है कि देवी संपूर्ण संसार को सृजित करने वाली है। अतः इसकी आराधना अत्यंत आवश्यक है। विश्व कल्याण तथा अपने कल्याण के लिए लोगों को इस देवी की आराधना सदैव करते रहना चाहिए।
मां कुष्मांडा की पूजा 2026 का महत्व:
इस देवी की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन में की जाती है। अतः पूर्व की भांति जैसे आपने प्रथम और द्वितीय तथा तृतीया नवरात्रि में शुद्धता पवित्रता और श्रद्धा का ध्यान दिया है। उसी प्रकार से इस देवी की पूजा में सभी नियमों का पालन करते हुए, इसकी पूजा करनी चाहिए यानी नियम और संयम का विशेष रूप से पालन करते हुए देवी की पूजा आराधना करनी चाहिए। उनकी पूजा में लाल रंग के पुष्प और सुगंधित इत्र इनको अर्पित करना चाहिए। मां कुष्मांडा की पूजा में बालि का विधान है, जिसमें कद्दू एक विशेष तरह का कद्दू होता है। जिससे बलिदान किया जाता है, उसका विधान मिलता है। इस माता की पूजा में इन्हें जल से स्नान दूध दही पंचामृत से स्नान और पूजन गंध अक्षत आदि अर्पित करना चाहिए।
मां कुष्मांडा के लिए प्रिय वस्त्र रंग भोग:
इस देवी की पूजा अर्चना में लाल रंग के पुष्पों का विशेष रूप से महत्वपूर्ण स्थान है। जो सृजनात्मकता की स्थिति को दर्शा रही है। इन्हें लाल रंग के पुष्प और पीले रंग के पुष्प अत्यंत प्रिय हैं। साथ ही में इन्हें कद्दू कि बलि भी बहुत प्रिय मानी जाती है। यह संसार के शक्ति को बढ़ाने वाली और जीवन देने वाली कही जाती है। रोग दुख दूर करने की इनमें अद्भुत क्षमता है। इनके भोग प्रसाद में बर्फी मिठाई और खीर आदि। शुद्ध दूध से बनी हुई मिठाइयों का प्रयोग किया जाता है। पंचमेवा आदि भी इन्हें बहुत प्रिय प्रिय है।वस्त्र लाल रंग के कह गए हैं। लाल और पीला रंग माता को अधिक प्रिय होता है। इसी रंग के वस्त्र भगवती देवी को अर्पित करना चाहिए। इन्हें हरा और लाल दोनों रंग ही पसंद है। यह प्रकृति की देवी और उत्पादक है। इसलिए इन रंगों से माता को सजाना चाहिए। इस रंग के वस्त्र माता को अर्पित करने चाहिए। दही मालपुआ भी इन्हें बहुत पसंद है। अतः इनके प्रसाद में दही मालपुआ का भोग भी लगाना चाहिए।
मां स्कंद माता:
मां स्कंद माता: भगवती दुर्गा की यह पांचवीं मूर्ति है। जो अपने शक्ति और समर्थ के कारण इस संसार में व्याप्त है। यह नवरात्रि की पांचवें क्रम की देवी है। इस देवी की पूजा अर्चना विशेष रूप से पांचवें दिन होती है। क्योंकि नवरात्रा की पांचवें दिन की प्रधान देवी यही है। सनत कुमार को अपने तेजो बल से उत्पन्न करने के कारण इस देवी का नाम स्कंद माता है। क्योंकि सनत कुमार का एक नाम स्कंध है। इसलिए इनका नाम स्कंद माता पड़ा, क्योंकि इन्होंने सनत कुमार को उत्पन्न किया था। जिस कारण से इन्हें स्कंद माता भी कहा जाता है। स्कंद माता को मां पार्वती भगवती देवी भी कहा जाता है। इसी प्रकार स्कंध का और एक नाम जो प्रसिद्ध है उसे कार्तिकेय भगवान कहा जाता है। भगवान कार्तिकेय को अलग क्षेत्र में अलग-अलग नाम से भी जानते हैं। माता ने तारकासुर का अत्याचार समाप्त करने के लिए इन्हें उत्पन्न किया था। जिससे इन्होंने तारकासुर से युद्ध किया और यह देवताओं के सेनापति नियुक्त हुए, भगवान स्कंद देवी की कृपा से परम शक्तिशाली और देवताओं के सेनापति तथा युद्ध कौशल में बहुत ही दक्ष हैं। स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं।
यानी यह मूर्ति चतुर्भुजी देवी के रूप में नवरात्रि के पांचवें दिन पूजी जाती है। नवरात्रि के पांचवें दिन की प्रमुख और प्रसिद्ध देवी का नाम ही स्कंद माता है। यह भक्तों को अभीष्ट फल देने वाली है। माता अपने अलग-अलग भुजा में वर मुद्रा तथा श्वेत पुष्प को धारण किए हुए हैं। भगवान स्कंद को अपने गोद में लिए हुए है। इस कारण से यह माता स्कंद माता के रूप में इस संसार में प्रसिद्ध हुई। इनकी पूजा से व्यक्ति का परम कल्याण होता है ।धनेश्वर और शक्ति तथा सुंदर संतान उसे प्राप्त होती है। संतान सुख भगवती की कृपा से व्यक्तियों को इस संसार में मिलता है।
भगवती स्कंध देवी की पौराणिक कथा:
