वृषभ लग्न में सूर्य ग्रह! कुंडली के चौथे भाव के स्वामी आपको देंगे बहुत कुछ, कर लीजिए ये उपाय |

वृषभ लग्न में सूर्य ग्रह

ज्योतिष शास्त्र में वृषभ लग्न (Taurus Ascendant) को राशि चक्र का दूसरा लग्न कहते है। इस लग्न के स्वामी ग्रह प्रेम और सुन्दरी के कारक शुक्र ग्रह हैं। इस लग्न का मूलांक 2 होता है। अंक शास्त्र की दृष्टि से देखें तो, इस अंक से सम्बन्धित जातकों का स्वभाव, व्यवहार कुशल होता है।शुक्र ग्रह स्वामी होने के कारण इन पर प्रभाव भी वैसा ही होता है। 

यानि वे धनी, और विलासी जीवन पसंद करने वाले होते हैं। इस राशि का राशि चिन्ह बैल है, जो कि मेहनती और जिद्दी होने का प्रतीक है। उसी प्रकार एस राशि के जातक भी बहुत मेहनती होते हैं, और अपनी  जिद से अपने लक्ष्य को पा ही लेते हैं। इसके साथ ही, इस लग्न के जातक स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं।

तो, आइए आज के इस ‘मंगल भवन’ के लेख   में आपको वृषभ लग्न में सूर्य ग्रह  की विशेष स्थिति और महत्वपूर्ण फलादेश की जानकारी विस्तार से देंगे।

ज्योतिष शास्त्र में सभी ग्रहों का विशेष महत्व बताया गया है। उन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण और देवता ग्रह की संज्ञा प्राप्त है सूर्य ग्रह। इस ग्रह को सभी ग्रहों का राजा, आत्मा, पिता, आत्मविश्वास, और स्वास्थ्य (हड्डियों, हृदय) का कारक माना जाता है। राशियों में यह सिंह राशि का स्वामी है, मेष में उच्च (10° पर) और तुला राशि में नीच का होता है। 

यदि किसी जातक की कुंडली या किसी भाव में, यह ग्रह मजबूत स्थिति और शुभ प्रभाव में हो तो उस जातक को समाज में बहुत मान-प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि, उच्च पद और प्रशासनिक सफलता मिलती है। लेकिन, कुंडली में कमजोर सूर्य आत्मविश्वास में कमी और हड्डियों/हृदय सम्बन्धी रोग और मान-प्रतिष्ठा में हानि देने के अशुभ प्रभाव देते हैं।

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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, वृष लग्न में सूर्य ग्रह चतुर्थ भाव में व स्वराशि में स्थित होकर जातक को अपनी माता व भूमि, मकान, संपत्ति आदि से सम्बन्धित मामलों में पूर्ण सुख और शुभ प्रभाव देने के कारक होते हैं। साथ ही ऐसे जातकों का पारिवारिक जीवन, बहुत ही सुखमय व्यतीत होता है। लेकिन, तेज और अधिक आत्मविश्वास के कारक सूर्य के प्रभाव से इस लग्न के जातकों में ऊपरी दिखावा करने की प्रवृत्ति होती है। इसलिए इनके मन में कुछ अशांति सदैव बनी रहती है।

इसके अलावा, इस लग्न में सूर्य यहाँ से अपनी सातवीं दृष्टि से दसवें भाव को देखते हैं। जिससे जातक को पिता, व्यवसाय और  राज्य सम्बन्धी कार्यों में असंतोष देखने को मिलता है। लेकिन, कई कठिनाई के बाद सफलता व अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

इस लग्न के लिए ग्रह सूर्य चौथे भाव का स्वामी है। इसलिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, वे सामान्यतः अशुभ ग्रह केंद्र भाव पर शासन करने पर शुभ परिणाम देने वाले हो सकते हैं। इसलिए यहाँ चौथे भाव का स्वामी होकर आत्मा के कारक के आपको शुभ प्रभाव देखने को मिलेंगे। इस राशि के जातकों को शुभ प्रभाव में, आभूषण, इत्र, संगीत, भवन निर्माण, बैंकिंग, विज्ञापन या प्रचार व व्यवसाय में अधिक सफलता और लाभ मिलेगा। 

