वृश्चिक लग्न में मंगल ग्रह का प्रभाव!, लग्न का निर्धारण, मारक/ कारक, उसकी शुभ/अशुभ स्थिति तथा भावगत फल देने की विशेष जानकारी

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ज्योतिष शास्त्र में लग्न एवं ग्रह एक ऐसा आधार है। जिसके बिना न तो कुण्ड़ली का निर्माण हो सकता है और नही संबंधित कुण्ड़ली के संदर्भ उसके घटित होने वाले शुभ तथा अशुभ परिणामों को भी जाना एवं समझा जा सकता है। इस प्रकार लग्न के महत्व को समझते हुए इस प्रक्रिया में गणित ज्योतिष का बोध होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। यदि आप गणित के द्वारा लग्न को स्पष्ट करना नहीं जानते हैं तो, आप यह समझ ही नहीं पायेगें कि, आपके सामने प्रस्तुत लग्न सही या फिर गलत है। अतः लग्न के संबंध में जानने के लिए हमें पहले गणित ज्योतिष का सहारा लेना पड़ता है। तब हम फलित ज्योषित में लग्न तथा उससे जुड़े फल कथनों के संदर्भों को जान एवं समझ पायेगे। 

तो आइयें हम इस लग्न के संदर्भ में आचार्य अंकुश के द्वारा मंगल भवन की इस खास प्रस्तुति  में वृश्चिक लग्न में मंगल किस प्रकार के सकारत्मक एवं नकारात्मक परिणमों को देने वाला रहता है। इसका क्या प्रभाव जातक एवं जातिकाओं के जीवन में पड़ता है। मंगल इस लग्न के लिए कितना रहेगा मंगलकारी और कितना रहेगा अमंगलकारी इन संभी तथ्यों को हम जाने एवं समझेंगे। अतः इस लेख को अंत तक जरूर पढ़े। आपके बहुमूल्य सुझावों को हम सादर आमंत्रित करते हैं। 

किसी भी जातक एवं जातिका की जन्म राशि क्या होती है? उसका क्या महत्व होता है? इन सभी प्रश्नों के संदर्भ में यह ज्ञात होता है कि, राशि किसी भी जातक एवं जातिकाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्योतिष शास्त्र के द्वारा ही किसी भी बालक एवं बालिका के नक्षत्र एवं उसकी राशि का हमें ज्ञान होता है। जब इसे गणित के द्वारा साधा एवं जाना जाता है तो, व्यक्ति के नक्षत्रों के अनुसार उसके नाम का पहला अक्षर हमें ज्ञात होता है। और नक्षत्र के अनुसार चन्द्रमा की गति के द्वारा व्यक्ति की जन्म राशि हमें ज्ञात होती है। इस क्रम में प्राप्त राशि को जन्म राशि की संज्ञा दी जाती है। किन्तु स्थूलता से समझने के लिए जैसे किसी का जन्म मघा नक्षत्र में है तो, उसकी सिंह राशि होगी। 

ज्योतिष शास्त्र में गणित ज्योतिष के द्वारा ही लग्न का निर्धारण किया जाता है। लग्न किसी भी जातक एवं जातिका के लिए उसके जन्म समय का एक तरह से प्रमुख विवरण होता है। जो हमें भचक्र में 12 राशियों एवं 27 नक्षत्रों के द्वारा प्राप्त होता है। किसी भी बालक एवं बालिका के जन्म के समय कौन सा लग्न था। इसका ज्ञान हमें पूर्वी क्षितिज में उसके जन्म के समय उदित होने वाली लग्न के द्वारा ही मिल जाता है। इस प्रक्रिया को संक्षेप में लग्न साधन या फिर लग्न स्पष्ट द्वारा जान एवं समझ सकते हैं।

इस लग्न के जातकों के कुछ खास एवं प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं यह जातक देखने में सुन्दर और आकर्षक प्रतीत होते हैं। इनके बाल प्रायः घुघराले तथा यह श्याम वर्ण वाले और उन्नत वृक्ष स्थल तथा ठोड़ी होती है। यह साहसी और वीर तथा निडर स्वभाव वाले होते हैं। यह बोलते वक्त प्रभावशाली शब्द एवं भाषा का प्रयोग करते हैं। किन्तु सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन में अधिक स्पष्टवादी और उदासीन व्यवहारों के कारण परेशान होते रहते हैं।

यह नेतृत्व क्षमताओं से युक्त एवं राजसी ठाठ को पसंद करने वाले तानाशाह प्रवृत्ति वाले होते हैं। यह किसी भी विषय में अपनी बात तभी रखते है। जब इन्हें यह पता चल जाए कि, वह जो कह रहे हैं, वह तथ्य परक और सही है तभी यह अपनी बात आगे कहते हैं।