शास्त्रों के अनुसार इस धरती में जब असुरों का आतंक बढ़ने लगता है। तथा राक्षस गण धरती में उत्पातों और दुष्ट कृत्य करते हैं, सज्जनों को पीड़ा पहुंचाते हैं। उनके कृतों से घोर अन्याय और अनर्थ उत्पन्न होता है। धरती में धर्म पर संकट आ जाता है। धर्म पर अधर्म का बोलबाला होने लगता है। तथा लोग शास्त्र के विरुद्ध आचरण मनमानी तरह से स्त्री पुरुष करने लगते हैं। तब इस धरती में मनुष्य के कल्याण के लिए और जीवन तथा धर्म की रक्षा के लिए संस्कृत और संस्कारों की रक्षा के लिए देवी देवता इसी तरह से किसी अवतार को उत्पन्न करते हैं। जिससे मानव मात्र का ही नहीं बल्कि संपूर्ण संसार का कल्याण होता है। इसी क्रम में भगवती देवी ने संसार से अत्याचार को मिटाने राक्षसों को उनके अत्याचारों का दंड देने के लिए इन्हें उत्पन्न किया था। जिस कारण से इनका नाम स्कंद माता पड़ा। भगवान स्कंद देवताओं के सेनापति के रूप में नियुक्त हैं। भगवान स्कंद की रक्षा करने के कारण और उन्हें उत्पन्न करने के कारण भगवती का यह नाम पड़ा। जिसे स्कंद माता कहा जाता है।
भगवती स्कंद माता की पूजा 2026 का महत्व:
नवरात्रि के पांचवें दिन की प्रमुख देवी के रूप में स्कंद माता की पूजा और अर्चना वंदना की जाती है। यह भक्तों के मनवांछित फलों को देने वाली पुत्र पुत्र तथा संतति वृद्धि को देने वाली कही जाती है। इनकी पूजा के लिए पूर्व की तरह शुद्धता और पवित्रता का ध्यान देना चाहिए। तथा पूरे श्रद्धा और विश्वास के साथ उनका पूजन अर्चन करना चाहिए। माता की पूजा में सुगंधित पुष्प और दूध से बनी हुई स्वच्छ मिष्ठान भोग फल फूल आदि अर्पित करने का विधान होता है। इसमें पवित्रता ब्रह्मचर्य और श्रद्धा का पालन बहुत जरूरी है। क्योंकि शक्ति के अर्जन में संयम और श्रद्धा विश्वास तथा आत्म बल का होना बहुत जरूरी है। यदि व्यक्ति भगवती मां की पूजा में अपने आत्मविश्वास संयम और नियम को तोड़ देता है तो, उसे इस पूजा का जो फल मिलना चाहिए वह उसे काफी दूर रह जाता है। भगवती स्कंद माता की पूजा का शास्त्रों में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। पांचवें दिन की पूजा उनके बिना अधूरी और अपूर्ण मानी जाती है।
स्कंद माता भगवती देवी के लिए प्रिय भोग पुष्प और रंग:
देवी मां के इस रूप को बर्फी पीले लड्डू, केसरिया खीर मेवा मिष्ठान, दूध दही घी शहद माता को विशेष प्रिय होती है। यानी इनका इन चीजों से प्रसाद तैयार होना चाहिए भोग लगाना चाहिए। उसका रंग केसरिया और लाल दोनों तरह से हो सकता है। सफेद मिष्ठान्न भी माता को बहुत प्रिय है। माता के वस्त्र और रंग की बात करें तो, उनके वस्त्र लाल सफेद और हरे रंग के वस्त्र इन्हें अत्यंत प्रिय होते हैं। यह संसार की रक्षा करने वाली और वात्सल भाव से संसार का पालन पोषण करने वाली माता कही गई है। अपने भक्तों की रक्षा अपने पुत्र की तरह करती हैं, उन्हें किसी भी संकट और दुख से बचाने के लिए माता सदैव तत्पर रहती है। अतः प्रत्येक भक्त को देवी को उनके पसंद के भोग अर्पित करना चाहिए। पीले रंग के पुष्प लाल रंग के पुष्प सफेद रंग के पुष्प अत्यंत प्रिय होते हैं। उन्हें सुगंधित माला और पुष्प जरूर अर्पित करना चाहिए। देवी भगवती को गुड़हल का फूल भी चढ़ाया जाता है। इन्हें खुशबूदार पुष्प और इत्र तथा सुंदर आकर्षक माला और वस्त्र आभूषण भी बहुत प्रिय होते हैं। अतः श्रद्धा विश्वास परक माता की पूजा प्रत्येक व्यक्ति को अपने तथा परिवार के कल्याण के लिए करना चाहिए।
मां कात्यायनी:
मां कात्यानी देवी नवरात्रि की छठवीं देवी के रूप में इस संसार में विख्यात है। तथा कात्यायनी को भक्त बड़ी ही श्रद्धा विश्वास के साथ पूजते हैं। उनकी उपासना करते हैं और उनकी भक्ति भी करते हैं। मां कात्यानी के दर्शन के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। शास्त्रों के अनुसार देवताओं के अभीष्ट कार्य को सिद्ध करने के कारण उनका कात्यानी नाम पड़ा। यह है नवरात्रि पूजा के छठवें कम की प्रधान देवी और इसकी प्रमुख देवी के रूप में पूजा अर्चना की जाती है। नवरात्रि के छठवें कम की देवी की यह मूर्ति बहुत ही कल्याणकारी और मनुष्यों का ही नहीं बल्कि देवताओं का भी परम कल्याण करने वाली यह देवी की मूर्ति है। अपने भक्तों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने और उनके कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहने के कारण इन्हें कात्यानी यानी कार्य को सिद्ध करें, वही कात्यानी देवी कहलाती है।
महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट होने के कारण इनका नाम कात्यानी पड़ा। ऐसा भी कहा जाता है कि महर्षि कात्यायन इन्हें अपनी पुत्री के रूप में मानते थे। इसी कारण इस जग में कात्यानी के रूप में माता अवतरित हुई और इन्होंने महर्षि कात्यान को वरदान दिया था। जिस कारण इन्हें कात्यानी देवी कहा जाता है। मां कात्यानी चार भुजाओं वाली है तथा अभय मुद्रा वर मुद्रा और कमल पुष्प आदि अपने हाथों में धारण किए हुए हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि यह ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी है। माता का स्वरूप अत्यंत स्वर्णिम आभा वाला और प्रखर दिव्य तेज से युक्त है। यह माता सिंह में सवार होती है तथा अपने हाथों में क्रमशः वर मुद्रा कमल पुष्प और तलवार से सुशोभित है।
मां कात्यानी की पौराणिक कथा:
पौराणिक कथानक के अनुसार यह ज्ञात होता है कि, देवी भगवती ने महिषासुर के अत्याचार से देवताओं को मुक्ति दिलाई थी। ऐसा कहा जाता है कि, जब महिषासुर ने तपस्या के बल से ब्रह्मा आदि देवताओं से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया कि, उसे कोई भी देवता पराजित ना कर सके। इस वरदान के मद में चूर महिषासुर ने इस धरती में बहुत बड़ा अत्याचार किया तथा उसके अत्याचार से देवलोक भी पीड़ित हो गया।
जिससे महिषासुर के अत्याचार को समाप्त करने के लिए कठोर तप किया। इस तप के द्वारा देवी को प्रसन्न किया। जिससे देवी उनके यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई और यह वरदान दिया कि मैं, महिषासुर के आतंक को समाप्त करके इस ब्रह्मांड धरती में पुनः धर्म की स्थापना करूंगी। इसी कारण देवी नवरात्रि के छठवें दिन उत्पन्न हुई और उसकी पूजा आराधना की जाती है तथा तीन दिन की पूजा स्वीकार करने के पश्चात देवी ने महिषासुर का वध कर दिया था जिससे इनका नाम महिषासुर मर्दिनी भी है।
मां कात्यायनी की पूजा 2026 का महत्व:
देवी की इस मूर्ति की पूजा का बहुत बड़ा महत्व है। जिस प्रकार से पूर्व के पांच दिनों में श्रद्धा विश्वास भक्ति और नियम संयम का पालन किया गया था। इस प्रकार इस पूजा में भी श्रद्धा विश्वास और पवित्रता का ध्यान रखते हुए अपने पूजा का संकल्प लेते हुए प्रत्येक मनुष्य को उनकी पूजा करनी या करवानी चाहिए। क्योंकि यह देवी भक्तों का परम कल्याण करने वाली और देवताओं के कार्य को सिद्ध करने वाली है। असुरों का अत्याचार धरती से तथा स्वर्ग लोक में समाप्त हो जाए। जिससे धर्म की स्थापना हो और अधर्म का नाश हो। अतः देवी ने अपने दिव्य शक्ति के द्वारा देवताओं और महर्षियों का कार्य सिद्ध किया वही भक्तों का कार्य भी सिद्ध किया। जिससे इन्हें इस संसार में कात्यानी के नाम से पूजा जाता है। उनकी स्तुति और अर्चना की जाती है।
प्रत्येक व्यक्ति को अपने तथा परिवार के कल्याण हेतु देवी की पूजा अर्चना करनी चाहिए। देवी का यही रूप अत्यंत दिव्य और स्वर्णिम आभा से युक्त है। देवी की पूजाज्ञसे अविवाहित लड़कियों को योग्य और सुंदर पति प्राप्त होता है। अतः उनकी पूजा से सभी भक्तों को मनवांछित फल प्राप्त होते हैं। जो सौभाग्य की इच्छा रखती हैं स्त्रियां उनका सौभाग्य बना रहता है। और जो पुत्र की कामना करते हैं, उन्हें पुत्र धन आदि सब कुछ प्राप्त होता है । अतः देश-विदेश में विश्व की कल्याण की कामना से देवी की पूजा करना परम आवश्यक है सभी के लिए।
मां कात्यानी के प्रिय भोग पुष्प और वस्त्र तथा रंग:
जिस प्रकार से देवी के अन्य रूपों में भी पीले पुष्पों का वर्णन आता है और सुनहरे तथा गुलाबी पुष्पों का वर्णन आता है। उसी प्रकार इस मां के ध्यान पूजा में भी पीले पुष्पों का विशेष महत्व है और इन्हें हल्दी भी चढ़ाई जाती है। यह जगत का परम कल्याण करने वाली है। इनके प्रिय भोग में पीली मिठाइयां सफेद मिठाइयां और कई तरह के मेवे का भोग लगाया जाता है। शहद भी इन्हें बहुत प्रिय होता है। माता को चने और हलवा पुरी का भी प्रसाद प्रिय होता है। खीर और दूध से बनी हुई मिठाइयां और पके हुए फल केले आदि अत्यंत प्रिय होते हैं। माता पीले तथा गुलाबी रंग के वस्तुओं को धारण करती है और इन्हें यही रंग ज्यादा प्रिय लगते हैं।
मां कालरात्रि:
मां कालरात्रि: यह भगवती दुर्गा की सातवीं मूर्ति के रूप में इस संसार में सार्वभौम विख्यात है। यह अपने शक्ति और कल्याण के कारण इस संसार में पूजी जाती है। यह नवरात्रि महापर्व की सातवें क्रम की सबसे प्रमुख और प्रधान देवी दुर्गा का विग्रह है। यानी इसकी पूजा नवरात्रि में सातवें दिन में होती है। इस माता का रूप उग्र और भयानक तथा परम क्रोधित दिखाई देता है। यह राक्षसों का नाश करने के लिए और उग्र रूप धारण करती हैं। जिससे राक्षसों का समूल नाश हो जाता है। माता की आंखें अत्यंत चमकीली और इनका रूप सांवला काला तथा कुछ नीला प्रतीत होता है। इसे कालों की भी काल कहा जाता है। यह त्रिनेत्र देवी अपने नेत्रों के द्वारा तीनों काल, यह तीनों लोक को सुरक्षित करने और उसका उत्थान करने की शक्ति रखती हैं। इनके नाशा छिद्र से भीषण अग्नि की ज्वालाएं उत्पन्न होती रहती है।इस देवी का वाहन गधा माना जाता है। यह गधे पर सवार होकर के अपने भक्तों का कल्याण करती हैं तथा राक्षसो के समूह का नाश करने की शक्ति रखती है। राक्षसों का नाश करने के कारण तथा भक्तों के भय और उनकी नकारात्मक को दूर करने के कारण इन्हें शुभाकरी कहा जाता है। यह चतुर्भुजी मूर्ति है, जो मुंड माला को धारण करती है। इनकी पूजा से मनुष्य के जीवन से भय और नकारात्मक शक्ति का नाश होता है। अतः इनकी पूजा श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रत्येक व्यक्ति को करना ही चाहिए।
माता का रूप भक्तों के समस्त भय को हरने वाला और उनका परम कल्याण करने वाला माना जाता है। काली की पूजा से व्यक्ति के जीवन से समस्त रोग और भय दूर होते हैं तथा उन्हें सुख समृद्धि ज्ञान और सद्बुद्धि प्राप्त होती है। भूत प्रेत राक्षस आदि और जो नकारात्मक चीज हैं, जीवन से वह भय नष्ट हो जाता है। राक्षसों और नकारात्मकता को मार देने के कारण ही इन्हें कालरात्रि कहा जाता है। जो राक्षस मनुष्यों का और भक्तों का काल बन करके उनके जीवन के आनंद को और उनके जीवन को खराब करते हैं, तथा उन्हें रोग पीड़ा दे देते हैं। ऐसे कालों के भी काल को मारने के कारण इनका नाम कालरात्रि पड़ा।
मां कालरात्रि की पौराणिक कथाएं:
इस देवी की सातवीं मूर्ति के विषय में ऐसा कहा जाता है कि, रक्तबीज नाम के राक्षसों के द्वारा इस संसार के लोगों को पीड़ित किया जाने लगा। विशेष रूप से मां के भक्त और देवलोक इससे पीड़ित हो गए। तथा इस संसार में अधर्म और अत्याचार बढ़ने लगा। धर्म की हांनि होने लगी, धर्म को मानने वाले लोग परेशान होने लगे। तब देवी ने अधर्मी तथा दुष्ट राक्षसों का वध करने के लिए इस रूप को धारण किया। क्योंकि रक्तबीज नामक दैत्य को पूर्व काल में वरदान मिला हुआ था। देवताओं के हाथों से वह मारा ना जाएं। यदि कोई देवता उस पर प्रहार करता है तो, उसके शरीर के रक्त से जो भी रक्त बिंदु जमीन पर गिरेंगे उनसे पुनः प्रत्येक बूंद से उतने ही रक्त बीज राक्षस उत्पन्न हो जाएंगे। यदि उनका कोई संघार कर सकता है, तो कोई कन्या ही कर सकती है।
अतः इस कारण भगवती कालरात्रि को यह रूप धारण करना पड़ा।क्योंकि भगवती कालरात्रि ने देवताओं और महर्षियों की तपस्या से प्रसन्न होकर के उन्हें यह वरदान दिया था। कि मैं अपने कालरात्रि के रूप में जब अवतरित होकर ऐसे राक्षसों का विनाश करूंगी। अतः देवी ने रक्तबीज को युद्ध मैं जब घायल किया। जिससे उसके शरीर से रक्त जमीन पर गिरता था। उसे अनेकों रक्त बीज उत्पन्न हो जाते थे। जिससे देवी को इस उग्र रूप को धारण करना पड़ा और उसकी रक्त की बूंद जमीन में गिरने से पहले ही देवी उसे अपने खप्पर में ले लेती थी और उसका पान कर लेती थी जिससे उसका वध हो सका।
मां कालरात्रि की पूजा 2026 का महत्व:
देवी दुर्गा के इस मूर्ति की पूजा अर्चना का जो विधान है, वह अत्यंत समृद्ध और सुख शांति को मनुष्य के जीवन में निर्मित करने वाला है। इस देवी दुर्गा कालरात्रि की पूजा से मनुष्य के सभी रोग भय दुख दरिद्रता नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य जीवन में सुख शांति और ऐश्वर्यादि का भागी बनता है। उसके जीवन में आ रही नाना तरह की कठिनाई और शत्रु बधाएं रोग भूत प्रेत की बाधा सब तरह की बाधा मां की पूजा से नष्ट होती है। व्यक्ति का जीवन धन-धान्य से पूर्ण हो जाता है और पारिवारिक कुशलता को देने वाला होता है। मां की पूजा का विधान जैसे की पूर्व के दिनों में एक से 6 दोनों का जो विधान है, यानी विशेष रूप से पवित्रता श्रद्धा विश्वास और भक्ति भावना के साथ करना चाहिए। मां की पूजा में सुगंधित पुष्प लाल पुष्प और मेवे मिष्ठान पके हुए फल अनार नारियल चुनरी रोली मॉली आदि से पूजा करने का बहुत बढ़िया और सुंदर विधान मिलता है।
भगवती की पूजा प्रत्येक भक्तों को अपने तथा परिवार के कल्याण के लिए करना चाहिए। इसी प्रकार रोग और बीमारियों को दूर करने के लिए तथा संसार से भय और अत्याचार मिटाने के लिए शासन और प्रशासन को भी इस देवी का अनुष्ठान शास्त्रीय ढंग से विद्धवत रूप से प्रतिवर्ष प्रति नवरात्र में करवाना चाहिए। माता की पूजा का जो संकल्प का विधान है। पूर्व की तरह ही है। उसमें जैसे बताया गया था भक्तों को अपने हाथ में द्रव्य दक्षिणा। अक्षत पुष्पादि लेकर के अपने गोत्र आदि का संकल्प करते हुए भगवान के नाम का उच्चारण करते हुए संकल्प को पूरा करना चाहिए।
मां कालरात्रि के लिए प्रिय भोग और रंग तथा वस्त्र और पुष्प:
देवी के इस मूर्ति की पूजा के लिए विशेष रूप से जो भोग और प्रसाद का प्रयोग किया जाता है। उसमें देवी को प्रिय लगने वाले प्रसाद में दूधसे बनी हुई मिठाई गन्ने का रस शहद और गुड़ से निर्मित भोग प्रसाद देवी को अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। देवी को पीले रंग के पुष्प लाल और सफेद रंग के पुष्प तथा कृष्ण रंग के पुष्प भी अत्यंत प्रिय होते हैं। देवी के जो रंग हैं, वह पीले लाल और सफेद रंग अधिक उन्हें प्रिय होते हैं। काले वस्त्र भी देवी को अत्यंत प्रिय और पसंद होते हैं। यानी जो रंग देवी को प्रिय है इस तरह के वस्त्र तथा आभूषण अर्पित करने चाहिए। अतः देवी की पूजा और आराधना के वक्त इस तरह की वेशभूषा और वस्त्रो का प्रयोग अत्यंत उत्तम और शुभ माना जाता है। इससे यह जल्दी ही प्रसन्न होती है। इन्हें नारियल और मिश्री आदि का भोग भी लगाया जाता है। इस देवी को पान बतासे और लौंग इलाइची आदि तांबूल फल जिसे कहा जाता है अत्यंत प्रिय होते हैं।
मां महागौरी: दुर्गा देवी की इस मूर्ति का नाम महागौरी है जो नवरात्रि के आठवें दिन की प्रधान देवी है। इस आठवी नवरात्र में इस देवी को प्रमुख रूप से प्रधान पीठ पर स्थापित किया जाता है। देवी की मूर्ति और प्रतिमा को प्रधान पीठ पर स्थापित करके इसकी पूजा और अर्चना विशेष रूप से की जाती है। दुर्गा देवी की मूर्ति की पवित्रता और अत्यंत गौर वर्ण होने के कारण इन्हें गौरी रूप प्राप्त हुआ। इन्होंने अपने साहस और शक्ति के बल से असुरों का संघार किया। देवी गौरी का रूप है, पार्वती माता शक्ति का ही रूप है, इन्होंने भगवान आदि देव महादेव को पति के रूप में पाने के लिए तथा संसार के कल्याण के लिए अत्यंत कठिन और घोर तप किया था। अत्यंत कठोर तप के कारण इनका शरीर गौर वर्ण से कृष्णा वर्ण हो गया था। किंतु उनकी तपस्या से भगवान प्रसन्न होकर आदि देव महादेव ने पुनः उनके शरीर को पहले जैसे कर दिया।
यह चार भुजाओं वाली देवी इस संसार में भक्तों का कल्याण करने वाली और श्रद्धा विश्वास से भक्तों के द्वारा पूजी जाने वाली है। अपने भक्तों का परम कल्याण करने के लिए यह देवी अपने हाथों में त्रिशूल डमरू अभय और वर मुद्रा को धारण किए हुए हैं। जिससे मनुष्य सहित देवताओं का भी कल्याण होता है, विश्व ही नहीं ब्रह्मांड का भी दुर्गा देवी के द्वारा कल्याण अनवरत रूप से होता है। गौरी देवी वृषभ वाहिनी कहलाती है।
