नवरात्रि 2026 प्रथम दिन (मां शैलपुत्री)
सत्य सनातन धर्म में प्रकृति को देवी का ही स्वरूप माना जाता है। जब प्रकृति ऋतुओं को सजाती है और बसंत के आगमन पर कई तरह के पुष्प और फल धरती की शोभा बढ़ाते हैं। विशेष रूप से किसानों की फसले पक जाती है। तो मां दुर्गा जो शक्ति और प्रकृति का रूप है। उसकी पूजा और अर्चना का महापर्व नवरात्रि मे 9 दिनों पर्यंत चलता है। जिसकी शुरुआत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हो जाती है। यहां देवी मां दुर्गा की शक्ति के रूप में आराधना करने का विधान शास्त्रों में मिलता है। इस पूजा के पीछे प्रकृति से जुड़े हुए ऐसे अनेकों कारण छिपे हुए हैं। जो मनुष्य के जीवन से दुख दरिद्र को हटाकर समृद्धि को देते हैं। वही यहां पर हिंदू नव वर्ष का शुभारंभ भी हो जाता है। जिससे शक्ति की अर्चना और पूजन आदि कर्म अत्यंत शुभप्रदायक हो जाते हैं। यानी शक्ति की पूजा और आराधना से सब मंगल ही मंगल होता है। यह सब प्रकार से भक्तों की रक्षा और सुरक्षा करने वाला होता है। नवरात्र का महापर्व वर्ष में विशेष रूप से वसंत नवरात्र और शारदीय नवरात्र इस तरह से दो नवरात्र विशेष रूप से देवी की अर्चना के लिए विहित हैं। जिसमें समूचा हिंदू धर्म और विश्व सहित देश के अनेक भक्त लोग देवी की पूजा और अर्चना करते तथा करवाते हैं। इसी प्रकार से देवी शक्ति की आराधना के लिए दो और नवरात्रि गुप्त रूप से रहती है। उन्हें गुप्त नवरात्रि के नाम से जाना जाता है।
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नवरात्रि 2026 प्रथम दिन
इन नवरात्रों में भी देवी शक्ति की आराधना और पूजा होती है। क्योंकि यहां गुप्त और व्यक्तिगत रूप से विशेष पूजा होती है। सामूहिक रूप से यहां पर आयोजन नहीं होते हैं। इसलिए इसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। मैं आचार्य अंकुश मंगल भवन के इस वसंत नवरात्रि के लेख में आपको देवी के विभिन्न रूप और घट स्थापना के संबंध में इस लेख के माध्यम से चर्चा कर रहा हूं। अतः हमारे इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें। जिससे आपको इस नवरात्रि में घट स्थापना का मुहूर्त और अन्य जानकारी का लाभ मिल सके। आईए जानते हैं शक्ति रूपा दुर्गा प्रथम रूप में शैलपुत्री, द्वितीय रूप में ब्रह्मचारिणी और तृतीय रूप में चंद्रघंटा और चतुर्थ रूप में कुष्मांडा देवी को पूजा जाता है। इसी क्रम में पंचम रूप में स्कंद माता की पूजा की जाती है। तथा छठवीं कात्यानी की पूजा अर्चना की जाती है। सातवी कालरात्रि और महागौरी के रूप में आठवीं देवी की अर्चना की जाती है। नवी देवी सिद्धिदात्री के रूप में पूजी जाती है। यानी प्रत्येक नवरात्र में मां दुर्गा देवी का अलग-अलग रूप प्रधान रूप से पूजा जाता है। इस प्रकार से प्रथम नवरात्रि में मां शैलपुत्री की पूजा अर्चना की जाएगी। इस नवरात्रि जो की 19 मार्च 2026 दिन गुरुवार से शुरू हो रही है। उसमें प्रतिपदा तिथि का क्षय है तो, उसके लिए घट स्थापना का मुहूर्त क्या है? उसका भी उल्लेख इसमें किया जा रहा है।
घट स्थापना का मुहूर्त
- घट स्थापना का मुहूर्त 19 मार्च 2026 दिन गुरुवार
- नवरात्रि 2026 घट स्थापना का शुभ मुहूर्त इस वर्ष 19 मार्च 2026 दिन गुरुवार से नवरात्रि का प्रारंभ हो रहा है। जिसमें प्रतिपदा तिथि का क्षय है, अतः प्रातः काल 6:53 के बाद से घट स्थापना का प्रथम शुभ मुहूर्त शुरू हो रहा है। जो कि प्रातः काल 6.54 से 7.41 तक प्रातः काल रहेगा।
