प्रस्तावना
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार क्रांतिवृत्त के बारहवें हिस्से को राशि की संज्ञा दी गई है। फल कथन में राशिचक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है। इस राशिचक्र के बारह भागों में प्रत्येक भाग 30 अंश का होता है। आकाश मंडल में स्थित भचक्र बारह खण्ड़ों एवं 27 नक्षत्रों के समूह से बना हुआ है। इस प्रकार से सम्पूर्ण क्रंातिवृत्त का मान 360 अंश हो जाता है। इसी कारण क्रांतिवृत्त में बारह राशियों के दर्शन होेते रहते हैं। प्रत्येक राशि अपने गुण धर्माें के कारण जातक एवं जातिकाओं को शुभ और अशुभ फल देने की क्षमता रखती है।
आइए आज के इस मंगल भवन के लेख में मै आचार्य अंकुश मिथुन लग्न में मंगल ग्रह के कुछ खास प्रभाव, कारक, मारक आदि और उसके फल कथन के संदर्भ में सारगर्भित तथा विस्तृत लेख को प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस महत्वपूर्ण जानकारी के लिए आप हमारी इस प्रस्तुति को अंत तक जरूर पढ़े। साथ ही आपके उपयोगी सुझावों को हम सादर आमंत्रित करते हैं।
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ज्योतिष शास्त्र में नाम राशि
भारतीय वैदिक ज्योतिष शास्त्र में व्यक्ति के नामराशि का निर्धारण जन्म नक्षत्र से होता है। यानी जन्म के समय चन्द्रमा जिस भी नक्षत्र में होता है। उसी के अनुसार राशि का निर्धारण होता है। जैसे किसी जातक के जन्म के समय रेवती नक्षत्र विद्यमान था तो, उसकी मीन राशि होगी। किन्तु पश्चिमी जगत् में सूर्य के अनुसार राशि का निर्धारण होता है। प्रत्येक राशि का स्वामी और उस राशि पर ग्रहों का प्रभाव दृष्टि संबंध आदि फल कथन के दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। मिथुन राशि का स्वामी बुध ग्रह माना जाता है। इसी प्रकार प्रत्येक राशि के स्वामी ग्रह भिन्न-भिन्न होते हैं।
लग्न का निर्धारणः
ज्योषिशास्त्र के अनुसार जब किसी जातक एवं जातिका का जन्म होता है। तो उस समय में पूर्वी क्षितिज में जो राशि उदित हो रही होती है। वही उसकी लग्न होती है। यानी बालक एवं बालिका के जन्म के समय कौन से ग्रह एवं नक्षत्र विद्यमान थें। तथा जन्म के वक्त कौन सी लग्न उदित हो रही थी। यह निर्धारण उस समय एवं नक्षत्रों तथा ग्रहों के स्थिति के अनुसार हो पाता है। इस प्रकार से ज्योषि के शास्त्र में 12 लग्नों को मान्यता प्राप्त हैं। जिसे फल कथन में आत्मा एवं शरीर की संज्ञा दी गई है।
ज्योतिष में मिथुन लग्न के खास लक्षण
इस लग्न में जन्म लेने वाले जातको के शारीरिक बनावट एवं उनके कद काठी तथा स्वभाव की बातें करें तो, यह सुडौल तथा लंबे शरीर वाले होते हैं। जिससे इनके हाथ पतले एवं लंबे प्रतीत होते हैं। तथा इनका बदन पुष्ट तथा गठीला होता है। तथा इनकी ठोढ़ी में कुछ गढ्ढ़ा सा बनता रहता है। बोलने एवं किसी कार्य की सक्रियता में यह लक्षण दिख सकते हैं। यह अपने स्वभाव के कारण कटु भी बोल जाते हैं। यदि पाप ग्रह का प्रभाव हो तो चेहरे में कोई तिल मस्सा रहता है। काली आंखें और लंबी नाक के कारण यह बड़े ही अद्भुत दिखाई देते हैं। इनके शरीर का रंग मध्यम न अधिक गेंहुआ और न अधिक काला रहता है। यानी यह मध्यम रंग वाले रहते हैं।
