भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा 2025!
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा, जिसे रथ महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है! यह सबसे पुराने और सर्वाधिक मनाए जाने वाले हिंदू त्योहारों में से एक महत्वपूर्ण पर्व है! जो मुख्य रूप से पुरी के भगवान जगन्नाथ से की आस्था से सम्बन्धित है! क्या आप जानते हैं, साल 2025 में, यह जगन्नाथ रथ यात्रा कैसे और कब शुरू हो रही है? क्या आपको इस यात्रा के पीछे का महत्व पता है? नही! तो चलिए आज के इस ‘मंगल भवन’ के लेख में, हम भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा के बारे में, जान लेते हैं-
साल 202 वर्ष उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी मंदिर में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन 27 जून को रथ यात्रा निकाली जाएगी। इसकी तैयारियां पूरे जोरों शोर से चल रही हैं। अक्षय तृतीया के दिन से रथों का निर्माण कार्य होना शुरू हो जाता है! यानी साल 2025 में, मुख्य रथ यात्रा का पर्व 27 जून को मनाया जाएगा! यह रथ यात्रा, नीलाद्रि विजय, रथ यात्रा के नाम से जाना जाएगा, जिसमें, देवताओं को पूरे शहर में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ घुमाया जाता है! जिसका भव्य समापन 5 जुलाई को होगा! हालांकि यह, रथों का मार्ग केवल 3 किलोमीटर है, लेकिन सड़कों पर लोगों की भीड़ के कारण, उन्हें गुंडिचा देवी मंदिर तक पहुँचने में लगभग 2 घंटे लग सकते हैं।
कहा जाता है कि, भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने के लिए पूरी में, लाखों भक्तों की भीड़ उमड़ती है! भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए यह एक भव्य दर्शन के लिए आस्था, भक्ति और सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक होता है, जिसमें हजारों लोग अपनी-अपनी श्रद्धा से शामिल होते हैं! आइये, इस भव्य रथ यात्रा के शुभ मुहूर्त के बारे में जान लेते हैं-
कृपया 01141114242 पर कॉल करें, (पहली कॉल 3 मिनट के लिए निःशुल्क है।)
जगन्नाथ रथ यात्रा 2025- समय व शुभ मुहूर्त
जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा 2025 के प्रमुख अनुष्ठान और शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं-
- 13 जून से शुरू होकर 26 जून तक-
- 26 जून-गुंडीचा मरजन
- 27 जून- जगन्नाथ रथ यात्रा
- 1 जुलाई – हेरा पंचमी
- 4 जुलाई- बहुदा यात्रा
- 5 जुलाई- सुनाबेसा
- 5 जुलाई- निलाद्री विजया
जगन्नाथ रथ यात्रा की यह पूरी परंपरा कुल 9 दिनों तक चलती है, और इसका समापन निलाद्री विजया के साथ किया जाता है! साल 2025 में, यह रथ यात्रा शुक्रवार, 27 जून 2025 से शुरू की जाएगी! यह पर्व हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है!
- द्वितीया तिथि शुरू – 26 जून, दोपहर 1 बजकर 24 मिनट से
- द्वितीया तिथि समाप्त – 27 जून, सुबह 11 बजकर 19 मिनट तक
जगन्नाथ रथ यात्रा का पौराणिक महत्व
जगन्नाथ रथ यात्रा का महोत्सव, 800 साल से भी ज्यादा पुराना है! विभिन्न पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, यह सिर्फ एक रथ यात्रा ही नहीं है बल्कि, मोक्ष को प्राप्त करने का समय माना जाता है! जिसका सम्बन्ध अध्यात्म, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्व रखता है! इस दिन, तीनों देवताओं – भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा – को जगन्नाथ मंदिर में उनके गर्भगृह से बाहर लाया जाता है! उन्हें, विशाल रथों पर विराजमान कर, हज़ारों भक्त पुरी की सड़कों से गुंडिचा मंदिर तक खींचते हैं, मान्यता यह भी है की, यह उनकी मौसी का घर है!
जगन्नाथ की भव्य यात्रा का विस्तृत वर्णन स्कंद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण जैसे प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में भी बताया गया है! मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ कोई और नहीं बल्कि भगवान कृष्ण का ही रूप हैं! और यह त्यौहार गुंडिचा मंदिर में उनकी साल में एक बार की यात्रा का प्रतीक है!
जगन्नाथ रथ यात्रा- धार्मिक महत्व (महाकाव्य)
जगन्नाथ भगवान के बारे में, धार्मिक पुराणों के अनुसार, जब युद्ध के बाद भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था, तो उनके अवशेष (हृदय या हड्डी का एक टुकड़ा) एक लकड़ी के लट्ठे में रखे गए थे, जो कुछ समय बाद भगवान जगन्नाथ के रूप में मूर्ति बन गए! दैवीय इच्छा ने राजा इंद्रद्युम्न को लट्ठा खोजने और पुरी मंदिर बनाने के लिए आदेश दिया! पुरी में रथ यात्रा के उत्सव का आयोजन का जिम्मा राजा इंद्रद्युम्न को दिया गया था , जो जगन्नाथ मंदिर का निर्माण करने वाले एक पवित्र शासक थे!