- यदि किसी कारण बस आप इस समय घट स्थापना ना कर पाए हैं, तो अभिजीत मुहूर्त में घट स्थापना कर लेनी चाहिए। जिसकी शुरुआत 11:52 से लेकर 1239 तक रहेगी। यानी इस समय तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। जो घट स्थापना के दृष्टिकोण से शुभ और मंगल परिणामों को देने वाला रहेगा।
2026 में मां दुर्गा डोली पर सवार होकर के आ रही है। जिसका ज्योतिषी अर्थ:
ज्योतिष में गणनाओं के अनुसार जिस प्रकार से कालचक्र का अध्ययन किया जाता है। उसी प्रकार से मां शक्ति के आने के जो संकेत हैं, उन्हें हम वाहन के रूप में जानते हैं। शास्त्रों का ऐसा कथन है कि, मां शक्ति का उदय और अस्त एक किसी खास संकेत के रूप में होता है। जिसे आम भाषा में सवारी कहा जाता है। यानी दुर्गा जो प्रकृति की देवी है और इस प्रकृति तथा संसार की शक्ति के रूप में स्थापित है। वह जब नवरात्रों में आती है तो, उसके लिए शास्त्रों ने एक विशेष वाहन और संकेत को शुभ और अशुभ रूप में कहा है। यानी ज्योतिष शास्त्र यह बताता है कि,इस वर्ष देवी का वाहन जिसमें देवी सवार होकर आ रही है। वह आम जन के लिए देश के लिए तथा समूचे विश्व के लिए किस तरह के शुभ और अशुभ परिणाम को देने वाला रहेगा। इसका समुचित रूप से अध्ययन और विचार किया जाता है। इस वर्ष बसंत नवरात्रों की शुरुआत गुरुवार के दिन से हो रही है। जिससे मां भगवती डोली में सवार होकर के आ रही है। इस डोली की सवारी को प्रायः शुभ और अशुभ दोनों ही रूपों में माना जाता है। यानी इसके शुभ और अशुभ दोनों तरह के परिणाम होंगे। लेकिन जो संकेत प्राप्त हो रहा है। उससे यह ज्ञात हो रहा है कि, अशुभता का स्तर ज्यादा बढ़ा हुआ रहेगा। जिससे लोगों में बीमारियां भय और असंतोष उत्पन्न होता है। इसी तरह विश्व के कई देशों में परस्पर युद्ध और आतंकी घटनाएं भी घटित होती हैं। क्योंकि जो प्रकृति है, जो शक्ति का स्रोत है। वह यदि डोली में सवार होकर के आ रही है तो, निश्चित रूप से संपूर्ण संसार की शिथिलता और बीमारियों को ही दर्शा रही है। अतः व्यक्ति को स्वयं के कल्याण हेतु और अपने घर परिवार के कल्याण हेतु तथा सरकार और प्रशासन में बैठे हुए लोगों को सामूहिक कल्याण से यज्ञ हवन पूजन निश्चित रूप से कराना चाहिए। जिससे उनका भी कल्याण हो। प्रजा का कल्याण हो, देश की रक्षा हो सके। रोग तथा बीमारियों से लोग बच सके। तथा स्वस्थ हो।
2026 नवरात्रि का महत्व
सत्य सनातन धर्म में देवी की पूजा और उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों के अनुसार देवी शक्ति का स्रोत है। और देवी प्रकृति से जुड़ी हुई ऐसी शक्ति है। जो मनुष्य के जीवन में उत्पन्न हो रहे दुख और कष्ट को मिटाने की शक्ति रखती है। बसंत नवरात्र और शारदीय नवरात्र के मौके पर सभी लोग भक्ति और श्रद्धा के साथ स्वयं के जीवन में शक्ति को अर्जित करने के लिए और रोग तथा पीड़ाओं को भगाने के लिए वर्ष में दो बार देवी की पूजा और आराधना करते हैं। तथा देवी की कृपा पाने के लिए व्रत और उपवास रखते हैं। इस बसंती नवरात्रि के मौके पर लोग देवी मां की श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा तथा अर्चना करते हैं। देवी के प्रसिद्ध मंदिरों और भक्तजनों के घरों में देवी की प्रतिमा