मां गौरी की पौराणिक कथा:
जब संसार और देवलोक में शुभ और निशुंभ नाम के असुरों ने देवलोक तथा मृत्यु लोक में उत्पात मचाया जिससे संपूर्ण जगत त्राहि त्राहि करने लगा। क्योंकि उन्हे ब्रह्मा जी से ऐसे वरदान प्राप्त हुए थे कि, उन्हें कोई भी देवता और शक्ति कभी मार ही नहीं सकती है। जिससे वह तीनों लोक में अत्याचार और अधर्म करने लगे। इस अत्याचार और अधर्म से दुखी संपूर्ण देवताओं से प्रार्थना की तथा ब्रह्मदेव ने उन्हें यह उपदेश दिया कि यदि इन असुरों का कोई विनाश कर सकता है, तो मां भगवती पार्वती का गौर वर्ण और कुंवारी कन्या के रूप में ही कर सकता है। गौरी का ऐसा रूप जो परम तपस्या और अत्यंत प्रतिभा से युक्त तथा गौर वर्ण हो वही शक्ति वही देवी इस असुर कुल का विनाश कर सकती है। जिससे देव और महर्षियों ने देवी की स्तुति की और देवी ने प्रसन्न होकर के शुभ और निशुंभ जैसे असुरों का संघार किया। जिससे संसार का कल्याण हुआ। क्योंकि देवी दुर्गा के इस रूप ने अनेकों राक्षसों का संघार किया तथा इस संघार की प्रक्रिया में देवी दुर्गा ने अत्यंत क्रोधित होकर हुंकार भरते हुए अनेकों राक्षसों को मार दिया। उनके क्रोध और तपस्या के कारण उनका शरीर काला पड़ गया। जिससे वह काली कहलाई किंतु जब असुरों का वध पूर्ण हो गया और उनके क्रोध अग्नि शांत हुई, जिससे वह पुनः अपने गौर वर्ण में विद्यमान हो गई। वही गौरी माता का रूप महागौरी जी है। जो परम कल्याणकारी और धन-धन को देने वाला है, भक्तों के मनो वांछित इच्छाओं को पूरा करने वाला है।
महागौरी के प्रिया भोग वस्त्र आभूषण और रंग:
इस देवी की मूर्ति के द्वारा भक्तों का परम कल्याण होता है। यह देवी परम कल्याण को देने वाली और भक्तों का सर्वत्र मंगल ही मंगल करने वाले होती है। उन्हें यश विजय और धन-धान्य देने वाली है। देवी अत्यंत शांत स्वभाव और करुणा से भरी हुई है तथा असुरों का संघार करने वाली और देवताओं को भी अभय देने वाली है। माता अपने भक्तों को बौद्धिक कुशलता और सुख संपन्नता वैभव आदि कीर्ति को देने वाली है। भगवती देवी को सफेद वस्त्र और क्रीम कलर के वस्त्र तथा आभूषण स्वर्ण आभा वाले वस्त्र और आभूषण अत्यंत पसंद है। इन्हे प्रिय भोग में देखा जाए तो दूध और मेवे मिष्ठान आदि बहुत पसंद है। दूध से बनी हुई मिठाइयां पंचमेवा घी चीनी शहद गुड़ आदि भी इनका प्रमुख पसंदीदा भोग है। देवी को नारियल तथा चुनरी पान आदि बताशा भी भेंट किया जाता है तथा द्रव दक्षिणा भी देवी को अर्पित की जाती है।
देवी को भोग प्रसाद में मालपुआ खीर तथा पौष्टिक अन्न वस्त्र आदि अर्पित करने का विधान शास्त्रों में मिलता है। देवी को सफेद रंग के पुष्प और लाल रंग के पुष्प दोनों ही तरह के पुष्प अत्यंत प्रिय होते हैं। पीला और सुनहरा पुष्प यानी इन रंगों के पुष्प भी देवी को पसंद है और प्रिय भी हैं तथा इन्हीं रंगों का प्रयोग देवी की पूजा मे भक्तों को करनी चाहिए। इस देवी की पूजा में भक्तों को अपने कल्याण के लिए तथा घर परिवार के कल्याण के लिए प्रत्येक नवरात्रि में करवाना चाहिए। शासक प्रशासकों को भी इसकी पूजा बहुत ही सावधानी और श्रद्धा भक्ति विश्वास को करनी चाहिए। जिससे देश और प्रदेश का परम कल्याण हो, रोग बीमारियां और अशांति युद्ध तथा भय का माहौल समाप्त हो।

मां सिद्धिदात्री:
यह मां दुर्गा की नवी मूर्ति के रूप में इस संसार में विख्यात है। अपने भक्तों का परम कल्याण करने वाली है। माता का यही रूप सुर नर और मुनि जनों का परम कल्याण करने वाला है। भगवती की करुणा और दया शांति और जगत के पालन करने के गुणों के कारण यह देवी सिद्धिदात्री के रूप में संपूर्ण विश्व में पूजी जाती है। इन्हें नवरात्र के नौवे दिन यानी नवरात्र की संपन्नता के दिन इनकी पूजा की जाती है। इन्हें कमलासन देवी कहा जाता है, यह देवी दुर्गा की नवी मूर्ति सिद्ध दात्री ज्ञान धन मोक्ष कीर्ति और सुख शांति का भंडार देने वाली है। यह चार भुजाओं से युक्त है। इनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी है,यह माता सिंह वाहिनी है और कमलासना भी कहलाती हैं। उनके दाई ओर के हाथ में कमल पुष्प और शंख शोभित हो