पूर्णिमा 2026 ! जानें, साल भर की सभी पूर्णिमा तिथि, व्रत का महत्व, कथा नियम, लाभ और विशेष उपाय की सम्पूर्ण जानकारी |

पूर्णिमा 2026

हिंदी पंचांग के अनुसार, पूरे साल में, कुल 12 पूर्णिमा की तिथि आती है। इनमें से विशेष रूप से 5 पूर्णिमा तिथि सबसे अधिक महत्व है। इसके अलावा, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शास्त्रों में मान्यता है कि, पूर्णिमा तिथि के दिन व्रत रखकर चंद्रमा के साथ शिव जी, माता पार्वती और लक्ष्मी नारायण भगवान की पूजा करने से धन-वैभव और आत्मशांति की प्राप्ति होती है। 

तो, आइए जानते हैं आज के इस ‘मंगल भवन’ के लेख   में, हम आपको पुरे साल आने वाली सभी पूर्णिमाओं के साथ-साथ साल की पांच महत्वपूर्ण पूर्णिमा व्रत का महत्व, कथा और इस दिन किए जाने वाले सभी उपायों की जानकारी देंगे। हमारे साथ लेख में अंत तक बने रहें और हमें अपने महत्वपूर्ण सुझाव जरूर दें।

पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा की तिथि दिन, समय और हर महीने में, चंद्रमा की स्थिति के अनुसार बदलते रहती हैं। यानी, पूर्णिमा माह में तब आती है, जब चंद्रमा अपनी 15वीं कला में पूर्ण रूप में होता है। इसलिए, पूर्णिमा की सही तिथि और समय की जानकारी होना बहुत जरूरी है। ताकि, व्रत के दिन कथा सुनना, और दान करने का पूर्ण फल मिल सके।

दिनांक दिन पूर्णिमा तिथि 
3 जनवरी, 2026शनिवार पौष पूर्णिमा
1 फरवरी, 2026रविवार माघ पूर्णिमा
3 मार्च, 2026मंगलवार फाल्गुन पूर्णिमा
1 अप्रैल, 2026 बुधवार चैत्र पूर्णिमा
1 मई, 2026 शुक्रवार वैशाख पूर्णिमा (बुद्ध पूर्णिमा)
30 मई, 2026 शनिवार ज्येष्ठ अधिक पूर्णिमा 
29 जून, 2026सोमवार ज्येष्ठ पूर्णिमा
29 जुलाई, 2026बुधवार आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा)
27 अगस्त, 2026 गुरुवार  श्रावण पूर्णिमा (रक्षा बंधन)
26 सितंबर, 2026शनिवार भाद्रपद पूर्णिमा 
25 अक्टूबर, 2026रविवार अश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) 
24 नवंबर, 2026मंगलवार कार्तिक पूर्णिमा
23 दिसंबर, 2026बुधवार मार्गशीर्ष पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा 2026 में, बुधवार, 29 जुलाई 2026 आषाढ़ महीने (जून-जुलाई) की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। और भारतीय संस्कृति में इसका विशेष महत्व है। यह दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है: ‘गु’ का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ का अर्थ है अंधकार दूर करने वाला। यानी, गुरु वह है जो जीवन से अज्ञान के अंधकार को दूर करता है। इसके साथ ही, बौद्ध धर्म को मानने वाले ‘गुरु पूर्णिमा’ भगवान बुद्ध की याद में भी मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, भगवान बुद्ध ने इसी दिन उत्तर प्रदेश के सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था। 

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, यह मान्यता है कि श्री कृष्ण सभी सोलह कलाओं से युक्त थे। शरद पूर्णिमा 2026 के दिन चन्द्रमा से उत्पन्न होने वाली रश्मियाँ (किरणें) भी विशेष रूप से अद्भुत, स्वास्थ्यप्रद और पुष्टिवर्धक गुणों से युक्त मानी जाती है। साथ ही यह मान्यता भी है कि इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है। साल 2026 में, शरद पूर्णिमा का व्रत दिनांक 26 अक्टूबर 2026 रविवार को आने वाली है। इस पूर्णिमा को ‘कोजागरी पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। 