मिथुन लग्न की अन्य स्वाभाविक बातें
इस लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के स्वभाव में तीव्रता एवं सौम्यता दोनों ही विद्यामान रहती हैं। यह शूरवीर ज्ञानी एवं दयालु तथा कई बार हठी स्वभाव के होते है। यह मौके की नजाकत को तुरंत ही समझ लेते हैं। इन्हें जब यह ज्ञात हो जाता है कि, वातावरण इनके अनुकूल नहीं हैं, तो उसी के अनुसार अपने को ढ़ालते हुए अपनके कार्यों को सिद्ध करने में लगे हुए रहते हैं। यह ज्ञानी एवं मानी होते हैं। दूसरों का परोेपकार करने वाले तथा सहानुभति से युक्त होते है। हालांाकि अपने कार्य के प्रति यह सक्रिय रहते हैं। यदि कोई कठिनाई इन्हें महशूस होती है। तो यह अपने धैर्य को खोने लगते हैं। यानी परिवर्तनशीलता को यह जल्द ही स्वीकार करने वाले होते हैं। जहाॅ जैसी जरूरत है, वहाॅ वैसे पेश होने की इनमे बड़ी अद्भुत कला मौजूद रहती है।
मजबूत स्मरण शक्ति तथा कुशाग्र बुद्धि
इन्हें मौकेबाज तथा धोखा देने के कारण कई बार बड़ी हाॅनि उठानी पड़ जाती है। इनकी स्मरण शक्ति मजबूत तथा कुशाग्र बुद्धि, निर्णय लेने में दक्षता। किन्तु धैर्यहीन, कुशल वक्ता प्रवक्ता, संगीत, नृत्य एवं बातचीत में निपुण रहते हैं। इन्हें महिलाएं धोखा देती है। यह कुशल व्यापारी होते हैं। किन्तु छोटी-मोटी नौकरी में यह अपने को ज्यादा समय तक नहीं रख पाते हैं। धर्म एवं आध्यात्म में विशेष रूचि तथा दानदाता एवं सहयोगी भी हाते हैं। शान-शौक करने वाले तथा मनोरंजन एवं उत्सवों को लेकर जिज्ञासु तथा आनन्द से भरे हुए रहते हैं। हालांकि इन्हें बचपन में कई बार रोग एवं पीड़ाएं अधिक परेशान करते हैं।
मिथुन लग्न में मंगल का प्रभाव
मंगल ग्रह
वैदिक ज्योषिशास्त्र में मंगल को सूर्य का मित्र तथा अत्यंत ऊर्जा से युक्त होने के कारण इसे सेनापति, योद्धा एवं वीर पराक्रमी, साहसी, निडर, उत्तेजित करने वाला कहा जाता है। यह क्रोधी, तथा ज्वलनशील पदार्थों का सर्पोटर, वाद एवं विवाद करने वाला। इसे अग्नि, अचल सम्पत्ति तथा छोटे भाई से जोड़कर देखा जाता है। सर्जरी करने वाला सर्जन, मकैनिकल फील्ड़ दुर्घटना, चोट एवं घाव तथा आक्रामकता पुलिस, अस्थिर बुद्धिवाला, तथा श्रमिकों का नेतृत्व करने वाला माना जाता है। यह मादक पदार्थों तम्बाकू, तथा अस्त्र एवं शस्त्रों आदि के कार्यो में लिप्त रहता है। ज्योातिष शास्त्र में इसे पाप ग्रह की संज्ञा दी गई है। इसी उग्रता एवं ऊर्जा के अशुभ प्रभाव से जब व्यक्ति प्रभावित होता है। तो उसके कार्य एवं व्यवहारों में चिड़चिड़ापन एवं छोटी-छोटी बातों में तनाव उत्पन्न होते रहते हैं। यदि वैवाहिक जीवन के भावों से मंगल का अशुभ प्रभाव हो तो, वहाॅ खटपट चलती रहती ही है। यह मंगल के अशुभ परिणाम के कारण होता रहता है।
मिथुन लग्न में मंगल का फलादेश