इसके अलावा, यह भी गणना की गई है कि, सूर्य की ऐसी स्थिति से यदि वृषभ राशि के जातक कन्या या वृश्चिक लग्न वाले जातकों के साथ साझेदारी में व्यवसाय करते हैं, तो उन्हें, सफलता प्राप्त होती है। इन जातकों के पास कभी कार्य की कमी नहीं होती है। वे हमेशा किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहते हैं। और लगातार कोई न कोई योजना बनाकर उसे शीघ्रता से प्रगति की ओर भी ले जाते हैं। ऐसे जातकों को मित्रों का अच्छा सहयोग, माता का स्नेह, सर्व सुविधा युक्त भवन, भौतिक सुख, उच्च शिक्षा सभी कुछ मिलता है।

लेकिन, यदि सूर्य पीड़ित अवस्था में हो और राहु, केतु, मंगल या शनि जैसे अशुभ ग्रहों के साथ पीड़ित हो, तो परिणाम अशुभ और नकारात्मक हो सकते हैं। ऐसे में, कुंडली का पीड़ित या कमजोर सूर्य इस लग्न के जातकों के लिए दुःख का कारक और मित्रों से वंचित कर सकता है। गुरु ग्रह की इस अशुभता को आप कुछ आसान उपाय करके कम कर सकते हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, वृषभ लग्न में चौथे भाव का स्वामी सूर्य होते हैं। इस कारण वे प्रकाश, माता, भूमि, भवन निर्माण, वाहन, चौपाया, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपत्ति, दया, दान, विश्वासघात, छल, अंतरात्मा की स्थिति और जलीय तत्वों का प्रतिनिधित्व करता है। यह मादक पदार्थों के सेवन, संचित धन, झूठे आरोपों, अफवाहों, प्रेम, प्रेम प्रसंग, प्रेम विवाह आदि से संबंधित संदर्भों को दर्शाता है।

इसके साथ ही, जातक के नाम, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि के लिए चौथे भाव में ग्रहों की स्थिति देखी जाती है। वृषभ लग्न वाले जातकों के लिए, उनका नाम, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। यदि कुंडली में, सूर्य की दशा काल में वे शुभ और मजबूत स्थिति में हो, तो जातक अपनी प्रसिद्धि और ख्याति को पूरे संसार में विख्यात कर सफलता पाता हैं। और यदि सूर्य कमजोर और अशुभ प्रभाव में हो, तो जातक की मान-प्रतिष्ठा घट जाती है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस लग्न में सूर्य चतुर्थ भाव (सुख, माता, भूमि) का स्वामी होकर एक तटस्थ/मारक ग्रह की भूमिका में होते हैं। यानी, चतुर्थेश होने से यह जातक को चल-अचल संपत्ति और पैतृक सुख प्रदान करते हैं, लेकिन पारिवारिक कलह, माता के स्वास्थ्य में कमी या खुद के अहंकार के कारण तनाव भी देते हैं। इसका अर्थ है कि, यहां सूर्य केंद्र का स्वामी होकर भी पापी या तटस्थ ग्रह माना गया है। आये इस लग्न में हम आपको सूर्य के कुछ विशेष शुभ\अशुभ प्रभाव की जानकारी देते हैं-

यदि सूर्य कुंडली के चौथे भाव में सिंह राशि में हो, तो जातक को घर, गाड़ी, संपत्ति और उच्च प्रशासनिक पद का सुख देने के कारक बनते हैं।  जिससे जातकों में कुछ अहंकार भी होता है।

यदि सूर्य इस लग्न के पांचवे भाव (बुद्धि) में हो तो यह जातक को बुद्धिमान, दूरदर्शी और आत्मविश्वासी बनाता है। शिक्षा और संतान के लिए भी सूर्य की इस स्थिति को बहुत ही शुभ माना जाता है।

इस लग्न के, दूसरे भाव में सूर्य होने से जातक की वाणी कठोर हो सकती है और परिवार के साथ संबंधों में तनाव और मनमुटाव हो सकता है। लेकिन, यह जातक के लिए अचानक धन प्राप्ति के मार्ग भी देती है।

जन्म कुंडली के तीसरे भाव (कर्क राशि) में सूर्य जातक को साहसी बनाता है और छोटे भाई-बहनों से अच्छा सहयोग देने का कारक होता है।

