वृषभ लग्न में मंगल ग्रह ! मारकेश की विशेष स्थिति, शुभ\अशुभ प्रभाव और फलादेश की जानकारी |

वृषभ लग्न में मंगल ग्रह

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ज्योतिष शास्त्र में, कुल बारह राशियां होती हैं। हर एक राशि का स्वमी ग्रह, मित्र ग्रह और शत्रु ग्रह होता है। जिसके शुभ और अशुभ प्रभाव भावो के आधार पर मिलते हैं। जहां तक बात है, लग्न की तो, लग्न में भी भावों के आधार पर ही, ग्रहों के प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक हो सकते हैं। 

तो, आइए आज के इस ‘मंगल भवन’ के लेख में हम आपको वृषभ लग्न में मंगल ग्रह के कुछ विशेष  प्रभाव और महत्वपूर्ण फलादेश की जानकारी विस्तार से देंगे। सम्पूर्ण जानकारी के लिए, हमारे साथ लेख में अंत तक बने रहिए और हमें अपने जरुरी सुझाव देना न भूलें।

इस लग्न में जन्म लेने वाले जातक की शारीरिक विशेषताओं की बात करें तो, उनका रंग गोरा या गेहुंआ होता है।ऐसे जातक का स्वभाव स्त्रियों के समान शौकीन मिजाज, मधुर भाषी, रजोगुणी, लम्बे दांत तथा कुंचित केशों वाला, श्रेष्ठ संगति में बैठने वाला, ऐश्वर्यशाली, उदार स्वभाव, भक्त, गुणवान, बुद्धिमान, धैर्यवान, होता है।

साथ ही वे शुर- वीर , साहसी, अत्यंत यशस्वी और बहुत ही शांत प्रकृति के होते हैं, जो अपने प्रबल पराक्रम को प्रकट करने , अपने परिवार वालों से अनाहत, कलहयुक्त, शास्त्र से अभिज्ञात पाने वाला, मानसिक रोग अथवा चिंताओं से पीड़ित, दुखी रहने वाला, मित्र- वियोगी तथा पूर्णायु प्राप्त करने वाले होते हैं। आगे लेख में हम आपको, ग्रहों के मारक प्रभाव के बारे में जानकारी देंगे।

ज्योतिष में, मंगल ग्रह को अग्नि तत्व युक्त ग्रह की संज्ञा दी जाती है। साथ ही, यह स्वभाव से पाप ग्रह भी कहलाता है जो कठोर परिणाम देने का कारक होता है। इस कारण से मंगल की स्थिति होने पर जातक में, आक्रामकता, क्रोध और चिंता जैसे प्रभाव दिखाई देती है।

ज्योतिष शास्त्र में, मंगल की ग्रह दशा के समय पर भी यदि मंगल कुंडली में स्वराशि में हो, मित्र राशि में हो, उच्च राशि में हो, मूल त्रिकोण राशि में हो या शुभ प्रभाव में हो तो यह प्रभावशाली होता है। क्योंकि, स्वभाव से यह ग्रह नकरात्मक परिणाम देने के लिए जाना जाता है। जिनके अशुभ प्रभाव में जीवन में कुछ समस्याएं आती है।

लेकिन, यह सबसे अधिक अशुभ प्रभावशाली तब होता है, जब कुंडली में मंगल शत्रु स्थान में हो, नीच राशि में हो, पाप ग्रह के साथ हो या पाप ग्रहों की दृष्टि में हो। तब मंगल की दशा में जातक को बहुत ही सावधानी और धैर्य रखने की जरूरत होती है।

इस लग्न के लिए मंगल इनके सातवें और बारहवें भाव के स्‍वामी ग्रह होते हैं। यहां, सप्तमेश होने के नाते यह जातक के घर-गृहस्‍थी सहित लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मृत्यु, चोरी, झगड़ा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार इत्यादि का कारक होता है। साथ ही, द्वादशेश होने के नाते यह खर्च का भी प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए यह बात साफ है कि, इस लग्न के जातकों के घर-गृहस्‍थी (सप्तम भाव) और धन खर्च (द्वादश भाव) में मंगल के प्रभाव और भूमिका महत्वपूर्ण होगी। 