इसके बाद, कई वर्षों तक ओडिशा के गंगा और गजपति नाम के राजाओं ने इस परंपरा को आगे वैसे ही उत्साह पूर्वक जारी किया! इतना ही नहीं, अंग्रेज़ भी इस त्यौहार के भव्य पैमाने और आध्यात्मिक ऊर्जा से आश्चर्य थे! जगन्नाथ मंदिर की रथ यात्रा यहां के अद्वितीय और अजेय रथों की भव्य दृश्य और परंपरा को परिभाषित करता है! और इसमें, पुरी के राजा स्वयं छेरा पन्हारा अनुष्ठान (रथों की सफाई) करते हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि भगवान की नज़र में सभी एक समान हैं! कोई भी छोटा या बड़ा नहीं है!
जगन्नाथ रथ यात्रा- शाश्वत प्रतीक
जगन्नाथ रथ यात्रा का महोत्सव, भगवान कृष्ण के अपने भक्तों के प्रति प्रेम और गर्भगृह से बाहर आकर सभी से मिलने की उनकी इच्छा का एक शाश्वत प्रतीक है! जिसमें भक्तों को मोक्ष और सुख का आनंद मिलता है! यह यात्रा, आत्मा की मुक्ति की ओर जाने का प्रतीक स्वरूप है! जिसमें रथ शरीर के रूप में है, और भक्तों द्वारा खींची जाने वाली रस्सियाँ भक्ति की शक्ति का प्रतीक हैं जो मोक्ष की ओर ले जाई जाती है!
जगन्नाथ रथ यात्रा, केवल एक दृश्य या उत्सव नहीं है – यह प्रेम, आत्म-समर्पण और दिव्य संबंध की एक आंतरिक यात्रा मानी जाती है! जिसमें, देवताओं को अपने भव्य मंदिर से बाहर निकलते हुए देखना, यानी, स्वयं भगवान का अपने भक्तों से मिलने बाहर आते हैं! जिसमें, मन को एक आत्मीय सुख और हवा में गूंजते “जय जगन्नाथ!” के मंत्रमुग्ध कर देने वाले नारे भक्तों को एक प्रेम की लय में बांध देते हैं! यदि आप कभी ऐसी जीवंत परंपरा को देखना चाहते हैं जहाँ पौराणिक कथाएँ, भावनाएँ और भक्ति एक साथ समागम होता हो, तो, पुरी में रथ यात्रा एक ऐसा सुन्दर अनुभव है जिसे आपका मन कभी छोड़ना नहीं चाहेगा!
रथ में खींची जाने वाली रस्सियों और रथ के आश्चर्यजनक रहस्य
स्कंद पुराण के अनुसार, मान्यता है कि, जगत के पालनहार श्री हरि जगन्नाथ हर साल अपनी रथ यात्रा के दौरान अपने भक्तों को दर्शन देने और गुंडीचा मंदिर में विश्राम करने के लिए बाहर निकाले जाते हैं! यह यात्रा चार धामों में से एक, पुरी में निकलती है! जो कि, सभी यात्राओं में सर्वे श्रेष्ठ यात्रा भी मानी जाती है!

जगन्नाथ की भव्य यात्रा में- तीन रथ होते हैं
भगवान जगन्नाथ की भव्य यात्रा में, सबसे आगे बलभद्र का रथ होता है, जिसका नाम तालध्वज है! इसके बाद सुभद्रा का रथ दर्पदलन चलता है! और सबसे पीछे के रथ में, नंदीघोष भगवान जगन्नाथ सवार होते हैं! इन रथों पर सवार होकर वह करीब 3 किमी दूर स्थित गुंडीचा माता के मंदिर में जाते हैं, जहां भगवान जगन्नाथ 10 दिन तक विश्राम करते हैं!
रथ की रस्सियों के भी होते हैं नाम
जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे विशेष बात यह है कि, जिस प्रकार भगवान जगन्नाथ के तीन रथ के नाम होते हैं, उसी प्रकार, उन्हें खींचने वाली रस्सियों के भी अलग-अलग नाम होते हैं! भगवान जगन्नाथ के 16 पहियों वाले नंदीघोष रथ की रस्सी को ‘शंखचूड़ नाड़ी’ के नाम से पुकारा जाता है! वहीं, 14 पहियों वाले बलभद्र के रथ की रस्सी को ‘वासुकी’ नाम से पुकारा जाता है! कहा जाता है। बीच में चलने वाले 12 पहियों के रथ को ‘स्वर्णाचूड़ा नाड़ी’ के नाम की रस्सी से खींचा जाता है!
