वृश्चिक लग्न में सूर्य ग्रह, अति योगकारक व शुभ स्थिति! प्रभाव, विशेष फलादेश के साथ उपाय की महत्वपूर्ण जानकारी !

वृश्चिक लग्न में सूर्य

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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, वृश्चिक लग्न में जन्म लेने वाला जातक स्वभाव से शूरवीर, अत्यंत विचारशील, निर्दोष, उच्च व श्रेष्ठ विद्या से युक्त, क्रोधी, राजाओं से पूजनीय, गुणवान, शास्त्रज्ञ, शत्रु नाशक, कपटी, पाखंडी, मिथ्या वादी, तमोगुणी, होते है। इसके अलावा, ये जातक दूसरों के मन की बात को समझने वाले होते हैं।

निंदक, कटु स्वभाव वाला तथा सेवा कर्म करने वाला होता है।

शारीरिक रूप से ये, ठिगने कद-काठी और  स्थूल होते हैं। इनकी आँखें गोल और छाती चौड़ी होती है। परिवार में, वे भाइयों से द्रोह करने वाला, दयाहीन, ज्योतिष व भिक्षावृत्ति करने वाले होते हैं। ये जातक अपने जीवन काल की प्रथम अवस्था में दुखी और मध्यावस्था में सुख पाते हैं। 

इनका भाग्योदय 20 से 24 वर्ष की आयु में होता है। तो आइए आज के इस ‘मंगल भवन’ के लेख में हम आपको वृश्चिक लग्न में सूर्य की विशेष स्थिति और प्रभाव के बारे में जानकारी देंगे। हम आशा करते हैं, हमारे द्वारा लेख में दी गई जानकारी आप सभी के लिए उपयुक्त होगी।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस लग्न के जातकों को उनके उग्र स्वभाव के लिए जाना जाता है। वे अपनी मनमानी करके अपनी बात को मनवाने वाले होते हैं। ये जातक अक्सर, क्रोध युक्त, कर्मठ, हठी, चोरी से व्यापार करने वाले पुलिस तथा मिलिट्री वालों के साथ मित्र सम्बन्ध में होते हैं।

ज्योतिष शास्त्र की प्रमुख गणना में, इस लग्न में, सूर्य दसवें भाव के अधिपति होने से अशुभ नहीं माने जाते हैं। इसलिए यह स्थिति जातक के लिए, अति योगकारक और शुभ स्थिति  मानी जाएगी। क्योंकि,दशमेश सूर्य यदि लग्न में बलवान् हो तो उस जातक के पिता धनी होते हैं। ऐसे जातक बड़े बड़े कार्यों के जोखिम लेने से पीछे नहीं हटते हैं। और अपने इन्हीं कार्यों के कारण वे, विख्यात और प्रसिद्धि भी प्राप्त करते हैं। इसलिए लग्न में सूर्य की इस स्थिति को जातक के लिए, बहुत ही योगकारक माना जाता है। 

इस राशि में, यदि सूर्य बलवान हो तो वे अपनी दशा व अंतर्दशा में, जातक को राजसत्ता का अधिकारी बनने का सुख देने के कारक होते हैं। साथ ही ऐसे जातक को समाज में बहुत ही, मान-सम्मान मिलता है। इस दशा में जातक अपने हाथों से बहुत ही धार्मिक कार्य यज्ञ आदि संपन्न करते हैं। ऐसे जातक को पिता से बहुत ही धन की प्राप्ति होती है। इस अवधि में जातक को सभी कार्यों में सफलता मिलती है। 

इसके अलावा, यदि शुक्र ग्रह का सूर्य के साथ योग हो तो जातक को वाहन आदि की भी प्राप्ति होती है। लेकिन, यदि सूर्य निर्बल या पापी ग्रहों से पीड़ित है तो ऐसे जातक को राज कार्यों से हटा दिया जाता है। धार्मिक और यज्ञीय कार्यों से भी दूर रखा जाता है। सूर्य की ऐसी स्थिति में जातक के पिता को आर्थिक हानि होती है और जातक को बहुत ही अपमान का सामना करना पड़ता है। जातक को अपने कार्यों में असफलता का भी सामना करना पड़ता है।