रहे हैं। माता के बाई ओर के हाथों में गदा और सुदर्शन चक्र विभूषित है। यह भगवती देवी की मूर्ति रिद्धि सिद्धि को देने वाली जिसमें अष्ट सिद्धियां अणिमा, महिमा गरिमा आदि अष्ट सिद्धियां और नव निधियां शामिल है। मां भगवती के जिनकी पूजा अर्चना और हवन आदि के विधान के बाद नवरात्रि महापर्व का महा उत्सव यही संपन्न हो जाता है। मां सिद्धिदात्री भोगों को रिद्धि सिद्धि और उन्हें समृद्धि देने वाली होती है, इस देवी की वंदना सभी सूर यानी देवता नर का अभिप्राय मनुष्य से है,और महर्षि का अभिप्राय ऋषिगणों से है। करते हैं और उन्हीं की कृपा से यह संसार चल रहा है ऐसा शास्त्रों में उल्लेख मिलता है।
मां सिद्धि दात्री के संदर्भ में पौराणिक कथा:
देवी भगवती दुर्गा की इस नवी मूर्ति जो परम कल्याणकारी है, जिसे सिद्धिदात्री के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों में ऐसा कथन और उल्लेख मिलता है कि, इन्होंने आदि देव महादेव को पाने के लिए परम कठोर तब किया था। जिन्हें पार्वती के रूप में भी जाना जाता है। उनके कठोर तप त्याग और श्रद्धा भक्ति से भगवान आदि देव महादेव प्रसन्न हो गए। क्योंकि विधि की प्रेरणा और संसार की रचना के उद्देश्य से शिव और शक्ति का सृजन इस ब्रह्मांड में हुआ है। जो सबका परम कल्याण और मंगल करने वाला है। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर के आदि देव महादेव ने इन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया और इन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में वाम भाग में आसान दिया। शिव के स्वीकृति के बाद यह शिव के आधे शरीर की स्वामिनी बन गई। जिससे अर्धनारीश्वर का विग्रह इस संसार में उत्पन्न हुआ। अर्धनारीश्वर का स्वरूप भक्तों के कल्याण के लिए प्रकट हुआ। शिव और शक्ति की इस दिव्य कृपा से ही और उनकी करुणा के कारण इस संसार का सृजन हुआ और इस सृष्टि की उत्पत्ति हुई।
मां सिद्धिदात्री की 2026 पूजा की महत्व:
भगवती के इस आराध्य विग्रह का पूजन नवरात्रि के नौवे दिन यानी संपन्नता के दिवस किया जाता है। भक्तों को अभीष्ट और वांछित फल देने की क्षमता यदि किसी में है तो मां सिद्धिदात्री में ही है, मां सिद्धिदात्री भक्तों के कठिन से कठिन कामों को पूरा करने वाली और उनके बड़े से बड़े संकटों को काटने वाली होती है। अतः प्रत्येक भक्त अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए घर परिवार की कुशलता के लिए स्वास्थ्य धन और ईश्वर के लाभ के लिए संतान आदि प्राप्ति के लिए उनकी पूजा बड़ी भक्ति भावना के साथ श्रद्धा विश्वास के साथ करता है। इनकी पूजा नवरात्रि के नौवे दिन में की जाती है, इस पूजा में भी जिस तरह से पूर्व में एक से लेकर के 8 दिन आपने पवित्रता श्रद्धा विश्वास और भक्ति से माता का पूजन किया है, मां दुर्गा के महापर्व की यही संपन्नता दिवस यानी 9वें दिन की मूर्ति है। यहीं से नवरात्रि की अंतिम पूजा पर्व की संपन्नता हो जाती है। इनकी पूजा में व्यक्ति को श्रद्धा भक्ति से सम्मिलित होना चाहिए और बड़े भक्ति भाव से देवी का पाठ पूजन अर्चन करना चाहिए।
नवदुर्गा देवी के पाठ का पारायण जहां होता है वहां कोई कष्ट और बाधाए नहीं रह सकती हैं। ऐसा शास्त्रों में उल्लेख मिलता है। अतः प्रत्येक भक्त को अपने कल्याण के लिए उनकी पूजा अर्चना करनी चाहिए। देश तथा विश्व में शासन प्रशासक भयभीत हैं या किसी कारण से भय है। युद्ध उपद्रव प्राकृतिक उत्पाद बीमारियां आदि ऐसे जो संकट हैं। उनसे बचने के लिए सभी ऐसे भक्त लोगों को देवी की पूजा अर्चना यज्ञ अनुष्ठान बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ करवाना चाहिए। यदि भक्त अपनी साधना को पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ जारी रखते हैं। तो, निश्चित रूप से उन्हें बहुत बड़ी सफलता हासिल होती है। वह धर्म अर्थ काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थ को प्राप्त कर लेते हैं, भगवती की इस पूजा में कन्या पूजन का अत्यंत महत्व है। जिसे कुमारी पूजन भी कहा जाता है। छोटी कन्या जो 8 से 9 साल तक की होती हैं। उनके पूजा का विधान मिलता है। कुमारी पूजन के बिना ऐसा कहा जाता है कि पूजा अधूरी रह जाती है। अतः कुमारियों का पूजन प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। यदि कुमारी ना मिले तो उनके निमित्त दान वस्त्रेदान और द्रव्य दक्षिणा जो भी बन सके जरूर देना चाहिए।