यदि कुंडली में, सूर्य कमजोर या शनि/राहु से पीड़ित हो, तो जातक को स्थान परिवर्तन, भूमि-मकान विवाद, माता को कष्ट और हृदय या गले से संबंधित स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। 

इसके अलावा, अशुभ सूर्य (नीच/पीड़ित) होने पर जातक अत्यधिक जिद्दी स्वभाव, घर में क्लेश, संपत्ति विवाद, और अपयश प्राप्त करता है।

वृषभ लग्न में सूर्य ग्रह

जरूरी बात- वृषभ लग्न के लिए सूर्य चतुर्थेश की भूमिका में होते हैं, इसलिए गलत निर्णय से बचें और पिता के साथ संबंधों में मधुरता बनाए रखें। उनका सम्मान करें

वृषभ लग्न में सूर्य ग्रह चतुर्थ भाव (सुख स्थान) का स्वामी होकर केंद्र का आधिपत्य रखने वाले प्रभाव में होते हैं। इसे मजबूत करने के लिए हमारे ‘मंगल भवन’ के वरिष्ठ आचार्यों  द्वारा ये कुछ आसान उपाय बताए गए हैं- जो इस प्रकार हैं….। 

  1. रोज सुबह जल्दी उठकर उगते हुए सूर्य को जल में लाल फूल और कुमकुम मिलाकर अर्घ्य दें ।
  2. प्रतिदिन सुबह “ॐ सूर्याय नमः” या “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का 108 बार जाप करें।
  3. रविवार को तांबा, गेहूं, गुड़, या लाल कपड़े का दान करने से सूर्य ग्रह मजबूत होते हैं।
  4. प्रतिदिन आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से सूर्य बलवान होता है और प्रतिष्ठा-यश की प्राप्ति होती है।
  5. अपने पिता और घर के बुजुर्गों का सम्मान करें और उनके प्रतिदिन उनके चरण स्पर्श करें।
  6. कुंडली के विस्तार विश्लेषण के बाद अनुभवी ज्योतिष की सलाह से, आप रूबी (माणिक्य) रत्न धारण कर सकते हैं, जो सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि कर शुभ प्रभाव के लिए सहायक होता है। 
  7. प्रतिदिन जल्दी सोकर उठें और सूर्य की पहली किरणों में धूप लें। 

Q. वृषभ लग्न के लिए सूर्य ग्रह के क्या प्रभाव होते हैं?

An. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, वृष लग्न में सूर्य ग्रह चतुर्थ भाव में व स्वराशि में स्थित होकर जातक को अपनी माता व भूमि, मकान, संपत्ति आदि से सम्बन्धित मामलों में पूर्ण सुख और शुभ प्रभाव देने के कारक होते हैं। साथ ही ऐसे जातकों का पारिवारिक जीवन, बहुत ही सुखमय व्यतीत होता है।

Q. वृषभ लग्न के लिए सूर्य के अशुभ प्रभाव में क्या होता है?

An. यदि कुंडली में, सूर्य कमजोर या शनि/राहु से पीड़ित हो, तो जातक को स्थान परिवर्तन, भूमि-मकान विवाद, माता को कष्ट और हृदय या गले से संबंधित स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

Q. वृषभ लग्न का सूर्य ग्रह की शुभता के लिए क्या करना चाहिए?

An. कुंडली के विस्तार विश्लेषण के बाद अनुभवी ज्योतिष की सलाह से, आप रूबी (माणिक्य) रत्न धारण कर सकते हैं, जो सूर्य की सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि कर शुभ प्रभाव के लिए सहायक होता है।

Q. वृषभ लग्न में सूर्य की स्थिति क्या होती है?

An. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस लग्न में सूर्य चतुर्थ भाव (सुख, माता, भूमि) का स्वामी होकर एक तटस्थ/मारक ग्रह की भूमिका में होते हैं। यानी, चतुर्थेश होने से यह जातक को चल-अचल संपत्ति और पैतृक सुख प्रदान करते हैं, लेकिन पारिवारिक कलह, माता के स्वास्थ्य में कमी या खुद के अहंकार के कारण तनाव भी देते हैं।

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