तुला लग्न में सूर्य ग्रह ! जान, लीजिए विशेष प्रभाव स्थिति, शुभ योग और महत्वपूर्ण फलादेश के साथ उपाय |

तुला लग्न में सूर्य ग्रह

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ज्योतिष शास्त्र में लग्न कुंडली विशेष गणना की गई है। इस गणना का मुख्य आधार नौ ग्रह उनके प्रभाव व उनकी दशा\अन्तर्दशा होती है। जिसके अनुसार भविष्यफल ज्ञात किया जाता है। और उपाय किए जाते हैं।

प्रत्येक राशि का अपना एक लग्न भाव होता है। 

जिसमें ग्रहों की भूमिका होती है। तो आइये आज के इस ‘मंगल भवन’ के लेख  में हम आपको तुला लग्न में सूर्य ग्रह की विशेष स्थिति और प्रभाव के बारे में जानकारी देंगे। हम आशा करते है, हमारे द्वारा लेख में दी गई जानकारी आप सभी के उपयुक्त हो। 

 ज्योतिष शास्त्र में, तुला लग्न या राशि में सूर्य वाले जातक आशावादी स्वभाव के होते हैं। जो हमेशा दूसरों के सकारात्मक पहलुओं को देखते हैं तथा आसानी से सबसे मित्रता करने में माहिर होते हैं। लेकिन, कभी-कभी वे गलत तरीके से बर्ताव या बातचीत के दौरान निराश और चिड़चिड़े भी हो जाते हैं। समाज में रहना और सामाजिक कार्यों में लगे रहना, इनका एक महत्वपूर्ण गुण होता है। साथ ही वे थोड़े चंचल स्वभाव के भी होते हैं।

इनके स्वाभाविक गुणों की बात करें तो, वे कुछ अनिर्णायक होते हैं और एक साधारण सी स्थिति में भी घंटों समय निकलने में सक्षम होते हैं। दूसरों को खुश करने की प्रवृत्ति के वे हमेशा सब में अलग और सबके प्रिय होते हैं। साथ ही, जब चीजें आपके अनुसार नहीं होतीं, तो आप खुद को नुकसान पहुंचाना की भी कोशिश करते हैं। यानी आपको ऐसा महसूस होने लगता है कि, दुनिया खत्म हो रही है और हर कोई आपके खिलाफ खड़ा है।

हमारे ‘मंगल भवन’ के वरिष्ठ आचार्यों   के अनुसार, सूर्य देव इस कुंडली में ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। जो की लाभेश होते हुए भी मारक ग्रह हैं। यानी लग्न कुंडली के सूर्य देव अपनी दशा-अंतर्दशा में सदैव कष्ट कारक हो होंगे। ज्योतिष में सूर्य का रत्न माणिक कभी भी धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि, शुभ या शुभ प्रभाव उस ग्रह के साथ अन्य ग्रहों की स्थिति पर भी निर्भर करता है। 

और साथ ही, वह ग्रह अपनी दशा-अंतर्दशा में अगर शुभ भाव में विराजमान हो तो, लाभ के साथ -साथ समस्या व शारीरिक कष्ट भी लेकर आता है। जैसे, इस लग्न में सूर्य देव मारक हैं इसलिए उचित उपाय दान करके इनके मारकेत्व  को कम किया जा सकता है।

इस लग्न के लिए सूर्य ग्रह ग्यारहवें (लाभ) भाव का स्वामी होकर मारक ग्रह के प्रभाव और स्थिति में होते हैं।

क्योंकि, यह लग्नेश शुक्र ग्रह का नैसर्गिक शत्रु भी है। साथ ही, इस राशि (लग्न) में सूर्य नीच स्थिति में होने से, जातक के आत्मविश्वास में कमी, स्वास्थ्य समस्याएं, पिता से वैचारिक मतभेद, या मान-प्रतिष्ठा में उतार-चढ़ाव जैसे परिणाम देखने को मिल सकते हैं। हालांकि, कुछ भावों में होने पर वे जातक को सामाजिक जीवन, कूटनीति और कलात्मक क्षेत्रों में सफलता देने के भी कारक हो सकते हैं। 