साल 2026 मार्च, की अंतिम पूर्णिमा मानी जाती है। इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा 3 मार्च 2026 को आने वाली है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार,  इसी दिन चंद्र ग्रहण भी लग रहा है। और होलिका दहन  भी इसी पूर्णिमा तिथि पर किया जाता है। इसलिए, इस बार यह पर्व ग्रहण के प्रभाव में मनाया जाएगा। यदि संभव हो तो इस दिन पवित्र नदी में स्नान करें, या घर पर नहाते समय पानी में गंगाजल मिलाएं।

पूर्णिमा के दिन ग्रहण समाप्त होने के बाद दान करना विशेष फलदायी माना गया है। 3 मार्च की शाम या अगले दिन सुबह सफेद वस्तुओं जैसे चावल, दूध, दही या वस्त्र का दान करना शुभ है। इससे कुंडली में चंद्रमा मजबूत होता है और जीवन के मानसिक तनाव व दोष दूर होते हैं।

फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 2 मार्च 2026 को शाम 5:55 बजे शुरू होगी और 3 मार्च को शाम 5:07 बजे समाप्त होगी।

पूर्णिमा के दिन स्नान-दान के लिए दो शुभ मुहूर्त रहेंगे-

सुबह 5 बजकर 19 मिनट से 6 बजकर 08 मिनट तक

दोपहर 12 बजकर 27 मिनट से 1 बजकर 14 मिनट तक

इन दोनों समय को अत्यंत शुभ माना गया है। पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय शाम 6 बजकर 44 पर होगा।

यह पूर्णिमा अगस्त, माह में रक्षाबंधन के त्यौहार के रूप में मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार श्रावण मास में आने वाली पूर्णिमा श्रावण या ‘श्रावणी पूर्णिमा’ मानी जाती है। शास्त्रों में इस दिन स्नान, तप और दान का विशेष महत्व है। मध्य भारत और उत्तर भारत में कजरी पूर्णिमा का पर्व भी श्रावण पूर्णिमा के दिन ही मनाया जाता है। इस दिन यज्ञोपवीत पूजन और उपनयन संस्कार करने का विशेष विधान भी है। कुंडली में, चंद्र दोष से मुक्ति के लिए श्रावण पूर्णिमा विशेष रूप से श्रेष्ठ मानी गई है।

यह विशेष पूर्णिमा नवंबर, माह 2026 में मनाई जाती है। इस दिन गंगा स्नान और दीपदान का विशेष महत्व होता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा को वृंदा की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। जिसे तुलसी के पौधे का मानवीय रूप और अवतार माना जाता है। इसके साथ ही यह दिन भगवान विष्णु के मछली के रूप वाले अवतार ‘मत्स्य’ के जन्मदिन का भी प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव जी के पुत्र कार्तिकेय का जन्म भी इसी दिन हुआ था।

शास्त्रों में,  पूर्णिमा के व्रत की महिमा का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया गया है। इसका धार्मिक महत्व भी बताया गया है। प्रतिमाह एक पूर्णिमा आती है जिसका व्रत पूरे विधि-विधान से किया जाता है। और इस दिन चंद्रमा अपने पूर्ण कलाओं और बड़े आकार में होता है। आइये हम इस व्रत के महत्व और कथा के बारे में जान लेते हैं।

पुराने समय की बात है, एक गरीब ब्राह्मण दंपत्ति एक छोटे से गांव में अपना साधारण जीवन जी रहे थे। उस घर के ब्राह्मण बहुत ही धर्मात्मा और श्रद्धालु थे, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी। ब्राह्मणी भी बहुत धर्म शास्त्रों को मानने वाली, धर्मपरायण और पतिव्रता थी। वे दोनों भगवान की उपासना और पूजा-अर्चना करते थे, परंतु उनकी गरीबी खत्म नहीं हो रही थी।

