प्रस्तावना
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में जातक ग्रन्थों का अध्ययन इस ओर इशारा करता है कि, प्रत्येक जातक नवग्रह मण्ड़ल में ग्रहों के प्रभाव से प्रभावित होता है। ग्रहों के शुभ एवं अशुभ प्रभाव के निर्धारण के लिए यदि कोई मार्ग है तो, वह लग्न ही है। यदि कुण्ड़ली के निर्माण में किसी कारण से लग्न अशुद्ध एवं त्रुटिपूर्ण है तो, ऐसे में संबंधित कुण्ड़ली का न केवल फलादेश गलत रहेगा। बल्कि उसके ग्रहों की स्थिति सहित अन्य दूसरे पहलुओं का भी सही ज्ञान नहीं हो सकता है।
तो आइये जानते हैं आचार्य अंकुश के साथ मंगल भवन की इस खास प्रस्तुति में तुला लग्न में मंगल किस प्रकार के सकारत्मक एवं नकारात्मक परिणमों को देने वाल रहता है। वह कहाॅ कारक एवं मारक होता है और कहाॅ पर अच्छे परिणामों को देने वाला होता है। अतः इस लेख को अंत तक जरूर पढ़े। आपके बहुमूल्य सुझावों को हम सादर आमंत्रित करते हैं।
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जन्म राशि
जातक एवं जातिकाओं के जन्म के समय नक्षत्रों के अनुसार ही यह ज्ञात होता है कि, उसका नामाक्षर क्या है..? जिससे व्यक्ति के नामकरण संस्कार के लिए उसके सही नक्षत्र का ज्ञान होता है। तथा नक्षत्र के चरण के अनुसार ही उसका नामाक्षर आता है। जैसे किसी व्यक्ति के जन्म के समय यदि भरणी था तो, उसकी मेष राशि को ही जन्म राशि माना जाता है।
लग्न का निर्धारणः
किसी भी जातक एवं जातिका के जन्म के समय जो लग्न पूर्वी क्षितिज में उदित होता है। वही उसका लग्न माना जाता है। यदि किसी बालक एवं एवं बालिका के जन्म के समय पूर्वी क्षितिज में तुला लग्न उदित हो रही हो तो, उसकी लग्न तुला लग्न ही मानी जाती है। यानी किसी भी जातक एवं जातिका के जन्म के समय कौन सी लग्न पूर्वी क्षितिज में उदित हो रही थी? जिसे ज्योतिष में विशेष गणितीय प्रक्रिया के द्वारा जाना जाता है। जिसे लग्न निर्धारण किया जाता है। ज्योतिषीय सूत्रों के द्वारा खास गणतीय प्रक्रिया के द्वारा ही लग्न स्पष्ट किया जाता है।
ज्योतिष में तुला लग्न के प्रमुख लक्षण
इस लग्न में जन्म लेने वाले जातक एवं जातिकाओं की कद काठी पुष्ट एवं मजबूत होती है। यह शरीर से देखने में सुन्दर तथा आकर्षक चेहरे के धनी एवं प्रतिभाशाली माने जाते हैं। किन्तु आयु के आधे भाग में ही इनके सिर के बाल गंजे हो जाते हैं। मस्तक उठा हुआ और दांत की पक्तियों मे कई बार खाली स्थान भी देखने को मिलता है।
यह दूसरे पर दया करने वाले तथा ईमानदार लोगों की श्रेणी में शामिल होते हैं। तथा अपने कामों में चतुर तथा सही वक्त में निर्णय लेने की क्षमताओं से युक्त होते है। यदि लग्न में अशुभ ग्रह का प्रभाव हो तो, यह अपनी बातों में अड़िग रहने वाले जिद्दी स्वभाव के होते हैं।
तुला लग्न में अन्य विशेषताएं
बात-चीत में अधिक निपुण एवं कुशाग्र बुद्धि वाले होते हैं। परोपकार करने वाले तथा दूसरे का सहयोग करने वाले और उनका ध्यान देने वाले होते है। यानी यदि इनके सामने कोई दीन गरीब एवं असहाय पहुंचा हैं तो, उसका यह सहयोग करने के लिए सोचते रहते हैं।
तुला लग्न के अन्य स्वभावगत गुण
यह अपने कार्य एवं व्यापार में निपुण तथा उच्च स्तर तक अपने व्यापार को ले जाने वााले होते हैं। अपने परिश्रम के द्वारा कई ऐसे कार्य घर एवं परिवार में करते हैं जो, सराहनीय और अच्छे माने जाते हैं। यह अपने स्वभाव से दयालु किस्म के होते हैं। यह शांत प्रिय तथा समाज से जुड़े सामाजिक व्यक्ति भी होते हैं।
तुला लग्न में मंगल का प्रभाव
मंगल ग्रह