कुल-मिलाकर, यदि हम इस लग्न में सूर्य के विशेष फलादेश की बात करें तो, दसवें भाव (सिंह राशि) का स्वामी होने के कारण एक अति योगकारक और शुभ ग्रह माने जाएंगे। और इतना ही नहीं, यहां वे लग्नेश मंगल के मित्र होने से जातक को पद-प्रतिष्ठा, करियर में सफलता, राजयोग के शुभ प्रभाव और अपार मान-सम्मान भी प्रदान करेंगे। ज्योतिष में कहा जाता है कि, सूर्य बलवान होने पर जातक को करियर में स्थिरता देने का कारक बनता है और यदि, यही सूर्य कमजोर या पीड़ित हो तो, जातक को मानहानि व संघर्ष का भी सामना करना पड़ सकता है। 

  • लग्न में, दशमेश होने के कारण सूर्य जातक को करियर में उच्च पद, सरकारी लाभ और मान-सम्मान देने के कारक होते हैं। यदि इस लग्न में, सूर्य पहले, पांचवें, नौवें दसवें भाव में हो तो जातक बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तित्व का होता है।
  • सूर्य के शुभ प्रभाव में जातक, साहसी, आक्रामक, केंद्रित और दृढ़ निश्चय होता है। वे अपने लक्ष्य को पूरा किए बिना आराम नहीं लेते हैं।
  • इसके अलावा, केंद्र/त्रिकोण (पहले, चौथे, पांचवें, सातवें, नौवें, दसवें, और ग्यारहवें, भाव में होने सूर्य के होने से वे अत्यंत शुभ, राजयोग का कारक, समाज में मान-सम्मान, और धन-संपदा में वृद्धि के कारक होते हैं।
  • इसके अलावा, तीसरे, छठे, आठवें और बारहवें भाव में कमजोर या अशुभ फल या स्थिति में होने से जातक को स्वास्थ्य समस्या (विशेषकर हृदय या आंखें) और करियर में उतार-चढ़ाव के कारक होते हैं।

इस लग्न के लिए, धन प्रदाता ग्रह गुरु बृहस्पति है। यानी आप यहाँ धनेश बृहस्पति की शुभ स्थिति से धन स्थान से संबंध जोड़ने वाले ग्रहों की स्थिति और धन स्थान पर पड़ने वाले ग्रहों की दृष्टि से जातक की आर्थिक स्थिति आय के स्रोत व सम्पूर्ण संपत्ति के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

इसके अतिरिक्त लग्नेश मंगल, भाग्येश चंद्र व लाभेश बुध की अनुकूल स्थितियां भी इस लग्न वाले जातकों की धन व ऐश्वर्य को बढ़ाने में सहायक होती हैं। वैसे, वृश्चिक लग्न के लिए बुध, मंगल, शनि ग्रह अशुभ है। गुरु बृहस्पति शुभ फलदायी है व सूर्य, चंद्र राजयोग कारक होते हैं। गुरु मारकेश होते हुए भी मारक प्रभाव में नहीं होते हैं।

  1. सूर्य के दशमेश स्थिति से जातक को सरकारी या उच्च प्रशासनिक नौकरी (IAS/PCS), नेता या उच्च पद प्राप्त होता है।
  2. भाग्य का साथ व सुख, पिता से सुख, राजयोग, धन वृद्धि और समाज में नाम व प्रसिद्धि।
  3. आत्मविश्वास, निडर, ओजस्वी और साहस में वृद्धि।
  4. चौथे भाव में शुक्र के साथ होने पर वाहन, संपत्ति और सुख-सुविधाओं की प्राप्ति। 
  1. करियर में असफलता,उतार-चढ़ाव, नौकरी में समस्या और सरकारी काम में बाधा।
  2. मानहानि, अपमान या राज्य से कष्ट के योग।
  3. अहंकार में वृद्धि और आंखों या हृदय से जुड़ी समस्याएं। 