इसके अलावा, इस लग्न में,मंगल के दशाकाल में उनका बलवान और शुभ प्रभाव में होने पर जातक को धन खर्च की श्रेष्ठता और घर गृहस्‍थी संबंधित मामलों में सुख और सहजता प्राप्त होती है। लेकिन, यदि जन्‍मकुंडली या दशाकाल में मंगल की स्थिति, कमजोर हो या पाप प्रभाव में हो तो जातक के धन खर्च की शक्ति में अशुभ प्रभाव कमी और घर-परिवार में भी अशांति या कष्‍ट कारी परिणाम मिलेंगे।

हमारे ‘मंगल भवन’ के ज्योतिष आचार्यों की गणना में, यदि हम इस लग्न में मंगल के विशेष फलादेश की बात करें तो, यह सप्तमेश व खर्चेश है। मंगल यहां द्वितीय मारकेश होने में अशुभ फलदायक होगा। इस तथ्य  को और भी अधिक विस्तार से जानने के लिए, कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार है-

वृष राशि में लग्नस्थ मंगल जातक को विलासी बनाता है। ऐसा जातक भोग और ऐश्वर्य के सुख के लिए उचित और अनुचित दोनों प्रकार के प्रयास करता है। मंगल के लग्न में होने पर वह कुण्डली मांगलिक होती है। ऐसा व्यक्ति महत्वाकांक्षी होता है। वैवाहिक जीवन सम्बन्धी कई समस्याएँ ऐसे जातक को उठानी पड़ती है-

लग्न के बारहवें भाव में, द्वादशेश मंगल होने से जातक में भोग विलास का दोष होता है। लग्न में बैठे मंगल की दृष्टि चतुर्थ भाव (सिंह राशि) सप्तम भाव (वृश्चिक राशि) व अष्टम भाव (धनु राशि) पर होगी। ऐसा जातक साहसी और निर्भीक होगा और दीर्घ आयु वाला होगा। ऐसे जातक अपनी माता के बहुत आज्ञाकारी होते हैं। साथ ही, कामुकता के कारण पत्नी का दीवाना होगा।

इस लग्न के लिए मंगल की दशा जातक को मिश्रित फल देगी । ऐसे जातक को तेज गति के वाहन चलाने से बचना चाहिए।

शुक्र (लग्नेश) और मंगल के बीच शत्रुता के कारण, इस लग्न में, वे अक्सर मारक या अशुभ फलदायक होते हैं।

इस राशि में मंगल होने से जातक सुख-सुविधाओं और विलासिता पर अधिक धन-खर्च करता है। ऐसे जातक अपनी मान-प्रतिष्ठा को लेकर बहुत ही सचेत होते हैं और स्पष्टवादी होते है।

  1. छठवें, आठवें, बारहवें भाव यदि मंगल हो और लग्नेश शुक्र मजबूत हो, तो यह ‘विपरीत राजयोग’ बनाता है, जिससे धन लाभ के योग बनते हैं।
  2. कुंडली के ग्यारहवें भाव में मंगल की स्थिति जातक के लिए सामाजिक नेटवर्क के माध्यम से धन और प्रभावशाली संबंध देने की कारक होती है।

लग्न कुंडली में मंगल यहाँ जातक को उच्च रक्तचाप, मानसिक चिंता, या सिर दर्द जैसी समस्याएं देने का कारक होता है।

इस लग्न के लिए मंगल सातवें (दाम्पत्य) और बारहवें (व्यय) भाव का स्वामी होकर एक अशुभ या मारक ग्रह माना जाता है। जिसके प्रभाव में जातक को विशेष रूप से विवाह, स्वास्थ्य और धन व्यय सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, केंद्र में (विशेषकर पहले, सातवें, बारहवें भाव) स्थिति होने पर यह विपरीत राजयोग या मांगलिक दोष में राहत (परिहार) भी देता है, जिससे जातक को साहस, उच्च शिक्षा या विदेश सम्बन्धी लाभ मिलते हैं। 