मंगल ग्रह ओज तथा तेज को देने वाला होता है। मंगल को सेनापति की संज्ञा प्राप्त है। इसे किसी कार्य युद्ध का नेतृत्व करना तथा सुरक्षा एवं युद्ध के स्थानों को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी दी गई है। मंगल को पाप एवं कू्रर ग्रह की श्रेणी में रखा गया है। किन्तू इसे बहादुर एवं पराक्रम करने वाला माना गया है। इस लग्न के लिए मंगल अशुभप्रद माना गया है।
तुला लग्न में मंगल का फलादेश
इस लग्न के स्वामी शुक्र ग्रह हैं जो कि, सांसारिक एवं भौतिक सुखों को देने वाले माने जाते है। इस लग्न के जातक देखने में अच्छे एवं सुन्दर होते हैं। लोगों से मेल मिलाप बनाकर चलने वाले होते है। जीवन में परिस्थिति चाहे जो भी हो, उससे निपटने में इस लग्न के जातक पूरी क्षमता से पेश आते है।
तुला लग्नगत मंगल का दृष्टि प्रभाव
यहाॅ मंगल यदि लग्नगत है तो, वह प्रथम भाव में होने पर चौथे तथा सातवें और आठवें स्थानों को अपनी दृष्टि से देखेगा। किन्तु प्रथम भाव में होने पर मंगल हाॅनिप्रद होता है। वहाॅ आपके सेहत आदि को नुकसान देने वाला होता है।
मंगल की महादशाः ज्योतिष में दशा एक ऐसा पहलू है, जिसकी प्राचीनता आज से नहीं बल्कि रामायणकाल से चली आ रही है। यदि मंगल अशुभ सूचक है तो, उसकी दशा में संघर्ष एवं अशुभ श्रेणी के परिणाम उत्पन्न होते हैं।
तुला लग्न के लिए मारक ग्रह
इस लग्न के स्वामी ग्रह शुक्र हैं, किन्तु मंगल जो, द्वितीय भाव के स्वामी तथा दारा भाव के स्वामी ग्रह है, वह मारक ग्रह की श्रेणी में शुमार है। अशुभ नीच राशि एवं पाप पीड़ित मंगल अशुभ परिणामों को अचानक ही बढ़ा सकता है।
तुला लग्न में मंगल ग्रहः शुभ और अशुभ प्रभाव
इस लग्न के लिए मंगल मारक ग्रह की श्रेणी में है। मंगल अपने स्वभाविक गुणों के कारण यह जातकों को नकारात्मक एवं अशुभ परिणामों को देने वाला होता है। यदि जातक युवा अवस्था से गुजर रहा है। और उसका मंगल खराब एवं अशुभ होकर बैठा है तो, ऐसे जातक कई बार न केवल छोटी-छोटी बातों में झगड़ा करते हैं। बल्कि जिद्दी स्वभाव के कारण वह किसी बड़े अपराध को भी अंजाम देने लगते है। यदि समय रहते इसका निदान नहीं किया गया तो, अशुभ मंगल के प्रभाव के कारण व्यक्ति अपराधी किस्म के व्यक्तियों की श्रेणी में धीरे-धीरे शामिल हो जाता है। वहीं यह मंगल शुभ श्रेणी में है, और शुभ ग्रहों के साथ उसकी युति एवं दृष्टि संबंध आदि बन रहे हैं तो, वह जीवन में बहुत आगे बढ़ने वाला घर परिवार को बढ़ाने वाला तथा ख्याति को अर्जित करने वाला होता है।
सुख सुविधाओं से युक्त
इस लग्न के जातक कई तरह की सुख-सुविधाओं को जुटाने में माहिर एवं सुन्दर वस्त्राभूषणों को धारण करने के शौकीन होते हैं। यानी भौतिकता में यह अधिक रचे एवं बसे हुए रहते हैं।
तुला लग्न में मंगल
इस लग्न का स्वामी शुक्र ग्रह है, तथा लग्न वायु तत्त्व संज्ञक है। इस लग्न के जातक अपने कार्य में कई बार जल्दीवाजी के कारण कुछ गलती कर बैठते हैं। जिससे इन्हें नुकसान उठाना पड़ जाता है। मंगल इस लग्न में अशुभ एवं नकारात्मक परिणामों को बढ़ाने वाला माना जाता है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
इस लग्न में यदि मंगल हो और उसका संबंध पाप एवं अन्य कू्रर ग्रहों से हो तो, यह स्वास्थ्य में नुकसान देने वाला तथा रोग एवं बीमारियों को बढ़ाने वाला होता है। इसके अशुभ प्रभाव के कारण दुघर्टना एवं अन्य तरह की परेशानी होने की आशंका बनी हुई रहती है।
मंगल का अन्य भावों में प्रभाव
