प्रस्तावना
ज्योतिष शास्त्र में क्रांतिवृत्त को बहुत ही उपयोगी एवं फल कथन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसके बारहवें हिस्से को राशि के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक राशि अपने प्रकृति एवं गुण धर्मों के कारण मनुष्यों को शुभ एवं अशुभ परिणामों को देने वाली होती है। राशिचक्र के बारह भागों में प्रत्येक भाग को 30 अंशों में समान रूप से विभाजित किया गया है। आकाश मंडल में स्थित भचक्र बारह खण्ड़ों एवं 27 नक्षत्रों के समूह से बना हुआ होता है। जो ज्योतिष में प्रत्येक जातक एवं जातिकाओं के जीवन में शुभ एवं अशुभ परिणामों को देने वाला माना जाता है।
अतः मंगल भवन के इस लेख में आचार्य अंकुश सिंह लग्न में मंगल ग्रह के संबंध में कुछ खास प्रभाव, कारक, मारक आदि और उसके फल कथन के संदर्भ में सारगर्भित तथा विस्तृत लेख को प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस विशेष जानकारी के लिए आप हमारी इस प्रस्तुति को अंत तक जरूर पढ़े। आपके बहुमूल्य सुझावों को हम सादर आमंत्रित करते हैं।
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ज्योतिष शास्त्र में जन्म राशि
भारतीय वैदिक ज्योतिष शास्त्र में जन्म राशि का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यानी व्यक्ति के जन्म के समय चन्द्रमा जिस भी राशि में गोचर कर रहा होता है। उस नक्षत्र से संबंधित राशि ही उस व्यक्ति की जन्म राशि कहलाती है। जन्म राशि एवं नाम राशि को किस प्रकार जाना एवं समझा जाता है? यह बात ज्योतिष के अनुसार स्पष्ट हो जाती है। कि भचक्र में जन्म के समय जो नक्षत्र विद्यमान था। यानी जिस नक्षत्र राशि में चन्द्रमा गोचर कर रहा था, वही उसका नक्षत्र एवं जन्म राशि कहलाती है। जैसे किसी व्यक्ति का जन्म अश्विनी नक्षत्र में हुआ तो उसकी मेष राशि हुई।
लग्न का निर्धारणः
ज्योषिशास्त्र के अनुसार लग्न किसी भी जातक के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है। लग्न ही ज्योतिष का प्रमुख बिन्दु है। जो यह ज्ञात कराता है कि, व्यक्ति के जन्म के समय कौन सी लग्न उदित हो रही थी। तथा वह जातक के जीवन में पड़ने वाले शुभ तथा अशुभ प्रभावों के निर्धारण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका को निभाने वाली होती है। यानी जातक एवं जातिकाओं का जन्म जब इस धरती में होता है तो, उस समय में पूर्वी क्षितिज में जो राशि उदित हो रही होती है। वही उसकी लग्न होती है। यानी बालक एवं बालिका के जन्म के समय आकाश मण्ड़ल में ग्रह नक्षत्रों स्थिति क्या थी? वैदिक ज्योतिष में 12 प्रकार के चिन्ह जो हमें राशिचक्र में दिखाई देते है। वह आकाश मण्ड़ल में उसी प्रकार प्रतीत होते हैं।
ज्योतिष में सिंह लग्न के प्रमुख लक्षण
इस लग्न में जन्म लेने वाले जातको एवं जातिकाओं के शारीरिक बनावट को देखें तो ज्योतिष के अनुसार इनके कुछ खास एवं विशेष लक्षण होते हैं। इनकी कद काठी अच्छी और सुदृढ़ होती है। कंधे मजबूत और चैड़ाई लिए हुए रहते हैं। अपने गुणों के कारण प्रभावशाली और अपना प्रभाव समाज में छोड़ने वाले होते हैं। इनका चेहरा अण्ड़ाकार जैसे प्रतीत होता रहता है। चैड़ा एवं विशाल वृक्ष स्थल होता है। कमर पतली और मजबूत होती है। इनकी आंखे चमकदार नीली एवं पीली होती है। देखने में सुन्दर और आकर्षक प्रतीत होते हैं। यह पराक्रम करने वाले तथा धीर गम्भीर और शांत रहने वाले होते हैं। संयम एवं आत्मविश्वास से भरे हुए रहते हैं।