तथा मूर्ति के साथ पूजा की जाती है। साथ ही इस समय 9 दिनों का यज्ञ अनुष्ठान और वैदिक मत्रों का उच्चारण सुनाई देता रहता है। यानी इस नवरात्र में दुर्गा के पूजा का और उसके पाठ का तथा हवन और कन्याओं को भोजन कराने का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। यानी कुमारी पूजन जिसे कहा जाता है। कुमारियों का पूजन इस नवरात्रि के पर्व में किया जाता है। कुमारी पूजन का अभिप्राय प्रकृति और शक्ति से है। यानी प्रकृति और शक्ति के रूप में ऐसी शक्ति और उसके संकेत के रूप में कन्याओं का पूजन विधिवत किया जाता है। इस नवरात्र की पूजन से व्यक्ति अपने दुख को दूर भगाकर मंगलमय जीवन को प्राप्त करता है तथा वांछित कामनाओं को पूरा करने में सफल होता है। क्योंकि देवी में सभी देवताओं और देवियों की शक्ति विराजमान है, इसलिए नवरात्र पूजन का विशेष रूप से महत्व बढ़ जाता है। क्योंकि इस समय बसंत ऋतु के आगमन के साथ-साथ धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु का आगमन होने लगता है और प्रकृति जहां सजने संवरने लगती है। वही कई तरह की फैसले और पुष्प तथा फलों का उत्पादन भी होता है। यानी नौ दिनों तक देवी के विभिन्न रूपों की पूजा और अर्चना की जाती है। जिस दिन कि जो देवी है, जिसके नाम उपरोक्त पारा ग्राफ में बताए गए हैं। वही देवी प्रधान रूप से होती है और उसी के नाम का स्मरण करके पूजन और अर्चन किया जाता। इसके पश्चात 9 दिन पूरे होने के बाद देवी का पुनः वैदिक मंत्रों के द्वारा विसर्जन किया जाता है और उनसे किसी भी भूल चूक की क्षमा मांगी जाती है।
प्रथम नवरात्र में मां शैलपुत्री की पूजा 2026
हिंदू धर्म में भगवती की पूजा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। नवरात्र चाहे वसंत नवरात्र हो या फिर शरदीय नवरात्र हो, किंतु इसमें जो पूजा का विधान है, वह पहले देवी से ही शुरू होता है। पहले नवरात्रि की जो देवी है, उनका नाम मां शैलपुत्री है। शास्त्रों का कथन है कि, हिमालय राज की तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी पुत्री के रूप में उत्पन्न होने का उन्हें वरदान दिया था। अपने भक्त के वरदान को पूरा करने के लिए वहां पुत्री के रूप में हिमाचल के घर में उत्पन्न हुई। इन्हें पार्वती देवी भी कहा जाता है। शैल यानी हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण उन्हें शैलपुत्री भी कहा जाता है और इनका नाम पार्वती देवी भी है। पार्वती देवी संपूर्ण जगत की अधीश्वर देवी है। यह अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल पुष्प को धारण किए हुए हैं। जो माता के करुणा और स्नेह को दर्शाता है। यह रूप मूर्ति की क्षमता और शक्ति तथा सृजन की क्षमता को यह दर्शाता है, यानी इन प्रतीकों के द्वारा यह ज्ञात होता है कि, मानव मात्र का पालन करने वाली और सृष्टि का सृजन करने वाली जगत की अधिष्ठात्री मां शैलपुत्री है। तथा वृषभ की सवारी करती है और उनकी पूजा विधि विधान के द्वारा शास्त्रोक्त ढंग से की जाती है। भगवती मां शैलपुत्री की पूजा के लिए एक दिन पूर्व व्यक्ति को अपने मन में देवी की पूजा की प्रतिज्ञा करनी चाहिए। तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शुद्ध होकर स्नान आदि करने के पश्चात पूजन की सभी सामग्री को एकत्रित करते हुए माता की आराधना और पूजा करनी चाहिए।