एक दिन ब्राह्मण ने अपने गांव के पुजारी से अपनी आर्थिक स्थिति समस्या बताई। पुजारी ने ब्राह्मण को पूर्णिमा व्रत  करने का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि पूर्णिमा के दिन व्रत करने और भगवान विष्णु की विधिवत पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से पूजा करने से सभी प्रकार के कष्ट और समस्याओं से मुक्ति मिलती है। साथ ही, धन सम्बन्धी समस्याएं भी दूर होती हैं।

अगली बार, ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने पूरे श्रद्धा भाव से पूर्णिमा के व्रत का पालन पूरे विधि-विधान से करना शुरू किया। वे इस दिन उपवास के संकल्प के साथ, स्नान आदि से शुद्ध हो भगवान विष्णु की पुरे भाव और विश्वास से पूजा करते और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत का पारण करते।

कुछ समय पश्चात, उनके जीवन में बहुत ही चमत्कारिक परिवर्तन आया। उनकी आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे सुधरने लगी और वे एक खुशहाल और समृद्ध जीवन व्यतीत करने लगे। उनके परिवार में खुशियाँ इतनी आई कि वे फुले नहीं समाए और उनके सभी कष्ट समाप्त हो गए।

इस प्रकार, पूर्णिमा व्रत की महिमा के बारे, में कहा गया है कि, इस व्रत को महिमा अपार है। जिसके पालन से जीवन के सभी दुखों का नाश होता है। भगवान विष्णु की कृपा से भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि और धन का आगमन होता है।

शास्त्रों के अनुसार, पूर्णिमा व्रत की कथा को सुनने और पालन करने से सभी प्रकार के पुण्य की प्राप्ति होती है। देवी-देवताओं की कृपा सदैव बनी रहती है। इस दिन व्रत करने और चन्द्र देव को जल का अर्घ्य देने से जातक को मानसिक शांति, आध्यात्मिक बल, पारिवारिक सुख और धन-संपदा की प्राप्ति होती है।

ज्योतिष शास्त्र में, चन्द्रमा को मन का कारक कहा जाता है। और पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा अपनी सभी कलाओं से युक्त होता है। इसलिए इस दिन व्रत करने से मुख्य रूप से मानसिक शांति और चन्द्र देव की कृपा और शुभ प्रभाव मिलते हैं। साथ ही, भगवान विष्णु का भी आशीर्वाद मिलता है। यह व्रत पापों का नाश करने, दान-पुण्य के फल को अक्षय (कई गुना) दोगुना करने, और कुंडली में चंद्र दोष, पीड़ित चन्द्रमा और मानसिक तनाव को दूर करने के लिए विशेष रूप से शुभ फलदायी माना जाता है। 

पूर्णिमा का व्रत रखने से कुछ विशेष लाभ होते हैं। तो, आइये जान लेते हैं इस व्रत को रखने के पीछे महत्वपूर्ण कारण-

  • शास्त्रों में पूर्णिमा का व्रत करने से मन को शांति मिलती है, एकाग्रता बढ़ती है, और भय/चिंता से भी मुक्ति मिलती है।
  • पूर्णिमा के व्रत के दिन लक्ष्मी और नारायण की विधिवत पूजा करने से घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती है। और आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
  • यदि कुंडली में चंद्रमा कमजोर या पीड़ित हो, तो पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूजा और व्रत करने से चन्द्रमा मजबूत होकर शुभ प्रभाव देता है।
  • व्रत, पारिवारिक क्लेश को दूर करने और वैवाहिक जीवन को सुखी व प्रेममय बनाने के लिए उत्तम माना गया है।
  • पूर्णिमा के दिन किया गया दान, स्नान और पूजा विधि से जातक को दोगुना फल मिलता है और सत्यनारायण की कथा सुनने से अक्षय पुण्य (कभी न खत्म होने वाला) की प्राप्ति होती है। 