वृषभ लग्न में मंगल ग्रह
  1. जातक निडर, साहसी और अत्यंत महत्वाकांक्षी होता है।
  2. लग्न (प्रथम) या लाभ भाव (ग्यारहवां) में होने पर विशेष सफलता और आय के कई स्रोतों से धन लाभ होता है।
  3. यदि मंगल कुंडली के पहले, सातवें, या दसवें भाव में हो, तो विवाह के बाद भाग्य में वृद्धि होती है।
  4. भूमि, प्रॉपर्टी या सेना से जुड़े कार्यों में सफलता। 
  1. मंगल के सातवें या आठवें भाव में होने पर वैवाहिक जीवन में तनाव, तलाक या अलगाव की स्थिति।
  2. मंगल की दृष्टि या स्थिति के कारण रक्त विकार, चोट-चपेट, या गुप्त रोग।
  3. बारहवें भाव का स्वामी होने के कारण अनावश्यक खर्च और फिजूलखर्ची।
  4. जातक में अत्यधिक चिड़चिड़ापन और हिंसात्मक प्रवृत्ति।

कुंडली में, मंगल की दशा या अशुभता के प्रभाव को शांत करने हेतु में आपको ये आसान उपाय करना चाहिए-

  • मंगलवार के दिन, हनुमान जी को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करें। साथ ही, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण या सुंदरकांड का पाठ करें।
  • मंगलवार का व्रत रखें। मंगलवार को गुड़, मसूर की दाल, तांबा, लाल वस्त्र, या बूंदी के लड्डू का दान करें।
  • मंगल के बीज मंत्र ‘ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः’ या ‘ॐ अं अंगारकाय नमः’ मंत्र का लाल आसन पर बैठकर जप करें।
  • परिवार में, छोटे भाइयों से अच्छे संबंध बनाए रखें। तांबे का कड़ा या अंगूठी धारण करें। नारंगी या लाल रंग के कपड़ों का प्रयोग करें।
  • भोजन में अनार, टमाटर, शहद, और गुड़ को शामिल करें।
  • यदि कुंडली में मंगल दोष है, तो विवाह से पहले विद्वान ज्योतिषी से मंगल यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा करवाकर पूजा करें।

कुल-मिलाकर हमने जो जानकारी आपको दी, इस लग्न में मंगल 7वें (साझेदारी/विवाह) और 12वें (व्यय/विदेश) भाव का स्वामी होकर एक मारक और अशुभ फल दाता ग्रह होते है। जो कि, जातक को अत्यधिक क्रोध, कामुक, और वैवाहिक जीवन में संघर्ष देने का कार्य करते हैं। यानि यहां मंगल की ऐसी स्थिति से जातक महत्वाकांक्षी, साहसी, लेकिन अधिक खर्च करने वाला बनता है। मंगल की अशुभता को दूर करने के लिए जातक को उनसे संबंधित उपाय करना चाहिए।

Q. वृषभ लग्न के लिए मंगल की क्या विशेष स्थिति होती है?

An. यदि हम इस लग्न में मंगल के विशेष फलादेश की बात करें तो, यह सप्तमेश व खर्चेश है। मंगल यहां द्वितीय मारकेश होने में अशुभ फलदायक होगा।

Q. वृषभ लग्न के लिए, मंगल के शुभ प्रभाव में क्या होता है?

An. इस लग्न के लिए, मंगल के शुभ प्रभाव में जातक निडर, साहसी और अत्यंत महत्वाकांक्षी होता है। लग्न (प्रथम) या लाभ भाव (ग्यारहवां) में होने पर विशेष सफलता और आय के कई स्रोतों से धन लाभ होता है।

Q. वृषभ लग्न के लिए मंगल के विशेष फलादेश क्या है?

An.इस लग्न में मंगल 7वें (साझेदारी/विवाह) और 12वें (व्यय/विदेश) भाव का स्वामी होकर एक मारक और अशुभ फल दाता ग्रह होते है। जो कि, जातक को अत्यधिक क्रोध, कामुक, और वैवाहिक जीवन में संघर्ष देने का कार्य करते हैं।

Q. मंगल को मजबूत करने के लिए क्या उपाय करना चाहिए?

An. मंगलवार के दिन, हनुमान जी को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करें। साथ ही, हनुमान चालीसा, बजरंग बाण या सुंदरकांड का पाठ करें। मंगलवार का व्रत रखें। मंगलवार को गुड़, मसूर की दाल, तांबा, लाल वस्त्र, या बूंदी के लड्डू का दान करें।

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