मिथुन लग्न के स्वामी बुध होते है। जो कि बुद्धि एवं विवेक को प्रजेन्ट करते है। किन्तु मंगल बल एवं पराक्रम के स्वामी होते है। जो किसी भी कार्य को अपने बल एवं पौरूष के द्वारा करने की क्षमता रखते हैं। हालंाकि मंगल ग्रह की बुध के साथ नैसर्गिक शत्रुता होने के कारण यहाॅ लग्नगत स्थित मंगल जातक को कई मोर्च पर अशुभ परिणामों को देने वाला रहता है। क्योंकि मिथुन लग्न में लग्नेश एवं चतुर्थेश का स्वामी ग्रह बुध रहेगा। तथा मंगल षष्ठेश एवं आयेश होने कारण अशुभ एवं पाप फलों को बढ़ाने वाला कहा जाता है। यहाॅ मंगल मिथुन लग्न मंे रोग भाव तथा आय भाव से संबंध होने के कारण अशुभप्रद कहा गया है। मिथुन लग्न यानी प्रथम भाव में मंगल को होने से यहाॅ जातक मांगलिक दोष से युक्त हो जाता है। जिससे उसे कई तरह के अशुभ एवं शुभ दोनों ही परिणाम मिलते हैं। मिथुन लग्न में मंगल योग कारक नहीं हैं। जिससे उसे वैवाहिक जीवन में कई बार नाना प्रकार के कष्ट मिलते हैं। उसका जीवन साथी उससे किसी न किसी कारण से बिछुड़ ही जाता है।
मंगल का दृष्टि प्रभाव मिथुन लग्नगत
यहाॅ मंगल अपने स्वाभाविक गुणों के कारण (प्रथम भाव में होने पर) चतुर्थ तथा सप्तम और अष्टम स्थानों को अपनी दृष्टि से देखेगा। यदि मंगल चतुर्थ स्थान में है, तो भी वह दारा भाव, कर्म भाव और लाभ भाव में दृष्टिपात करेगा। जिससे मुनष्यों को वैवाहिक जीवन में रोग पीड़ायंे एवं संकट आते रहते हैं। ऐसे जातकों को 28 वर्ष तक समय बहुत कठिनायों से बीतता है। जिससे उसे कई तरह चोट भय, बीमारी एवं पीड़ाएं होती रहती हैं। हालांकि यहाॅ ध्यान देने की बात यह हैं, कि मंगल किस स्थिति में वहाॅ है? बली या पीड़ित है। या फिर पाप या शुभ ग्रहों से दृष्ट एवं युत है। यानी इन सभी पहलुओं का समुचित विचार करने की जरूरत रहती है। तभी समुचित फलादेश मिल सकता है।
मंगल की दशाः
मिथुन लग्नगत मंगल यदि शुभ ग्रहों से युत एवं दृष्ट हो तो, ऐसे में जातकों को कई तरह के शुभ परिणाम मिलेगे। यानी मंगल का समुचित विश्लेषण करने के बाद ही यह तथ्य स्पष्ट हो सकता है। कि मंगल अपने दशा एवं अन्तर्दशा में कैसे शुभ तथा अशुभ परिणामों को देने वाला रहेगा। यानी दशा के अशुभ एवं शुभ होने का समुचित विश्लेषण तभी हो सकता है, जब मंगल के साथ ग्रहों की स्थिति स्पष्ट हो। यानी शुभ स्थिति में मंगल सकारात्मक परिणामों को देने वाला रहेगा। जिससे आपको भवन एवं वाहन तथा शारीरिक ऊर्जा का लाभ मिलेगा। वैवाहिक सुख एवं अन्य शुभ समाचार तथा अवसर बने रहेगे। यदि मंगल अशुभ है। तो निश्चित तौर पर विपरीत परिणाम आपको मिलेगें। जिससे दुःख एवं पीड़ायें तथा वैवाहिक विच्छेदन भी सम्भव है।
मिथुन लग्न के लिए मारकेश ग्रह
इस लग्न के लिए चन्द्रमा एवं गुरू मारकेश (सदोष) की भूमिका में रहेगे। यानी इस लग्न के जातकों की जब इन ग्रहों की दशा रहेगी। तो इन ग्रहों की शुभ एवं अशुभ स्थिति के अनुसार इन्हें शुभ और अशुभ फल मिलते है। यदि मारकेश पाप युत एवं दृष्ट हैं, तो ऐसे में रोग बीमारियाॅं पीड़ाएं तथा चोट लगने का भय, और मृत्यु भय आदि भी ग्रहों की स्थिति के अनुसार उत्पन्न हो सकता है। इस राशि के लिए हालांकि मंगल रोगेश होने के कारण अशुभ श्रेणी में ही रहेगा। ऐसे में रोग एवं पीड़ा तथा अन्य छेत्रो में नुकसान लग सकता है। किन्तु गोचरीय स्थिति के कारण मंगल इन स्थानों में यश कीर्ति एवं धन तथा विजय और सुख शांति एवं कामयाबी को भी देने वाला रहता है। किन्तु रोग एवं पीड़ा तथा अपयश मिलने का भी भय बना हुआ रहता है। अतः सावधानी बनाकर चलें।