यह कू्रर तथा हिंसक प्रवृत्ति के होते है। जिससे यह छोटे अपराध भी करते रहते हैं। यह एकांत जीवन को अधिक पसंद करते है। तथा यदि कोई इन्हें ऐसी जिम्मेदारी एवं कार्य दे दिए जाएं जो चुनौती पूर्ण हो, उन्हें यह करने में पीछे नहीं रहते है। ऐसे कामों को यह अकेले ही करने के लिए तैयार रहते हैं। जब इन्हें लगता है कि, कार्य मुश्किल एवं कठिनाइयों से भरा है तो, यह उसे और लोगों के साथ करने के लिए तैयार होते हैं। किन्तु अपने हिसाब एवं समझ के साथ ही कार्य करना पसंद करते हैं। दूसरे के कार्यों में इन्हें दखल देने की आदत नहीं होती है।

मंगल ग्रह को ऊर्जा एवं शक्ति से भरपूर माना जाता है। यह बलवान तथा नवग्रह मण्ड़ल में सेनापति की भूमिका में रहने वाला होता है। यह साहस और हिम्मत तथा जोश से भरा हुआ रहता है। यह अपने बल एवं पराक्रम के द्वारा शत्रुओं के किले को जीतने वाला होता है। तथा ऐसी योजनाओं को बनाने में लगा हुआ रहता है। जिससे यह अपने सेना में जोश एवं उमंग को भर दें। और जरूरत पड़ने पर शत्रु के किले को फतह करते हुए बड़ी जीत हासिल कर लें। मंगल को इस लग्न के लिए सम माना गया है। क्योंकि यह लग्न का स्वामी होकर रोगेश भी है। यानी लग्नेश होने के कारण यह कुछ शुभ हो जाता है। किन्तु लग्नगत अशुभ परिणामों को देने वाला होता है।  

इस लग्न के स्वामी मंगल ग्रह हैं जो कि, पराक्रम एवं साहस से जुड़े हुए है। मंगल अपने बल एवं पराक्रम तथा अग्नि तत्व के कारण ऊर्जा से भरा हुआ नवग्रह मण्ड़ल का सेनापति है। इस लग्न में इसे ज्योतिषीय सूत्रों में समसंज्ञक माना गया है। हालांकि मंगल स्वभाव से क्रूर एवं तामसिक ग्रह है। किन्तु लग्न से यहाॅ संबंध होने के कारण इसे समसंज्ञक माना गया है। 

यहाॅ मंगल यदि लग्नगत है तो, वह प्रथम भाव में होने पर चैथे तथा सातवें और आठवें स्थानों को अपनी दृष्टि से देखेगा। किन्तु प्रथम भाव में होने पर मंगल हाॅनिप्रद होता है। वहाॅ आपके सेहत आदि को नुकसान देने वाला होता है।

मंगल की महादशाः  ज्योतिष में महादशा के द्वारा ग्रहों की शुभता एवं अशुभता का स्तर कैसे रहेगा। और उसकी तीव्रता तथा फल देने की क्षमता किस प्रकार है आदि का हमें ज्ञान होता है। किन्तु मंगल यहाॅ लग्नेश एवं रोगेश होने के कारण मिश्रित परिणामों को देने वाला रहेगा। यदि मंगल शुभ स्थिति में कुण्ड़ली में है तो, जातक के आत्मविश्वास तथा बल एवं पौरूष में वृद्धि करेगा। वह अपने कार्यों में दक्ष तथा सेना एवं पुलिस से जुड़े कामों में सफलता आदि प्राप्त करता है। यदि मंगल खराब हैं तो, अशुभ फलों को देगा।

इस लग्न के स्वामी ग्रह मंगल हैं जो, प्रथम भाव के स्वामी तथा रोग भाव के स्वामी है। इसके लिए शुक्र को मारक श्रेणाी में रखा गया है।

इस लग्न के लिए मंगल ग्रह सम श्रेणी में शुमार है। यह यदि अच्छी स्थिति में कुण्ड़ली में विद्यमान हैं तो, वांछित फलों को देने वाला रहेगा। किन्तु पाप पीड़ित होने के कारण इसके नकारात्मक परिणाम बढ़ जाते है। जैसे सेहत में चोट भय, जलन, पीड़ा, रक्तादि विकार होने के आसार बन जाते हैं।

इस लग्न के जातक आत्म संयम एवं विश्वास से भरे हुए रहते हैं। जिससे अपने बल एवं पराक्रम के द्वारा कई कार्यो में सफलता को अर्जित करते हैं।