सिंह लग्न में अन्य विशेषताएं
बलवान एवं बुद्धिमान तथा मन पसंद वस्तुओं को पाने लेने की प्रबल ज्येष्ठा से युक्त रहते हैं। घर परिवार एवं समाज में मुखर रहने वाले होते है। यह अपने बौद्धिक एवं शारीरिक क्षमताओं के कारण शासन एवं प्रशासन के कार्यों में रूचि रखने वाले होते हैं। तथा अनुशासन प्रिय होते हैं। किसी कार्य एवं दायित्वों के निर्वाहन में चतुर एवं सक्षम रहते है। यानी यह अच्छे शासक एवं प्रशासक होते हैं। किसी बात को बिना लाग लपेट के स्पष्ट रूप से कहने वाले तथा करूणा एवं लज्जा से युक्त तथा अध्ययन एवं अध्यापन में रूचि रखने वाले। किसी भी विषय को जानने एवं समझने का शौक बना हुआ रहता हे। यह खोज एवं अनुसंधान से जुड़े कार्य में निपुण होते हैं। बेहतरीन सुख-सुविधाओं को जुटाने में लालसा बनी हुई रहती है। आपने कार्य एवं पराक्रम के द्वारा दूसरे की मदत करने वाले तथा लोगों के अन्दर आत्मविश्वास एवं उमंग को पैदा करने वाले होते हैं।
सिंह लग्न के अन्य स्वभावगत गुण
इसके प्रमुख गुणों में आत्मविश्वास तथा उत्साह है, जो इनके स्वभाव में शांति देने वाला होता है। यह अपने बल एवं पराक्रम के कारण जीवन की सुख सुविधाओं को जुटाने एवं समाज में अपनी पहचान को स्थापित करने में शीर्ष स्तर तक पहुंचने वाले होते हैं। यानी किसी भी समस्या और कठिन कार्य मे यह धैर्य एवं संयम से कार्य लेते है। तथा उस मौके की तलाश में रहते हैं, जहाॅ से इन्हें कोई मौका या फिर सफलता हासिल होती है। हालांकि यह किसी ऐसे व्यक्ति से जल्द नाराज हो जाते है जो कि, चाटुकारी करने वाला होता है। इसकी सफलता का मुख्य राज यह हैं कि, यह अपने आत्मविश्वास को किसी भी मोर्चे पर जल्द कमजोर नहीं होने देते हैं। तथा दूसरों को हिम्मत एवं साहस देने के साथ उनके आत्मविश्वास को अच्छा बनाने के लिए तत्पर रहते हैं। यह राजा मुखिया तथा कलाओं कविताओं में रूचि रखने वाले होते हैं। सरकार पुलिस एवं सेना से जुड़े कार्य राजनैतिक कार्य में इन्हें महारत हासिल होती है। इन्हें प्रकृति दृश्य एवं अधिक स्वाष्टि व्यंजन पसंद होते है। अपने विपरीत लिंग के प्रति इनका आकर्षण अधिक होता है। यह उन्हें पूरे मन एवं दिल से चाहते हैं। किन्तु इनमें कामुकता अधिक होती है। ऐसे में कई बार इन्हें संबंधों में तनाव एवं अपमान को भी झेलना पड़ जाता है।
सिंह लग्न पराक्रमी एवं बलावान
यह अपने गुणों के कारण बल एवं पराक्रम से युक्त होते है। तथा किसी भी कार्य को बड़े ही शानदार तरीके से पूरा करने में सक्षम होते हैं। इन्हें वनभूमि एवं वन क्षेत्र पसंद होता हैं। जिससे यह बागवानी और पेड़ पौधों यानी वनस्पति जगत से इनका अनूठा लगाव होता है। स्वभावगत क्रोध होने के कारण इन्हें अति शीतल स्थानों में मुश्किलें आती रहती है। जिससे यह अपने को ऐसे स्थानों एवं वातावरण में रखना पसंद करते हैं, जो इनके लिए आरामदायक हो।
सिंह लग्न में मंगल का प्रभाव
मंगल ग्रह