मंगल ग्रह के अशुभ प्रभाव
मंगल मिथुन लग्न के लिए नकारात्मक प्रभावों को तब और बढ़ा देता है। जब यह जातकों की कुण्ड़ली में पाप ग्रहांे से युत एवं दृष्ट हो, पीड़ित हो, नीच राशिगत हो, शत्रु ग्रहों के साथ संबंध बना रहा हो। तथा मंगल का दृष्टि एवं अन्य संबंध अशुभ एवं पाप ग्रहों से हो रहा हो तब इसकी मारक क्षमताओं में और वृद्धि हो जाती है। ऐसे में साहस एवं बौद्धिकता के साथ चलने की जरूरत बनी हुई रहती है। यानी अपने धैर्य एवं विवेक के साथ चलने की जरूरत रहती है। हालांकि इस लग्न में मंगल रोगेश और लाभेश की प्रमुख भूमिका में है। जिससे इसे योग कारक नहीं कहा जा सकता है। बल्कि इस लग्न के लिए यह पाप एवं अशुभ श्रेणी में है।
मिथुन लग्न में मंगल ग्रह की विशेष स्थिति
इस लग्न के स्वामी बुध ग्रह हैं, जिसे युवराज कहा जाता है। किन्तु इस लग्न के लिए मंगल रोगेश तथा लाभेश के स्वामी रहेगे। यहाॅ मंगल रोगेश होने के कारण जातकों को अपनी अशुभ स्थिति के कारण कई तरह के रोग एवं भय तथा पीड़ाओं चोट एवं दुघर्टनाओं को देने वाले कहे जाते हैं। किन्तु गोचरीय स्थिति के कारण यदि मंगल इन स्थानों में पहुंचते हैं। तो निश्चित तौर पर मनुष्यों को सुख समृद्ध मिलती है। तथा अपने शत्रुओं पर विजयश्री हासिल करने में सफल होता रहता है। यदि कोई मुकद्मा आदि है तो, उसमें उसे जीत हासिल होती है। नौकरी पेशा में अच्छा सम्मान एवं पुलिस तथा सेना में भर्ती एवं कानूनी मोर्चे पर उसे बहुत ही खास किस्म की सफलता मिलती है। मंगल यदि यहाॅ शुभ स्थिति में है, तो उसे निश्चित तौर पर खनन, एवं सरकारी क्षेत्रों से धन लाभ मिलने के आसार रहते है। मामा आदि पक्षों की उन्नति और उनके साथ अच्छा तालमेल देने वाला रहता है।
मंगल का प्रभाव इसी प्रकार आय भाव से होने के कारण व्यक्ति को सामाजिक एवं राजनैतिक मोर्च पर बड़ी कामयाबी मिलती है। यहाॅ व्यक्ति आई. आई. टी. इंजीनियरिंग तथा अच्छे मित्रों से युक्त रहता है। घर परिवार में वह प्रतिष्ठित रहता है। वह जिस कार्य को हाथ लगाता है उसे अच्छी तथा वांछित किस्म की सफलता मिलती है। यदि मंगल जन्म कुण्ड़ली में खराब एवं पीड़ित अवस्था में है। तो संबंधित शुभ फलों को नुकसान देने वाला रहेगा। जिससे उसकी दशा भी आपके लिए अच्छे परिणामों को देने वाली नही रहेगी। अतः रोग पीड़ा दुःख तथा बीमारियों से बचने के लिए सावधानी से चलने की जरूरत रहेगी।
मिथुन लग्न में मंगल ग्रहः
शुभ और अशुभ प्रभाव
इस लग्न में यदि विशेष फलादेश में गौर करें तो यह ज्ञात होता है, कि ज्योतिष के सिद्धान्तों के अनुसार मंगल यहाॅ रोगेश और एकादेश होने के कारण अशुभ एवं पाप ग्रहों की श्रेणी में शामिल है। हालांकि धनेश चन्द्रमा यदि मंगल से युति बना लेता है तो, निश्चित तौर पर यहाॅ कुछ कठिनाइयों के बाद आपको सुन्दर परिणाम मिलेगें।