1 तुला लग्न की कुण्ड़ली में यदि मंगल पहले, चौथे, सप्तम, अष्टम और बारहवें भाव में विद्यमान हो तो, इसे मांगलिक दोष के रूप में जाना जाता है।
2 इस लग्न में मंगल द्वितीय एवं दारा भाव का स्वामी है। जिससे इसे इस लग्न के लिए अशुभप्रद कहा जाता है।
3 लग्न के स्वामी श्री शुक्र है। यह मंगल से न तो शत्रुता रखते हैं और नही मित्रता यानी यह मंगल के लिए सम ग्रह है। जिससे जातक एवं जातिकाओं के विचारों में कई मामलों में तटस्थता देखी जाती है।
तुला लग्न के लिए कारक ग्रह
1 इस लग्न के लिए लग्न स्वामी शुक्र है। यहाॅ मंगल कुटुम्ब एवं दारा भावों का स्वामी है। जो नकारात्मक माना जाता है। अतः इस लग्न के लिए मंगल को अशुभप्रद माना गया है।
2 इस लग्न के लिए बुध त्रिकोण एवं व्यय भाव का स्वामी है। जिससे इसे दोष से मुक्त माना जाता है। लग्न के स्वामी शुक्र तथा पंचम एवं चतुर्थ भाव के स्वामी शनि इस लग्न के लिए शुभप्रद माने जाते है।
मंगल के संकेत
मंगल को तुला लग्न के लिए मारक एवं अशुभ माना गया है। अतः मंगल यहाॅ अशुभ एवं पाप फलों में वृद्धि करने वाला रहेगा। मंगल के किसी भी अंतिम फलादेश से पहले मंगल की कुण्ड़ली में सभी ग्रहों के मध्य स्थिति को जान एवं समझ लेना अनिवार्य है।
उपाय
यदि इस लग्न में मंगल के अशुभ प्रभाव मिलें तो करें यह प्रभावशाली उपाय
1 श्री हनुमान जी की सेवा एवं बंजरंग बाण का पाठ करें।
2 लाल मसूर, लाल कपड़े, तथा गुड़ एवं पके हुए फल आदि का दान देना चाहिए।
3 श्री भौमाय नमः मंत्र का जाप प्रतिदिन 108 बार जरूर करें।
4 घर एवं परिवार में छोटे भाई को प्यार करें उनसे अनावश्यक लड़ाई झगड़ा बिल्कुल भी न करें।
5 बिना ज्योतिषीय सलाह के कोई भी अगूंठी एवं कड़ा तथा रत्न आदि न धारण करें।
6 यदि आप मांगलिक दोष से युक्त है तो, मंगल ग्रह का वैदिक मंत्रों के साथ अनुष्ठान एवं घट विवाह आदि के द्वारा शान्ति एवं पुष्टि कर्म करवायें।
7 बंदरों को प्रत्येक दिन या फिर सप्ताह में एक बार जरूर भीगे हुए चने जरूर खिलाएं।
निष्कर्षः मंगल भवन के इस तुला लग्न के लेख से जो ज्योतिषीय निष्कर्ष आ रहा है। वह बता रहा है कि, मंगल इस लग्न के लिए योग कारक नहीं बल्कि मारक ग्रह की श्रेणाी में शुमार है।
FAQS\ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-
Q1. तुला लग्न में मंगल ग्रह कैसा फल देता है?
An. तुला लग्न में मंगल को अशुभ और मारक ग्रह माना जाता है, जो गलत स्थिति में तनाव, विवाद और स्वास्थ्य समस्याएं दे सकता है, जबकि शुभ स्थिति में सफलता भी देता है।
Q2. क्या तुला लग्न में मंगल मांगलिक दोष बनाता है?
An. हाँ, यदि मंगल 1, 4, 7, 8 या 12वें भाव में हो तो मांगलिक दोष बनता है, जिससे विवाह और रिश्तों में बाधाएं आ सकती हैं।
Q3. तुला लग्न के लिए मंगल मारक क्यों होता है?
An. क्योंकि मंगल द्वितीय और सप्तम भाव का स्वामी होता है, जो इस लग्न के लिए मारक भाव माने जाते हैं, इसलिए मंगल अशुभ प्रभाव देता है।
Q4. मंगल के अशुभ प्रभाव के लक्षण क्या हैं?
An. अशुभ मंगल से गुस्सा, झगड़े, दुर्घटना का खतरा, स्वास्थ्य समस्याएं और गलत निर्णय लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
Q5. तुला लग्न में मंगल के शुभ प्रभाव कब मिलते हैं?
An. जब मंगल शुभ ग्रहों के साथ युति या दृष्टि में होता है, तब यह साहस, सफलता और प्रतिष्ठा दिलाने में सहायक बनता है।
Q6. मंगल के अशुभ प्रभाव को कम करने के उपाय क्या हैं?
An. हनुमान जी की पूजा, बजरंग बाण का पाठ, लाल वस्तुओं का दान, ‘ॐ भौमाय नमः’ मंत्र जाप और बंदरों को चना खिलाना लाभकारी माना जाता है।