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल ग्रह अत्यंत ऊर्जावान होने के कारण अस्थिर और जिज्ञासु बना हुआ रहता है। जिससे किसी भी कार्य को लेकर इसमें अत्यंत उत्सुकता बनी हुई रहती है। यह अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यदि जरूरत पड़ी तो, युद्ध और संग्राम से भी पीछे नहीं हटने वाले होते हैं। यानी क्रोध की अधिकता के कारण यह मनुष्यों में कई बार चिड़चिड़ापन और जल्द ही गुस्सा होने के लक्षणों को देने वाले रहते है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य मंगल एक दूसरे के नैसर्गिक मित्र हैं। जो मनुष्यों को जीवन शक्ति और पराक्रम देने वाले होते हैं। इनकी शुभता से व्यक्ति पराक्रमी और शत्रुओं पर विजय श्री आर्जित करने वाला रहता है। मंगल को युद्ध कला से युक्त तथा शरीर में बल देने वाला कहा जाता है। मंगल अपने ऊर्जा के कारण मनुष्यों में नया जोश एवं उमंग को देने वाला रहता है। यह नवग्रह मण्ड़ल में सेनापति के रूप में नियुक्ति है। यह शत्रुओं के दमन के लिए अस्त्र शस्त्र के प्रयोग में निपुण और उन्हें जीत लेने के सामर्थ को प्रयोग करता रहता है। घर परिवार में यह छोटे भाई मेकैनिकल आदि से संबंध रखने वाला होता है।
मंगल का फलादेश सिंह लग्न में
सिंह लग्न के स्वामी जगत पिता श्री सूर्य भगवान होते है। जो इस सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड़ कि आत्मा और जगत के स्वामी है। यह पालनकर्ता और मनुष्यों में क्षेम देने वाले भी है। उच्च पदवी एवं आत्म शक्ति का स्रोत कोई और नहीं, बल्कि इस लग्न के स्वामी एवं मालिक श्री सूर्य भगवान ही हैं। यह पराक्रम एवं यश कीर्ति तथा बुद्धि एवं वैभव को देने वाले माने जाते हैं। यह दार्शनिक ख्याति को देने वाले होते हैं। मंगल ग्रह इनका नैसर्गिक मित्र है। सिंह लग्न में मंगल ग्रह अपने मित्र के लग्न में होते हैं। ज्योतिष में मंगल को तामसिक प्रवृत्ति वाला माना गया है। यानी मंगल तमोगुण से युक्त है। वहीं इस लग्न के स्वामी श्री सूर्य सत्गुणी है। यानी यह सत गुणी है। मंगल अपने पुरूषार्थ एवं पराक्रम के कारण सर्वविदित है। यह पुरूषार्थ करने वाला तथा शत्रुओं को पराजित करने वाला, यह अग्नि तत्व एवं क्रूर ग्रह में शामिल है। इसके स्वभाव में अस्थिरता के दर्शन होते है। यानी अपनी बातों में कई बार स्थिर नहीं रहने वाला चालबाज होता है। प्रवासी एवं बार-बार स्थान बदलने वाला होता है। मंगल ग्रह का प्रभाव होने से कुछ ऐसे ही लक्षण जातक एवं जातिकाओं को होते हैं। यानी सिंह लग्न में मंगल यदि शुभ हैं, तो अच्छे प्रभावों को देगे। यदि इस लग्न में यह पीड़ित एवं पाप ग्रहों युक्त तथा दृष्ट हैं तो, इनके अशुभ परिणामों में वृद्धि होती रहती है।
सिंह लग्नगत मंगल का दृष्टि प्रभाव
यहाॅ मंगल यदि लग्नगत है तो, वह प्रथम भाव में होने पर चैथे तथा सातवें और आठवें स्थानों को अपनी दृष्टि से देखेगा। यदि मंगल चतुर्थ स्थान में है, तो भी वह दारा भाव, कर्म भाव और लाभ भाव को देखेगा। इन स्थानों में मंगल अपनी क्रूरता के कारण कई बार जातक एवं जातिकाओं को अशुभ फल देने वाला रहता है। हालांकि यदि मंगल शुभ ग्रहों से दृष्ट एवं युत है तो, उसके अशुभ फलों में कमी आ जाती है। इन स्थानों में दृष्टि का प्रभाव होने से व्यक्ति को कई तरह की बीमारियां एवं कष्ट एवं दुःख झेलने पड़ते हैं। ऐसे में उसे भवन सुख का आभाव एवं वाहन सुख में कमी या फिर वाहन से चोटादि भय बना हुआ रहता है। वहीं वैवाहिक जीवन में खटपट तथा प्रेम एवं मधुरता का आभाव बना हुआ रहता है। हालांकि किसी भी कुण्ड़ली में मंगल के समूचे शुभ एवं अशुभ प्रभाव को जानने के लिए उसकी शुभाशुभ स्थिति का विश्लेषण करने के बाद ही, किसी अंतिम निर्णय में पहुंचा जा सकता है।