  • प्रथम भाव (लग्न): व्यक्तित्व को आकर्षक व्यक्तित्व, लेकिन अहंकार, स्वास्थ्य में समस्या उतार-चढ़ाव और आत्म-सम्मान में कमी।
  • दसवें भाव (कर्म स्थान): कार्यक्षेत्र में उच्चाधिकारियों से मतभेद और संघर्ष के बाद सफलता के योग।
  • ग्यारहवें भाव (लाभ भाव): आय में वृद्धि, लेकिन स्वास्थ्य के लिए अशुभ और बड़े भाई से संबंधों में तनाव दे सकता है।
  • अन्य भाव:   लग्न कुंडली के अन्य सबी भावों में की स्थिति होने पर वे उस भाव के शुभ फलों में कमी करते हैं। और जातक को कई समस्याओं और संघर्ष का सामना करना पड़ता है। 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के लिए धन प्रदाता ग्रह मंगल है। धनेश मंगल की शुभ स्थिति से, जातक के धन स्थान से संबंध जोड़ने वाले ग्रह और धन स्थान पर पड़ने वाले ग्रहों के दृष्टि ज्ञात की जाती है। जिससे जातक की आर्थिक सम्पन्नता, आय के स्रोत व चल-अचल संपत्ति की जानकारी मिलती है। 

इसके अतिरिक्त लग्नेश शुक्र, पंचमेश शनि और भाग्येश बुध की अनुकूल स्थितियां भी इस तुला लग्न के जातकों के लिए धन व वैभव में वृद्धि करने वाली स्थिति होती है। वैसे तुला लग्न के लिए गुरु, सूर्य, मंगल अशुभ हैं। शनि और बुध शुभ होते हैं। मंगल प्रधान मारकेश होकर भी मारक का कार्य नहीं करेगा, गुरु बृहस्पति, षष्ठेश होने के कारण अशुभ फलदायक है।

इस लग्न में सूर्य ग्रह ग्यारहवें भाव (आय स्थान) के स्वामी होकर नीच राशि यानी तुला में ही स्थित होता है, जिसे नीच भंग होने पर विशेष धन-लाभ, कूटनीतिक सफलता, और सामाजिक मान-प्रतिष्ठा का कारक जाना जाता है। लेकिन, यहाँ सूर्य के कमजोर होने से जातक के आत्मबल में कमी, निर्णय लेने में समस्या और स्वास्थ्य (पेट/आंखें) संबंधी समस्याएं हो सकती है। 

यदि इस लग्न में सूर्य, शुक्र (लग्नेश) के साथ हो या शनि, मंगल, बुध के प्रभाव में हो तो “नीचभंग राजयोग” बनाता है, जिससे भारी धन और उच्च पद की प्राप्ति और भाग्य का साथ मिलता है।

जातक सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने वाला, कूटनीतिक (Diplomatic), न्यायप्रिय, और कला/डिजाइन में श्रेष्ठ और सफल होता है।

इस लग्न में सूर्य कमजोर होने से आत्मविश्वास में कमी, अस्थिर मन, और दूसरों के विचार को अधिक महत्व देने की आदत (people-pleasing) का शिकार हो सकता है।

साझेदारी के व्यवसाय (Partnership), न्यायपालिका, या सरकारी क्षेत्र में सफलता मिलती है, लेकिन जिम्मेदारी और कार्यभार अधिक रहता है।

  • ग्यारहवें भाव का स्वामी होने के कारण, सूर्य अपनी दशा में धन की प्राप्ति और बड़े भाइयों से सहयोग दिला सकता है।
  • सूर्य ग्रह के मजबूत स्थिति में होने पर जातक को बहुत मान-प्रतिष्ठा, सामाजिक रूप से सक्रिय, कूटनीतिक और कलात्मक क्षेत्र में सफलता मिलती है।
  • यदि सूर्य, बुध और शनि का संबंध या युति में हो, तो जातक भाग्यशाली होता है। 
  • पाचन तंत्र, पेट, हृदय, और पीठ के निचले हिस्से में दर्द की समस्या।
  • मानसिक और शारीरिक कमजोरी, आत्मविश्वास में कमी, अहंकार, क्रोध, और निर्णय लेने में कठिनाई।
  • पारिवारिक असंतुलन, पिता के साथ संबंधों में तनाव और घरेलू जीवन में कलह, खासकर अगर चौथे भाव में हो।
  • मेहनत का उचित फल न मिलना और कार्यक्षेत्र में अस्थिरता। 
तुला लग्न में सूर्य ग्रह