मां शैलपुत्री की पूजा का विधान और संकल्प के नियम:
मां शैलपुत्री की पूजा के जो विधान कह गए हैं, जैसे पवित्र होना, ब्रह्मचर्य का पालन करना और पूजन के लिए जो विहित सामग्री है, यानी पूजा राजसोपचार पंचोपचार अष्टोदश उपचार से किए जाने का विधान मिलता है। यानी आप जिस तरह की पूजा करना चाह रहे हैं। उसका परामर्श ब्राह्मण पंडितों से लेकर पूजन की सामग्री एकत्रित कर लें। यदि आप स्वयं पूजा करना चाह रहे हैं तो, पवित्र जल लेकर के अपने ऊपर छिड़क ले और तीन बार आचमन कर लें। तथा अपने आसन को भी पवित्र कर लें और ग्रंथि बंधन अपनी शिखा को बांध लें। इसके बाद प्राणायाम करें और हाथ धुल लें तथा अपने दाहिनी और घी का दिया रखें और उसे प्रज्वलित करें और धूप भी जला ले। इसके बाद मंगलाचरण और शांति के मंत्र पढ़ें। यदि मंत्र नहीं आते हैं तो, माता को प्रणाम करें और ऐसी भावना करें कि, हे माता मेरा सब प्रकार से आप कल्याण करें। मैं पूरे परिवार के साथ में आपकी शरणागत हूं।
मां शैलपुत्री दुर्गा की पूजा के लिए प्रथम नवरात्र में संकल्प का विधान:
अपने हाथ में आप जल और पुष्प तथा कुछ दक्षिणा और पुंगी फल यानी सुपारी पान और दूर्वा रखकर प्रसन्न मुद्रा से आसन में सीधा आसन पर बैठ जाएं और भगवान विष्णु का तीन बार स्मरण करें। हरिओम विष्णु विष्णु विष्णु…इस तरह से जो नूतन संवत्सर है उसका उच्चारण करें तथा जो संकल्प के पूरे नियम हैं। उनका संपूर्ण उच्चारण करें और अपने नाम गोत्र तथा वांछित कामना का चिंतन करते हुए देवी से प्रार्थना करें कि, मेरी स्वास्थ्य की कामना धन की कामना पुत्र की कामना वांछित कामना को पूर्ण करें। मैं आपकी शरणागत हूं। और उस संकल्प को गणपति भगवान के पास छोड़ दे। इस प्रकार से पृथ्वी पूजन, गणपति पूजन और वरुण आदि कलश की स्थापना जिसे घट स्थापना कहा जाता है। करते हुए मातृका मंडल तथा सूर्य आदि नौ ग्रहों का मंडल चक्र बनाकर उसकी पूजा अर्चना करें। इसके बाद प्रधान देवी की आराधना मां शैलपुत्री की पूजा अर्चना करें।
मां शैलपुत्री की पूजा मैं पुष्प तथा वस्त्र और भोग प्रसाद:
मां शैलपुत्री पार्वती को प्रथम नवरात्रि के दिन श्वेत तथा गुलाबी पुष्पों और माला को अर्पित करना चाहिए। इन्हें दोनों ही तरह के पुष्प अत्यंत प्रिय होते हैं। ध्यान रहे, पुष्प सुगंधित और आकर्षक हो, मुर्झाए हुए और सुगंधहीन पुष्प को देवी में कभी ना चढ़ाएं। माता सफेद तथा हल्का गुलाबी वस्त्र भी धारण करती हैं। देवी शैलपुत्री दुर्गा को खीर, बर्फी, मालपुए तथा मीठे फलों का भोग लगाना चाहिए। जो फल मीठे हो, खट्टे फलों का भोग नहीं लगाना चाहिए। क्योंकि इन्हें इस तरह के फल और पुष्प अधिक प्रिय होते हैं। ऐसा शास्त्रों का कथन है। अतः इस प्रकार के वस्त्र आभूषण तथा भोग प्रसाद माता को अर्पित करना चाहिए।
मां शैलपुत्री के लिए प्रिय रंग और भोग प्रसाद:
रंगों की बात करें तो, माता को सफेद और हल्के गुलाबी रंग के वस्त्र आभूषण आदि बहुत ही पसंद होते हैं तथा भोग प्रसाद में खीर और मीठा प्रसाद तथा सूखे मेवे का प्रसाद भी अत्यंत प्रिया होता है। माता का पूजन उनका ध्यान करते हुए आसन के लिए सुगंधित पुष्प अर्पित करना चाहिए। तथा उनकी आरती करना चाहिए। अंत में उन्हें प्रणाम भी करना चाहिए। और हाथ में कुछ जल लेकर के पुनः उस पूजन का समर्पण माता को कर देना चाहिए।
चैत्र नवरात्रि 2026 में इस वर्ष विशेष ज्योतिषीय योग घटित हो रहे हैं