लग्न कुंडली के पहले भाव में  सूर्य की स्थिति अनुकूल प्रभाव देने वाली होती है। ऐसे जातक, मूल निवासी मेहनती और कर्मठ होगा। उनका, वैवाहिक जीवन में स्थिर होगा। साझेदारी अच्छी और फलदायी होगी।नए अवसर देने वाला होगा।

इस भाव सूर्य के प्रभाव अनुकूल होते हैं। जातक की आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी। उत्कृष्ट वित्तीय स्थिरता के साथ जातक को परिवार का अच्छा सहयोग मिलेगा। अपने परिवार के साथ अच्छा समय व्यतीत करेंगे। थोड़ा, अभिमानी हो सकता है लेकिन, जीवन की बाधाओं को पार करने में सक्षम होगा।

इस भाव में जातक को सूर्य से मिले-जुले परिणाम देखने को मिलेंगे। छोटे भाई-बहनों के साथ गलतफहमी हो सकती है। जातक बहुत मेहनती होंगे और उनकी मेहनत और छोटी यात्राएँ फलदायी होंगी। जातक को अच्छा लाभ प्राप्त होगा। भाग्य का साथ मिलेगा। पिता के साथ अच्छे संबंध/समझदारी से बातचीत होगी।

जातक का अपनी माँ से अच्छा संबंध रहेगा। माँ के साथ अच्छा तालमेल और लगाव रहेगा। माँ के प्रति उच्च स्नेह और आदर रहेगा। जातक को वाहन, जमीन, घर आदि खरीदने में लाभ मिलेगा। साथ ही, जीवन में सभी वांछित सुख-सुविधाएं प्राप्त होंगी। दशा-अंतर्दशा में कार्य-पेशा और व्यवसाय में अच्छा धन लाभ होगा।

ऐसे जातक का पेशा मस्तिष्क/बुद्धि के अनुरूप होगा। संतान सुख के योग बनेंगे। स्वास्थ्य अच्छा रहेगा व 

प्रेम संबंधों में सफलता मिलेगी। बड़े भाई-बहनों का अच्छा सहयोग मिलेगा।

यहां सूर्य उच्च के होते है, जो अत्यंत अशुभ माना गया है। ऐसे जातक को बीमारी, कर्ज/ऋण, शत्रु, दुर्घटना, अदालती मामले/मुकदमे और प्रतियोगिता में विफलता/देरी से संबंधित सभी नकारात्मक परिणाम मिलते हैं। साथ ही जातक के व्यर्थ खर्च उच्चतम स्तर पर होंगे। जातक मानसिक अशांति का शिकार होंगे।

वैवाहिक जीवन में स्थिरता/लाभ के योग। यहां तक ​​कि व्यापार में पत्नी के साथ साझेदारी भी फलदायी होगी। साझेदारी से अच्छा धन लाभ। करियर में, नए अवसर अच्छा व्यक्तित्व और स्वास्थ्य के लिए शुभ प्रभाव मिलते हैं।

यहां जातक को सूर्य की दशा-अंतर्दशा में सभी प्रकार के नुकसान का सामना करना पड़ेगा।

काम-पेशा संबंधी प्रतिकूल परिस्थितियाँ देखने को मिलेंगी। पेशे में स्थिरता नहीं होगी या धन हानि हो सकती है यहाँ तक कि चलता हुआ काम भी रुक जाएगा। आर्थिक स्थिति खराब रहेगी। वित्तीय अस्थिरता बनी रहेगी। परिवार से सहयोग नहीं मिलेगा। मूल निवासी अपने परिवार से बहुत दूर होगा।

यहां सूर्य द्वारा अनुकूल परिणाम मिलते हैं। पिता के साथ अच्छे संबंध व पिता के प्रति उच्च आदर/देखभाल का भाव होता है साथ ही जातक को पिता से अच्छा सहयोग मिलता है। जातक अपने पिता के पेशे से संबंधित या उनके मार्गदर्शन में किसी भी पेशे में उत्कृष्ट सफलता प्राप्त करते हैं। जातक धर्म में विश्वास रखने वाला होगा।