ज्योतिष आचार्यों की मानें तो, रत्न कभी भी राशि के अनुसार नहीं पहनना चाहिए। रत्न हमेशा लग्न, दशा, महादशा के अनुसार ही धारण किए जाते हैं। और पूरे विधि-विधान और शुभ समय में ज्योतिष आचार्यों की सलाह से धारण करने से रत्न का पूर्ण फल मिलता है।

लग्न की बात करें तो, तुला लग्न के लिए, हीरा, नीलम, और पन्ना रत्न धारण कर सकते है। लेकिन, मूंगा, पुखराज, मोती, और माणिक्य रत्न इस लग्न के जातक को कभी भी धारण नहीं करना चाहिए। इसके अलावा कुछ आसान उपाय भी बताए गए हैं जो इस प्रकार हैं- 

  1. नियमित रूप से सूर्य को तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल (अर्घ्य) अर्पित करें (गुड़ और रोली मिलाकर) करने से लाभ होगा।
  2. सूर्य के लिए आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें।
  3. सूर्य से संबंधित लाल वस्तुओं का दान करें, माणिक्य रत्न धारण करने से बचें। 
  4. किसी वरिष्ठ ज्योतिष से कुंडली विश्लेषण कराएं,  यदि सूर्य के साथ कोई शुभ ग्रह बैठा हो, तो मारक प्रभाव को कम किया जा सकता।

कुल-मिलाकर तुला लग्न में सूर्य उनके ग्यारहवें भाव (लाभ भाव) के स्वामी होकर भी शुभ कारक या शुभ ग्रह नहीं, बल्कि अति मारक (कष्टकारी) और अशुभ प्रभाव देने वाले ग्रह माने जाते हैं।  क्योंकि, तुला राशि में सूर्य नीच का (10 डिग्री पर) होता है। इस दशा में जातक को, शारीरिक कष्ट, पिता से वैचारिक मतभेद, और मान-सम्मान में कमी का सामना करना पड़ता है। हालांकि, सूर्य संबंधी कुछ विशेष उपाय करके सूर्य की अशुभता को दूर किया जा सकता है। 

Q. तुला लग्न के लिए सूर्य ग्रह की कैसी स्थिति होती है?

An. सूर्य देव इस कुंडली में ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। जो की लाभेश होते हुए भी मारक ग्रह हैं। यानी लग्न कुंडली के सूर्य देव अपनी दशा-अंतर्दशा में सदैव कष्ट कारक ही होंगे।

Q. तुला लग्न में सूर्य ग्रह के क्या विशेष प्रभाव होते हैं?

An. इस लग्न में सूर्य ग्रह ग्यारहवें भाव (आय स्थान) के स्वामी होकर नीच राशि यानी तुला में ही स्थित होता है, जिसे नीच भंग होने पर विशेष धन-लाभ, कूटनीतिक सफलता, और सामाजिक मान-प्रतिष्ठा का कारक जाना जाता है।

Q. तुला लग्न के के लिए कौन से रत्न धारण करना शुभ फलदायी है?

An. तुला लग्न के लिए, हीरा, नीलम, और पन्ना रत्न धारण कर सकते है। लेकिन, मूंगा, पुखराज, मोती, और माणिक्य रत्न इस लग्न के जातक को कभी भी धारण नहीं करना चाहिए।

Q. तुला लग्न के लिए शुभ ग्रह कौन से हैं?

An. तुला लग्न के लिए गुरु, सूर्य, मंगल अशुभ हैं। शनि और बुध शुभ होते हैं। मंगल प्रधान मारकेश होकर भी मारक का कार्य नहीं करेगा, गुरु बृहस्पति, षष्ठेश होने के कारण अशुभ फलदायक है।

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