मंगल की दशाः
ज्योतिष शास्त्र में महादशा एवं अन्तर्दशा को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। प्रत्येक ग्रह अपने गुण धर्मों के अनुसार जातक एवं जातिकाओं को शुभ एवं अशुभ फल देता है। यानी वह ग्रह जिस भी स्थिति में है और जिस भाव से जुड़ा हुआ है। वह अपनी दशा एवं अन्तर्दशा में उन भावों के फलों को देने वाला होता है। इसी प्रकार मंगल भी अपने महादशा, अन्तर्दशा एवं प्रत्यन्तर आदि क्रमों में अपने शुभ तथा अशुभ स्थिति के अनुसार ही उन भावों का फल देने वाला होता है। यहाॅ सिंह लग्न में मंगल को यद्यपि अशुभ नहीं माना गया है। किन्तु मंगल भावस्थ स्थिति इस संदर्भ में विचारणीय है। मंगल की दशा इस लग्न के लिए अच्छे परिणामों को देने वाली रहेगी। हालांकि यह बात सामान्य तौर से कही गई है। किन्तु मंगल पीड़ित एवं नीच तथा शत्रु क्षेत्री होने से यहाॅ अशुभ परिणामों को देने वाला हो जाता है। तथा उसके शुभ परिणामों में कमी आ जाती है।
सिंह लग्न के लिए मारकेश ग्रह
इस लग्न के लिए बुध एवं शनि अशुभप्रद स्थिति को देने वाले तथा मारकेश की भूमिका में रहेगे। जिससे यह दशा एवं अन्तर दशा आदि की स्थिति में अपने शक्ति एवं क्षमताओं के अनुसार मारक एवं अशुभ फलों को देने वाले रहेगे। जब यह ग्रह इस लग्न में दशा एवं अन्तरदशा में आएंगे तो अपने सकारात्मक एवं नकारात्मक फलों के अनुपात के अनुसार ही यानी जिस अनुपात में यह सक्षम है। उसी अनुपात में शुभ एवं अशुभ स्थिति को देने वाले रहेंगे। यानी यह मारकेश होने के कारण यहाॅ जातकों को रोग बीमारी पीड़ा, शत्रु भय, चोट, तथा पारिवारिक जीवन में विघटन आदि को देने वाले रहेगे। जिससे घर परिवार में अशुभ समाचार एवं जातक तथा जातिकाओं को मृत्यु भय पीड़ा एवं रोग,कलह आदि परेशान करते रहते हैं।
मंगल ग्रह के अशुभ प्रभाव
मंगल सिंह लग्न के लिए यद्यपि शुभकारक ग्रह की श्रेणी में शामिल है। हालांकि यह बात अलग है कि, मंगल नीचगत होने के कारण कुछ नकारात्मक प्रभावों को देने वाला हो जाता है। यह जातकों की कुण्ड़ली में लग्नगत पाप ग्रहों से आक्रांत हो शत्रु ग्रहों के साथ किसी प्रकार से संबंध स्थापित कर रहा हो तो, निश्चित तौर पर इसकी शुभता में कमी आ जाती है। ऐसे में कुण्ड़ली की समीक्षा करने के बाद ही मंगल की अशुभता का पैरा मीटर निकल सकता है।
सिंह लग्न में मंगल ग्रह की विशेष स्थिति
इस लग्न के स्वामी सूर्य ग्रह हैं, जिन्हें नवग्रह मण्ड़ल में राजा कहा जाता है। जो पिता के कारक और आत्म तत्व के अधिष्ठाता देवता ग्रह है। यह पूर्व दिशा के स्वामी और शरीर में हड्डी विशेष रूप से इन्हें रीढ़ की हड्डी से जोड़ कर देखा जाता है। इन्हें अग्नि तत्व की संज्ञा प्राप्त है। इनके स्वभाव में स्थिरता होती है। जो संसार का पालन समान रूप से करने वाले होते हैं। यह क्षत्रिय वर्ण सत्व गुणी पुरूष ग्रहों की श्रेणी में शामिल है। हालांकि इनके परम तेज और संसार में सभी शुभ अशुभ स्थितियों को जीवन एवं मृत्यु देने के कारण इन्हें क्रूर और अशुभ भी कहा जाता है। इस लग्न में मंगल ग्रह विशेष एवं खास स्थिति से युक्त होते है। क्योंकि यह मंगल मित्र ग्रह हैं। और नवम तथा चतुर्थ भाव के स्वामी होने के कारण मंगल यहाॅ योग कारक होता है। जिससे मंगल को यहाॅ शुभकारक माना जाता है।