किसी भी व्रत के लिए कुछ नियम होते हैं, जिससे उस व्रत का पूर्ण फल मिल सके! पूर्णिमा व्रत के लिए भी कुछ ऐसे नियम होते हैं, आइए जान लेते हैं-

  • सुबह जल्दी स्नान करें, (संभव हो तो गंगा स्नान) करें।
  • पूर्णिमा के दिन व्रत का पालन करें, और भगवान विष्णु, सत्यनारायण और चंद्र देव की पूजा कर चन्द्रमा को जल अर्पित करें।
  • इस दिन दूध और चावल का दान करना उत्तम माना जाता है।
  • शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।

पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं से युक्त होता है। इसलिए इस दिन चंद्र देव, भगवान विष्णु, शिव और माँ लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी होती है। इस दिन विशेष रूप से, रात्रि में चंद्र देव को कच्चे दूध से अर्घ्य देना, खीर का भोग लगाना, विशेष मन जाता है। 

पूर्णिमा व्रत 2026
  • पूर्णिमा की रात चंद्रमा को कच्चे दूध, जल और चीनी मिलाकर अर्घ्य दें, इससे मानसिक तनाव कम होता है और सौम्यता बढ़ती है। साथ ही, चन्द्रमा मजबूत होता है।
  • शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे घी का दीपक जलाएं, क्योंकि इस दिन लक्ष्मी जी का पीपल पर वास माना जाता है।
  • इस दिन मुख्य दरवाजे पर हल्दी और जल से स्वास्तिक या ‘ॐ’ का चिन्ह बनाएं। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर घर में सकारात्मकता का संचार करता है।
  • पूर्णिमा के दिन शिवलिंग पर दूध, शहद, बेलपत्र और चंदन अर्पित करने से सुख-समृद्धि आती है।
  • पूर्णिमा पर चावल, चीनी, सफेद कपड़े, और दूध का दान करने से भाग्य मजबूत होता है।
  • रात में पूर्ण कलाओं से युक्त चाँद को 10-20 मिनट तक बिना पलक झपकाए देखने से एकाग्रता और तेज में वृद्धि होती है।
  • रात को खीर बनाकर चंद्र रोशनी में रखें और बाद में परिवार के साथ बैठकर खाने से सामंजस्य बढ़ता है।
  • पूर्णिमा के दिन शाम के समय तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक अवश्य जलाएं, इससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता है व माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है।

Q. साल में कितनी पूर्णिमा आती है?

An. हिंदी पंचांग के अनुसार, पूरे साल में, कुल 12 पूर्णिमा की तिथि आती है। इनमें से विशेष रूप से 5 पूर्णिमा तिथि सबसे अधिक महत्व है।

Q. पूर्णिमा का व्रत क्यों करना करना चाहिए?

An. ज्योतिष शास्त्र में, चन्द्रमा को मन का कारक कहा जाता है। और पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा अपनी सभी कलाओं से युक्त होता है। इसलिए इस दिन व्रत करने से मुख्य रूप से मानसिक शांति और चन्द्र देव की कृपा और शुभ प्रभाव मिलते हैं।

Q. पूर्णिमा के व्रत में क्या खाना चाहिए?

An. पूर्णिमा के व्रत में आप सुबह पूजा के बाद फलाहार ले सकते हैं, और रात्रि में, चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद आप भोजन कर सकते हैं और व्रत का पारण कर सकते हैं।

Q. पूर्णिमा के व्रत को करने से क्या लाभ मिलता है?

An. शास्त्रों के अनुसार, पूर्णिमा व्रत की कथा को सुनने और पालन करने से सभी प्रकार के पुण्य की प्राप्ति होती है। देवी-देवताओं की कृपा सदैव बनी रहती है। इस दिन व्रत करने और चन्द्र देव को जल का अर्घ्य देने से से जातक को मानसिक शांति, आध्यात्मिक बल, पारिवारिक सुख और धन-संपदा की प्राप्ति होती है।

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