ज्योतिष के दृष्टिकोण से अत्यंत शुभ और सकारात्मक माने जाते हैं। इस नवरात्रि में जो ग्रहों का गोचरीय कम है, वह कुछ इस प्रकार से बन रहा है। जो कई राशियों के लिए शुभ और अशुभ दोनों तरह के परिणाम को दर्शा रहा है। यानी इस नवरात्रि में कई राशियों के लिए शुभ परिणाम प्राप्त होंगे। तो कई राशि वालों को अशुभ परिणाम भी प्राप्त हो सकते हैं। जिसमें 24 मार्च 2026 छठवीं तिथि में मिथुन राशि में गुरु और चंद्र की युक्ति हो रही है। जिसे ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गजकेसरी योग की संज्ञा दी जाती है। यानी देवगुरु बृहस्पति और चंद्रमा की युति से जो योग बन रहा है। वह अत्यंत शुभ और सकारात्मक हो रहा है। जिससे मिथुन राशि के लिए यह अत्यंत शुभ रहेगा। वही धनु राशि वालों के लिए भी यह योग शुभ तथा कल्याणकारी बना हुआ रहेगा।

इसी प्रकार से तुला राशि वालों के लिए भी इस नवरात्रि में ग्रहों की स्थिति शुभ और सकारात्मक परिणाम को दे रही है। जिससे इस राशि के लोगों की किस्मत चमकेगी और उनके रुके हुए काम बनेंगे। इसी प्रकार कुंभ राशि की बात करें तो, कुंभ राशि वालों के लिए भी यह नवरात्रि का महापर्व ग्रहों की गोचर के अनुसार अत्यंत शुभ तथा सकारात्मक परिणाम को देने वाला बना रहेगा। जिससे उनके कई रुके हुए कार्य बनेंगे और उन्हें नौकरी तकनीकी चिकित्सा न्याय अनुसंधान आदि से जुड़े क्षेत्रों में तथा राजनीतिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सफलता के योग बन रही है।
मीन राशि की यदि बात करें तो मीन राशि में सूर्य का गोचर और शनि की युति कहीं ना कहीं ज्यादा शुभ परिणाम नहीं देंगे। इस तरह से इस राशि वालों को कई तरह से चुनौतियां और कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। अतः धैर्य और साहस को बनाए रखें।
ग्रहों का यह गोचर बता रहा कि, इस नवरात्रि 2026 में मेष राशि के जातकों के की सुख सुविधा में वृद्धि होगी। उन्हें धन जुटाने, कमाने और एश्वर्या पूर्ण जीवन जीने में बहुत बड़ी सफलता मिलने के संकेत मिल रहे हैं। यानी इस नवरात्रि में आपकी किस्मत चमकेगी और आपको नौकरी पेसा के क्षेत्र में भरपूर मान और सम्मान मिलेगा।
यानी इस नवरात्रि 2026 में मिथुन तुला धनु कुंभ और मेष राशि के जातकों की किस्मत चमकेगी और उन्हें बहुत बड़ी सफलता कार्य और व्यापार के क्षेत्र में मिलेगी। उनके कुछ रुके हुए कार्य बनेंगे।
इस नवरात्रि 2026 में इन राशियों पर बरसेगी विशेष कृपा दृष्टि।
मिथुन राशि: मिथुन राशि के स्वामी बुद्ध हैं और इस राशि के स्वामी का जो गोचरीय क्रम है, वह धर्म भाव में हो रहा है। वही देव गुरु बृहस्पति की चंद्रमा के साथ युति होने से इस राशि के जातकों के लिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक विशेष और चमत्कारिक अवसर निर्मित हो जाता है। जिसे दुर्लभ संयोग कह सकते हैं। यानी इस नवरात्रि में इस राशि के जातकों की जो स्थिति है,वह इस तरह से है जो, इनके किस्मत को चमकने वाली रहेगी। स्वास्थ्य अच्छा बना रहेगा। और वैवाहिक जीवन भी सुखद और शानदार बना हुआ रहेगा। कार्य तथा व्यापार में इन्हें बहुत अच्छी सफलता मिलने के योग बन रहे हैं। यदि आप इस दौरान विदेश यात्रा तथा कोई अन्य कार्यों को करना चाहतें हैं तो, सफल रहेंगे। यानी नए संबंध और नए आर्थिक सूत्र इस नवरात्रि में ग्रहों की युति दे सकती है। जिसे गज केसरी योग कहा जाता है। जो अत्यंत शुभ प्रतीक माना जाता है।