मंगल का प्रभाव इस लग्न में सुख भाव से होने के कारण व्यक्ति को अचल सम्पत्ति का लाभ तथा मातृ सुख एवं कृपा बना रहती है। यदि मंगल किसी प्रकार से पीड़ित नहीं है तो, यहाॅ जातक एवं जातिकाओं को शुभ एवं सकारात्मक परिणाम मिलते हैं। वह कई तरह के साधन एवं प्रसाधनों से युक्त रहता है।
सिंह लग्न में मंगल ग्रहः
शुभ और अशुभ प्रभाव
इस लग्न के लिए मंगल शुभकारक ग्रहों की श्रेणी में शामिल होने के कारण जातक एवं जातिकाओं को वांछित परिणामों को देने वाला होता है। यदि मंगल किसी प्रकार से पीड़ित एवं अशुभ नहीं है तो, वह अच्छा पुत्र एवं अच्छा पिता बनाने वाला धार्मिक एवं प्रतिष्ठत करने वाला होता है। इस लग्न के जातकों की नेतृत्व क्षमताएं अच्छी बनी हुई होती है।
भूमि एवं भवन का लाभ
इस लग्न में मंगल सुख भाव के स्वामी होने के कारण व्यक्ति को भूमि एंव भवन का लाभ देने वाले होते हैं। जिससे उसे अच्छे मकान शोरूम, फैक्ट्री आदि का लाभ मिलता है।
नेतृत्व क्षमताओं का विकास
इस लग्न में मंगल व्यक्ति को सृजनात्मक एवं रचनात्मक शक्तियों को देने वाला होता है।
सिंह लग्न में मंगल
इस लग्न का स्वामी सूर्य ग्रह है, जो अग्नि तत्त्व संज्ञक है, तथा इसे पुरूष ग्रह की संज्ञा प्राप्त है। इसे क्रूर एवं अशुभ कहा जाता है। यह पूर्व दिशा के स्वामी और दिनकर कहें जाते हैं। इस लग्न में मंगल यद्यपि अपने मित्र के घर में होता है। यहाॅ सूर्य एवं मंगल में दोनों के तत्व समान है तथा ज्योतिष में इन्हें क्रूर ग्रहों की संज्ञा प्राप्त है। मंगल यहाॅ पर तमोगुणी किन्तु सूर्य सत्व गुणी हैं। इस लग्न के दृष्टिकोण से देखा जाए तो, मंगल अशुभ कारक नहीं बल्कि शुभकारक ग्रहों में शामिल है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
इस लग्न में विद्यमान मंगल यदि अशुभ एवं पीड़ित नहीं है तो, यह जातक एवं जातिकाओं के सेहत को खराब नहीं करता है। यदि मंगल कुण्ड़ली के अनुसार अशुभ स्थिति में है तो, अशुभ परिणाम मिलेगे।
मंगल का अन्य भावों में प्रभाव
1- सिंह लग्न की कुण्ड़ली में यदि मंगल पहले, चैथे, सप्तम, अष्टम और बारहवें भाव में विद्यमान हो तो, यह मांगलिक दोष को उत्पन्न करने वाला होता है।
2- इस लग्न में मंगल चतुर्थ एवं नवम भाव का स्वामी है। जिससे इसे सकारात्मक माना जाता है।
3- लग्न के स्वामी श्री सूर्य एवं मंगल का युति संबंध अशुभ माना जाता है। क्योंकि दोनों ही अग्नि तत्व होने के कारण अंगारक योग को निर्मित करते हैं।
4- सिंह लग्न के स्वामी सूर्य और लनस्थ मंगल जो चतुर्थ और नवम भाव के स्वामी है। वही श्री सूर्य केन्द्र भाव के स्वामी हैं, जब मंगल केन्द्र स्थानों में स्वराशिगत उच्च राशि गत हो तो, मंगल से रूचक नामक योग बनाता है।
5- सिंह राशि का मंगल मित्र राशि में होता है। किन्तु मंगल कर्क राशि में नीच का होता है। इससेे सातवीं मकर राशि उसकी उच्च राशि है। यानी मंगल मकर के 28 अंश में परम उच्च का होता है। तथा कर्क के इतने ही अंशों में परम नीच का हो जाता है।