सूर्य अपने ही घर में होने से जातक को सभी प्रकार के शुभ परिणाम देते हैं। दशा-अंतर्दशा में कार्य-पेशा के संबंध में जातक को लाभ होगा। जातक को नई ऊंचाइयों का अनुभव होगा और पेशे के क्षेत्र में नए अवसर प्राप्त होंगे। आर्थिक स्थिरता बनी रहेगी। जातक का अपनी माँ से अच्छा संबंध होगा। जातक को वाहन, जमीन, घर आदि खरीदने में लाभ मिलेगा व जीवन में सभी भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त होंगी।

यहां जातक को सूर्य से अनुकूल परिणाम मिलेंगे। परिवार में, बड़े भाई-बहनों के साथ अच्छे संबंध/समझदारी का व्यवहार होगा। साथ बड़े भाई-बहन सहयोगी होंगे। छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याएं हमेशा बनी रह सकती हैं। यह स्थिति जातक के स्मृति, इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास के लिए शुभ है। जातक को प्रेम संबंधों में सफलता मिलेगी।

वृश्चिक लग्न में सूर्य ग्रह

यहां सूर्य का प्रभाव जातक के लिए प्रतिकूल है। दशा-अंतर्दशा में पेशे से संबंधित हानियाँ होंगी। विदेश में पेशे की स्थापना के लिए यह स्थिति शुभ है। मानसिक अशांति के साथ जातक के अनावश्यक खर्च भी अधिक होंगे।बीमारी, कर्ज/ऋण, शत्रु, दुर्घटना, अदालती मामले/मुकदमे और प्रतियोगिता में विफलता/देरी से संबंधित सभी नकारात्मक परिणाम मिलेंगे।

  • यदि कुंडली में सूर्य बलवान न हो तो जातक को माणिक रत्न धारण नहीं करना चाहिए।
  • प्रतिदिन सूर्य को जल अर्पित करें,और रविवार का व्रत रखें।
  • सूर्य को मजबूत करने के लिए, आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करना सबसे शुभ होता है।

कुल-मिलाकर ऊपर दी गई जानकारी के अनुसार, वृश्चिक लग्न में सूर्य की स्थिति उनके लग्न के दसवें भाव (सिंह राशि) का स्वामी होकर अत्यंत शुभ प्रभाव देने वाली होगी। साथ ही, यह केंद्र त्रिकोण राजयोग कारक और लग्नेश मंगल का मित्र भी है इसलिए यह जातक के लिए बहुत शुभ फलदायी है। इसलिए कुंडली में सूर्य की शुभता को बढ़ाने के लिए, आपको सूर्य सम्बन्धित उपाय भी करना चाहिए। 

Q. वृश्चिक लग्न के लिए सूर्य ग्रह के क्या विशेष फला देश होते हैं ?

An. इस लग्न में, सूर्य दसवें भाव के अधिपति होने से अशुभ नहीं माने जाते हैं। इसलिए यह स्थिति जातक के लिए, अति योगकारक और शुभ स्थिति  मानी जाएगी। क्योंकि,दशमेश सूर्य यदि लग्न में बलवान् हो तो उस जातक के पिता धनी होते हैं। ऐसे जातक बड़े बड़े कार्यों के जोखिम लेने से पीछे नहीं हटते हैं।

Q. क्या, सूर्य के बलवान नहीं होने पर रत्न पहना जा सकता है?

An. नहीं, यदि कुंडली में सूर्य बलवान न हो तो जातक को माणिक रत्न धारण नहीं करना चाहिए।

Q. वृश्चिक लग्न में सूर्य के अशुभ प्रभाव में क्या होता है?

An. इस लग्न करियर में असफलता, उतार-चढ़ाव, नौकरी में समस्या और सरकारी काम में बाधा। मानहानि, अपमान या राज्य से कष्ट के योग बनते हैं।

Q. वृश्चिक लग्न के लिए कौन से ग्रह शुभ व योग कारक हैं?

An. वृश्चिक लग्न के लिए बुध, मंगल, शनि ग्रह अशुभ है। गुरु बृहस्पति शुभ फलदायी है व सूर्य, चंद्र राजयोग कारक होते हैं। गुरु मारकेश होते हुए भी मारक प्रभाव में नहीं होते हैं।

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