तुला राशि: इस राशि के स्वामी शुक्र देव हैं, जो असुरों के गुरु माने जाते हैं और ज्योतिष के अनुसार इन्हें भी ऐश्वर्यादि और सुख समृद्धि देने वाला कहा जाता है। इस राशि पर भी गुरु का जो दुर्लभ संबंध बन रहा है, इससे ज्ञात हो रहा है। कि, इस राशि वालों को इस नवरात्रि में किस्मत जरूर चमकेगी। इन्हें भगवती की कृपा प्राप्त होगी।क्योंकि ग्रहों का गोचर उनके लिए शुभ और सकारात्मक हो चुका है। साथ ही में राशि स्वामी का उनके साथ जो दृष्टि संबंध बन रहा है। यानी तुला राशि के स्वामी शुक्र अपने दृष्टि से अपनी ही राशि को देख रहे हैं। जिससे यह अत्यंत दुर्लभ और सिद्ध माना जाता है। यानी कार्य क्षेत्र में राजनीतिक जीवन में सामाजिक जीवन में और तकनीक चिकित्सा आदि खनिज तेल उर्वरक आदि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता को देने वाले हो जाते हैं। स्वास्थ्य को सुंदर करने वाले हैं। यदि कोई रोग और पीड़ा है। तो उसे भी दूर करने में यह सहायक माने जाते हैं। यह इस राशि वालों के लिए दुर्लभ और अत्यंत शुभ योग बन रहा है। जिससे उनकी किस्मत चमकेगी और दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति के अवसर बन रहे हैं।
धनु राशि: इस राशि के स्वामी देव गुरु बृहस्पति हैं, जो अत्यंत शुभ और सकारात्मक माने जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार देवगुरु की सकारात्मकता। सभी ग्रहों से अधिक मानी गई है और यह मनुष्य के जीवन में अधिक शुभ और सकारात्मक प्रभाव को देने वाले कह गए हैं। जिससे आपको शुभ और चमत्कारिक परिणाम मिलते हैं। यदि किसी जातक की कुंडली में देवगुरु की युति हो और उनका दृष्टि संबंध बन जाए तो कहना ही क्या है। उसके सोए हुए भाग्य जाग जाते हैं। इसी प्रकार से इस नवरात्रि 2026 में देखा जाए तो देवगुरु बृहस्पति की जो स्थिति है, वह धनु राशि के साथ बन रही है। जिससे इस राशि वालों की किस्मत के बंद दरवाजे खुल जाएंगे तथा कार्य और व्यापार के क्षेत्र में दिन दूनी और रात चौगुनी उन्नत की स्थिति को दर्शा रहे हैं। त्रिकोण में शुक्र का स्थित होना। उनके लिए और भी शुभ तथा अच्छा हो जाता है। जिससे उनके कई रुके हुए काम बनते हैं।नौकरी के लिए इन्हें बुलावा आता है। और पदोन्नति हो जाती है। तथा कोई बड़ी डील परस्पर व्यापारिक मामलों में संभव हो जाती है।
कुंभ राशि: इस राशि के स्वामी शनि हैं। शनि को न्याय का देवता कहा जाता है यह खनिज पदार्थ और गुप्त शिक्षाओं अदालत तेल आदि पदार्थों से जुड़े हुए माने जाते हैं। शनि को धीरे-धीरे चलने वाला ग्रह भी कहा जाता है। जिससे उनकी दृष्टि के कारण लोग घबरा उठाते हैं। लोग घबरा ही क्यों ना उठे। क्योंकि शनि का गोचरbबहुत सुस्त होता है। जिससे व्यक्ति किसी कार्य को करने में पीछे हो जाता है। तो उसे कई तरह के संघर्ष तथा कठिनाइयां झेलनी पड़ती है। हालांकि महत्वपूर्ण बात है, इस नवरात्रि 2026 में इस राशि के जातकों की किस्मत खुलेगी और यह नई बुलंदियों को प्राप्त करेंगे। राजनीतिक जीवन हो या फिर व्यापारिक जीवन हो। या कोई चिकित्सीय तथा अन्य क्षेत्र इन्हें, निश्चित रूप से इस नवरात्रि में बड़ी सफलता मिलने के योग बन रहे हैं। यानी इस नवरात्रि के जो ग्रहों का गोचर है, इस राशि के लिए विशेष खास और महत्वपूर्ण सिद्ध होने वाले रहेंगे। ऐसा ग्रहों का गोचर दिखा रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार देखा जाए तो, इस राशि के लिए भी शुभ और सकारात्मक परिणामों की बारिश होगी।