सिंह लग्न के लिए कारक ग्रह
1- इस लग्न के लिए लग्न स्वामी सूर्य है। यहाॅ मंगल सुख एवं धर्म भावों का स्वामी है। जो शुभकारक माना जाता है। यहां मंगल को दोषी नहीं अपितु शुभ कारक माना जाता है।
2- इस लग्न के लिए बुघ शुक्र और शनि अशुभ एवं पापी ग्रहों की श्रेणी मे है। इन्हें शुभ नहीं माना जाता है। यानी इस लग्न की शुभता को यह ग्रह प्रभावित करते रहते हैं।
मंगल के संकेत
हालांकि मंगल को सिंह लग्न के लिए शुभकारण माना गया है। किन्तु यहाॅ मंगल शुभ स्थिति में हो तो शुभ एवं सकारात्मक परिणामों को देने वाला होता है। यदि मंगल अशुभ स्थिति में होगा तो वह अशुभ एवं नकारात्मक परिणामों को बढ़ाने वाला होता है।

उपाय
यदि कुण्ड़ली में मंगल का विश्लेषण करने के पश्चात् यह पता चले कि, भौम ग्रह अशुभ परिणाम दे रहा है तो, आपको कुछ सरल एवं उपयोगी उपायों को करना चाहिए।
1- ऊॅ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें या फिर करवायें।
2- लाल वस्तुओं का दान जिसमें लाल मसूर, लाल कपड़े, तथा पके हुए लाल फल आदि का दान देना चाहिए।
3- श्री भौमाय नमः मंत्र का जाप प्रतिदिन 108 बार जरूर करें।
4- शहद एवं गुड़ का दान करें।
5- मन्दिर में देवी के निमित्त असली लाल चंदन का दान दें।
6- मंगला गौरी का व्रत रखें।
7- घर एवं परिवार में छोटे भाई को प्यार करें। ध्यान रखें बिना ज्योतिषीय परामर्श के कोई अगूंठी एवं कड़ा तथा रत्न आदि न धारण करें।
8- मांगलिक दोष के निवारण हेतु मंगल ग्रह का वैदिक मंत्रों के साथ अनुष्ठान एवं घट विवाह आदि विधि विधान से करवायें।
निष्कर्षः मंगल भवन के इस सिंह लग्न के लेख से जो ज्योतिषीय निष्कर्ष आ रहा है। वह बता रहा है कि, मंगल इस लग्न के लिए शुभयोग कारक है। यदि वह पाप पीड़ित है तो, इसके शुभ प्रभावों को खराब या फिर कमजोर कर सकता है।
FAQS\ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-
Q1. सिंह लग्न में मंगल ग्रह शुभ होता है या अशुभ?
An. सिंह लग्न में मंगल ग्रह योगकारक होता है क्योंकि यह चतुर्थ और नवम भाव का स्वामी है। यदि मंगल पीड़ित नहीं है, तो यह अत्यंत शुभ फल देता है।
Q2. सिंह लग्न में मंगल किन भावों में मांगलिक दोष बनाता है?
An. पहले, चौथे, सप्तम, अष्टम और बारहवें भाव में स्थित मंगल मांगलिक दोष उत्पन्न करता है।
Q3. सिंह लग्न में मंगल की महादशा कैसी होती है?
An. मंगल की महादशा सामान्यतः शुभ परिणाम देती है, लेकिन यदि मंगल अशुभ या नीच का हो तो इसके परिणाम नकारात्मक भी हो सकते हैं।
Q4. सिंह लग्न के लिए मारकेश ग्रह कौन से हैं?
An. इस लग्न के लिए बुध और शनि मारकेश ग्रह माने जाते हैं, जो अपनी दशा में कष्ट और बाधाएं दे सकते हैं।
Q5. सिंह लग्न में मंगल से कौन-कौन से लाभ मिलते हैं?
An. मंगल के शुभ होने पर भूमि, भवन, वाहन सुख, नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास और सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है।
Q6. मंगल के अशुभ प्रभाव को कैसे दूर करें?
An. मंगल दोष शांति के लिए “ॐ भौमाय नमः” मंत्र जाप, लाल वस्तुओं का दान, मंगला गौरी व्रत और धार्मिक अनुष्ठान करना लाभकारी होता है।