अब यह भी एक विशेष बात है कि, रथ को कौन खींच सकता है? तो, ऐसा कोई विशेष भक्त नहीं है, कोई भी व्यक्ति जो आस्था के साथ पुरी स्थान जाता है, वह रथ की रस्सियों के जरिए उसे खींच सकता है! फिर चाहे वह किसी भी जाति, पंथ या धर्म का हो! ऐसी भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की रहस्यमयी बात यह भी है कि,जो भी व्यक्ति रथ की रस्सियों को पकड़कर खींचता है, वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर लेता है! इस प्रकार रथ की रस्सियों के महत्व और यात्रा के आनंद को बताया गया है-
- माना जाता है कि रथ की रस्सी को खींचकर 13 कदम चलने से भी मोक्ष मिलता है!
- जगन्नाथ यात्रा विश्व के सबसे बड़े मंदिर की रसोई से महाप्रसाद ग्रहण करने का सौभाग्य मिलता है!
- स्वर्णिम पोशाक धारण किए भगवान जगन्नाथ और नीलाद्रि विजय को देखना और गुंडिचा मंदिर में संध्या दर्शन की अद्भुत अनुभूति का आनंद मिलता है!
गुंडिचा मंदिर और बहुदा यात्रा का महत्व
- गुंडीचा मंदिर
भगवान जगन्नाथ की यात्रा के पहले दिन देवी-देवताओं को विशाल और सुन्दर रथों में विराजमान कर, गुंडीचा मंदिर ले जाया जाता है! जो मुख्य मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर है। जहां वे विश्राम करते हैं!
- हेरा पंचमी
इसके बाद रथ यात्रा के 5वें दिन, माता लक्ष्मी अपने पति भगवान जगन्नाथ से मिलने गुंडीचा मंदिर जाती हैं! यह अनुष्ठान “हेरा पंचमी” नाम से जाना जाता है! जिसमें, माता लक्ष्मी जी द्वारा भगवान के प्रति नाराजगी व्यक्त करने की एक सुंदर लीला का आयोजन भी किया जाता है!
- बहुदा यात्रा
इसके बाद नौवें दिन, देवताओं को वापस मुख्य मंदिर में लाया जाता है! इस वापसी यात्रा को “बहुदा यात्रा” के नाम से जानते हैं! भगवान जगन्नाथ की यात्रा का यह दिन भी बहुत पवित्र और भव्य होता है!
FAQS\ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. भगवान जगन्नाथ की यात्रा क्यों निकाली जाती है?
An.स्कंद पुराण के अनुसार, मान्यता है कि, जगत के पालनहार श्री हरि जगन्नाथ हर साल अपनी रथ यात्रा के दौरान अपने भक्तों को दर्शन देने और गुंडीचा मंदिर में विश्राम करने के लिए बाहर निकाले जाते हैं! यह यात्रा चार धामों में से एक, पुरी में निकलती है! जो कि, सभी यात्राओं में सर्वे श्रेष्ठ यात्रा भी मानी जाती है!
Q. भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का उत्सव कब से शुरू हो रहा है?
An. जगन्नाथ रथ यात्रा की यह पूरी परंपरा कुल 9 दिनों तक चलती है, और इसका समापन निलाद्री विजया के साथ किया जाता है! साल 2025 में, यह रथ यात्रा शुक्रवार, 27 जून 2025 से शुरू की जाएगी! यह पर्व हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है!
Q. भगवान जगन्नाथ किसका प्रतीक हैं?
An. जगन्नाथ भगवान के बारे में, धार्मिक पुराणों के अनुसार, जब युद्ध के बाद भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था, तो उनके अवशेष (हृदय या हड्डी का एक टुकड़ा) एक लकड़ी के लट्ठे में रखे गए थे, जो कुछ समय बाद भगवान जगन्नाथ के रूप में मूर्ति बन गए! इसके बाद, दैवीय इच्छा ने राजा इंद्रद्युम्न को लट्ठा खोजने और पुरी मंदिर बनाने के लिए आदेश दिया!
Q. भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में कौन कौन से रथ होते हैं?
An. भगवान जगन्नाथ की भव्य यात्रा में, सबसे आगे बलभद्र का रथ होता है, जिसका नाम तालध्वज है! इसके बाद सुभद्रा का रथ दर्पदलन चलता है! और सबसे पीछे के रथ में, नंदीघोष भगवान जगन्नाथ सवार होते हैं! इन रथों पर सवार होकर वह करीब 3 किमी दूर स्थित गुंडीचा माता के मंदिर में जाते हैं, जहां भगवान जगन्नाथ 10 दिन तक विश्राम करते हैं!