मेष राशि: मेष राशि के स्वामी ग्रह मंगल होते हैं। मंगल युवराज और उग्र ग्रह के रूप में जाने जाते हैं। कई बार उनकी उग्रता और की क्षमता के कारण व्यक्ति परेशान होता है। उसे जीवन में कई तरह की कठिनाइयों और दुख भी झेलना पड़ जाते हैं। अपनी ऊर्जा और शक्ति के कारण व्यक्तियों को कई बार आगे भी बढ़ाते हैं। तथा पुलिस न्याय चिकित्सा और युद्ध के मैदान में विजय दिलाने का काम भी करते हैं। हालांकि इस राशि के जातकों के लिए जो इस नवरात्रि में देखा जाए महत्वपूर्ण और शुभ बिंदु यह है कि, जो शुक्र वैभव सुख तथा सौंदर्य के स्वामी है, कला प्रेम अध्यात्म के स्वामी है। जो जीवन को भोग विलास से भरने वाले हैं। तथा वैवाहिक जीवन में मधुरता को देने वाले कह गए हैं। प्रेम संबंधों में रोमांचक वार्ताओं और परस्पर सामंजस को जो देने वाले ग्रह हैं और शुक्र ही है
शुक्र का इस राशि में गोचर करना इनके लिए किसी खास और विशेष संयोग से काम नहीं है। क्योंकि शुक्र अपने स्वभाव के कारण कहीं ना कहीं इनको शुभ और अच्छे परिणाम को देने वाले माने जाते हैं। इस राशि वालों के लिए भी 2026 चैत्र नवरात्र में वांछित तथा सुखद परिणाम सुख वैभव मिलेगा। इस तरह से देखा जाए तो, इस नवरात्रि में इन राशि वालों के लिए विशेष शुभ और सकारात्मक परिणाम मिलते हुए रहेंगे।
वृष राशि: इस राशि का स्वामी शुक्र है, इस नवरात्रि में चंद्रमा उच्च का हो करके इन्हें बहुत ही सुंदर और सकारात्मक परिणामों को देने वाला रहेगा। जिससे कार्य और व्यापार में इन्हें महत्वपूर्ण सफलता को दर्शा रहा है। इस राशि के जातकों की भी किस्मत इस नवरात्रि में चमकेगी और उन्हें महत्वपूर्ण सफलता इस नवरात्र जरूर मिलेगी।
FAQS\ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-
Q. चैत्र नवरात्रि 2026 कब से शुरू हो रही है?
An. चैत्र नवरात्रि 2026 की शुरुआत 19 मार्च 2026, गुरुवार से हो रही है। इसी दिन से मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा का पावन पर्व आरंभ होता है।
Q. नवरात्रि 2026 में घट स्थापना का शुभ मुहूर्त क्या है?
An. नवरात्रि 2026 में घट स्थापना का पहला शुभ मुहूर्त सुबह 6:54 से 7:41 बजे तक रहेगा। यदि इस समय घट स्थापना न कर सकें तो अभिजीत मुहूर्त 11:52 से 12:39 बजे तक भी शुभ माना गया है।
Q. नवरात्रि के पहले दिन किस देवी की पूजा की जाती है?
An. नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री और मां पार्वती का स्वरूप माना जाता है।
Q. मां शैलपुत्री को कौन सा भोग और रंग प्रिय है?
An. मां शैलपुत्री को खीर, मालपुआ, बर्फी और मीठे फल का भोग प्रिय होता है। वहीं पूजा में सफेद और हल्का गुलाबी रंग शुभ माना जाता है।
Q. नवरात्रि में मां दुर्गा के कितने रूपों की पूजा की जाती है?
An. नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री।
Q. नवरात्रि में घट स्थापना का क्या महत्व है?
An. घट स्थापना को शक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। यह देवी दुर्गा के स्वागत का संकेत होता है और पूरे नौ दिनों तक देवी की पूजा का प्रारंभ इसी से किया जाता है।