इस लग्न का स्वामी होने के नाते व्यक्ति को जिज्ञासु बनाता है। जब इन्हें सफलता नहीं मिलती है। तो, फिर यह पुनः विजय श्री हासिल करने के लिए नए शिरे से कोई योजना बनाना शुरू कर देते है।

इस लग्न में यदि मंगल लग्नस्थ हो तो, भी अशुभ माना जाता है। जिससे शरीर में विकार उत्पन्न होते रहते हैं।

1- वृश्चिक लग्न की कुण्ड़ली में यदि मंगल पहले, चैथे, सप्तम, अष्टम और बारहवें भाव में विद्यमान हो तो, इसे मांगलिक दोष के रूप में जाना जाता है।

2- इस लग्न में मंगल लग्न एवं रोग भाव का स्वामी है। जिससे इसे इस लग्न के लिए सम कहा जाता है।

3- लग्न के स्वामी श्री मंगल है। किन्तु यहाॅ यह सम माने जाते है। लग्नेश होने के कारण इनकी क्रूरता कुछ यहाॅ पर कम आंकी जाती है। किन्तु अशुभ प्रभाव बने रहते हैं।

वृश्चिक लग्न के लिए कारक ग्रह

1- इस लग्न के लिए शुक्र मारक ग्रह है।

2-  इस लग्न के लिए गुरू को शुभप्रद कहा जाता है क्योंकि यहाॅ पंचम भाव का स्वामी है। इसी प्रकार चन्द्रमा को भी कारक माना जाता है।

यदि इस लग्न में मंगल के अशुभ प्रभाव मिलें तो, करें यह प्रभावशाली उपाय

1-  श्री हनुमान जी की सेवा एवं बंजरंग बाण का पाठ करें।

2- लाल मसूर, लाल कपड़े, तथा गुड़ एवं पके हुए फल आदि का दान देना चाहिए।

3- श्री भौमाय नमः मंत्र का जाप प्रतिदिन 108 बार जरूर करें।

4-  यदि आप मांगलिक दोष से युक्त है तो, मंगल ग्रह का वैदिक मंत्रों के साथ अनुष्ठान एवं घट विवाह आदि के द्वारा शान्ति एवं पुष्टि कर्म करवायें।

5- बंदरों को प्रत्येक दिन या फिर सप्ताह में एक बार भीगे हुए चने जरूर खिलाएं।

मंगल भवन के इस वृश्चिक लग्न के लेख से जो ज्योतिषीय निष्कर्ष आ रहा है। वह बता रहा है कि, मंगल इस लग्न के लिए योग कारक नहीं बल्कि सम ग्रह की श्रेणी में आता है।

Q1. वृश्चिक लग्न में मंगल ग्रह कैसा फल देता है?

An. वृश्चिक लग्न में मंगल लग्नेश होने के कारण साहस, आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता देता है, लेकिन रोगेश होने के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न कर सकता है।

Q2. क्या वृश्चिक लग्न में मंगल शुभ माना जाता है?

An. मंगल को वृश्चिक लग्न के लिए सम ग्रह माना गया है। शुभ स्थिति में यह सफलता और पराक्रम देता है, जबकि अशुभ स्थिति में चोट, रक्त विकार और मानसिक तनाव बढ़ा सकता है।

Q3. वृश्चिक लग्न के लिए मारक ग्रह कौन है?

An. वृश्चिक लग्न के लिए शुक्र ग्रह को मुख्य मारक ग्रह माना गया है।

Q4. वृश्चिक लग्न में मांगलिक दोष कब बनता है?

An. जब मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो, तब मांगलिक दोष बनता है।

Q5. वृश्चिक लग्न वालों के लिए मंगल के अशुभ प्रभाव कैसे दूर करें?

An. हनुमान जी की पूजा, बजरंग बाण पाठ, लाल वस्तुओं का दान, “ॐ भौमाय नमः” मंत्र जाप और मंगल शांति अनुष्ठान करने से मंगल दोष कम होता है।

Q6. वृश्चिक लग्न के जातकों की प्रमुख विशेषताएं क्या होती हैं?

An. ये जातक साहसी, रहस्यमयी, आत्मविश्वासी, प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले और चुनौतीपूर्ण कार्यों को पूरा करने में सक्षम होते हैं।

Q7. वृश्चिक लग्न में मंगल की महादशा का क्या प्रभाव पड़ता है?

An. यदि मंगल शुभ हो तो करियर, पुलिस, सेना और प्रशासनिक क्षेत्रों में सफलता देता है। अशुभ होने पर विवाद, क्रोध और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं।

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