मां सिद्धिदात्री के प्रिया भोग पुष्प वस्त्र तथा रंग:
भगवती सिद्धिदात्री को प्रिय भोग में नारियल गिरी और कच्चे नारियल चने तथा हलवा पुरी अत्यंत प्रिया होता है। खीर और जो मेवे तथा मिष्ठान है, जो पुष्टि को बढ़ाने वाले हैं, उनका प्रसाद बहुत प्रिय होता है। देवी का एक रूप प्रकृति का भी है यानी इस प्रकृति रूपी देवी के सम्मुख जो वस्तुएं भोग द्रव दक्षिणा आदि लेकर के भक्तजन उपस्थित होते हैं, देवी उन्हीं को भक्ति के वांछित कामनाओं की पूर्ति के लिए कई गुणा करके उन्हें पुनः वापस करती है। उनके जीवन में सुख समृद्धि और भक्ति भाव का अनूठा उपहार देती है। भगवती दुर्गा को सुगंधित पुष्प जिसमें बेगानी लाल गुलाबी जामुनी रंग के पुष्प सफेद रंग के पुष्प तथा इसी रंग के वस्त्र भी भगवती देवी को प्रिय होते हैं। भगवती देवी को सुख तथा सौभाग्य की सामग्री भी आभूषण आदि भी अर्पित किए जाते हैं। स्त्रियों को अपने सौभाग्य की रक्षा के लिए देवी को सुंदर और दिव्या सौभाग्य को देने वाली वस्तुओं को अर्पण करना चाहिए।
चैत्र नवरात्रि 2026 में इस वर्ष विशेष ज्योतिषीय योग घटित हो रहे हैं
जो ज्योतिष के दृष्टिकोण से अत्यंत शुभ और सकारात्मक माने जाते हैं। इस नवरात्रि में जो ग्रहों का गोचरीय कम है, वह कुछ इस प्रकार से बन रहा है। जो कई राशियों के लिए शुभ और अशुभ दोनों तरह के परिणाम को दर्शा रहा है। यानी इस नवरात्रि में कई राशियों के लिए शुभ परिणाम प्राप्त होंगे। तो कई राशि वालों को अशुभ परिणाम भी प्राप्त हो सकते हैं। जिसमें 24 मार्च 2026 छठवीं तिथि में मिथुन राशि में गुरु और चंद्र की युक्ति हो रही है। जिसे ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गजकेसरी योग की संज्ञा दी जाती है। यानी देवगुरु बृहस्पति और चंद्रमा की युति से जो योग बन रहा है। वह अत्यंत शुभ और सकारात्मक हो रहा है। जिससे मिथुन राशि के लिए यह अत्यंत शुभ रहेगा। वही धनु राशि वालों के लिए भी यह योग शुभ तथा कल्याणकारी बना हुआ रहेगा।
FAQS\ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-
Q. प्रथम नवरात्र 2026 में कौन सी देवी की पूजा होती है?
An. प्रथम नवरात्र में मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है, जो नवदुर्गा का पहला स्वरूप हैं और शक्ति एवं सृजन का प्रतीक मानी जाती हैं।
Q. मां शैलपुत्री को कौन से फूल और भोग प्रिय हैं?
An. मां शैलपुत्री को सफेद और गुलाबी पुष्प, खीर, बर्फी, मालपुआ और मीठे फल अत्यंत प्रिय होते हैं।
Q. मां शैलपुत्री की पूजा का सही विधि क्या है?
An. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर शुद्ध होकर, दीप-धूप जलाकर, संकल्प लें और श्रद्धा भाव से माता की पूजा करें। पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से पूजन करना श्रेष्ठ माना गया है।
Q. नवरात्रि में संकल्प क्यों लिया जाता है?
An. संकल्प पूजा का महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें व्यक्ति अपनी मनोकामना, नाम-गोत्र और उद्देश्य के साथ देवी की आराधना का व्रत लेता है।
Q. मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का क्या महत्व है?
An. मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से तप, त्याग, आत्मबल और मानसिक शांति प्राप्त होती है तथा जीवन में सफलता और समृद्धि आती है।
Q. मां चंद्रघंटा की पूजा से क्या लाभ मिलता है?
An. मां चंद्रघंटा की पूजा से भय, नकारात्मकता और मानसिक विकार दूर होते हैं तथा साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है।
Q. क्या नवरात्रि में सभी नौ देवियों की पूजा जरूरी है?
An. हाँ, नवरात्रि के प्रत्येक दिन अलग-अलग देवी की पूजा करने से जीवन में संपूर्ण सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।