धन और करियर
इस लग्न में मंगल धन भाव के स्वामी चन्द्रमा से यदि युति तथा दृष्टि संबंध स्थापित कर लेता है। तो जातक धनी मानी और सुख सुविधाओं से युक्त अच्छे और पौष्टिक आहारों का आनन्द लेने में सफल होता है। मंगल षष्ठेश होने के कारण नौकरी तथा चिकित्सा आदि के क्षेत्रों में अच्छे करियर की सौगात को देने वाला होता है। तथा लाभ भाव से संबंध होने के कारण अच्छे धन लाभ को भी देने वाला रहता है। किन्तु मंगल का शुभ होना अत्यंत जरूरी है।
प्रतिष्ठा एवं वाहन लाभ
इस लग्न में मंगल व्यक्ति को समाज में प्रतिष्ठा एवं सम्मान दिलाने वाला होता है। यहां उसे मंगल के कारण अच्छे वाहनों का सुख भी मिलता है। मंगल के कारण उसे घर परिवार एवं तथा लोगों के मध्य अच्छी प्रतिष्ठा मिलती है।
परिवार एवं अच्छे मित्रों का लाभ
इस लग्न में मंगल सुखद एवं विश्वास पात्र मित्रों को देने वाला रहता है। तथा अपने विपरीत लिंग के प्रति उसकी उत्सुकता रहती है। तथा उसे यहाॅ विपरीत लिंग की मित्रता जल्द ही मिल जाती है। यानी कामुकता को बढ़ाने वाला रहता है। यदि मंगल दूषित एवं पाप पीड़ित कमजोर शत्रु क्षेत्रीय आदि हो तो, उसे समाज में अपयश और क्षति उठानी पड़ती है। इस लग्न के मंगल के कारण उसे भ्रात सुख और उनके मध्य पे्रम सद्भाव प्राप्त होता रहता है।
मिथुन लग्न में मंगल के अशुभ फल
इस लग्न का स्वामी ग्रह बुध है, जो पृथ्वी तत्त्व है तथा बुध अपने स्वभाव के कारण सम तथा शुभ संज्ञक ग्रह है। तथा वह राजसी गुणों से युक्त माना जाता है। किन्तु इस लग्न में विद्यमान मंगल ग्रह अग्नि तत्व का प्रतीक है, तथा अपने मन एवं विचारों के चलायमान होने के कारण चर स्वभाव से युक्त रहता है। इसे कूर और तमो ग्रह की संज्ञा प्राप्त है। इस प्रकार से इस लग्न के लिए मंगल अशुभ माना जाता है। मंगल जहाॅ पुरूषार्थ करने वाला है। वही लग्न का स्वामी ग्रह नपुंसक श्रेणी में आता है। जिससे इस लग्न के मंगल के अशुभ परिणाम और बढ़ जाते हैं।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
इस लग्न में विद्यमान मंगल व्यक्ति के स्वास्थ्य को खराब करने वाला तथा प्रारब्ध गत एवं उम्रगत रोगों को उत्पन्न करने वाला होता है। स्वभाव में चिड़चिड़ापन एवं उच्च रक्तचाप, सिर दर्द चोट, वाहन दुघर्टना, हृदयाघात, पक्षाघात व्रण एवं घाव को देने वाला रहता है। मंगल के अशुभ होने के कारण जातकों के अण्ड़कोष में सूजन या मूत्र रोग तथा दूसरे प्रकार के गुप्तांगों के रोग उभरते रहते है। जिससे व्यक्ति के चेहरे की रौनकता गायब रहती है। वह अक्सर निराश एवं हताश होने लगता है। यानी मंगल मासिक एवं शारीरिक सेहत में बुरे असर ड़ालने वाला रहता है।

मंगल का अन्य भावों में प्रभाव
1 मिथुन लग्न की कुण्ड़ली में यदि मंगल पहले, चैथे, सप्तम, अष्टम और बारहवें भाव में विद्यमान हो तो, यह मांगलिक दोष को उत्पन्न करने वाला होता है।
2 इस लग्न में मंगल षष्ठ भाव का स्वामी है। यदि मंगल कुण्ड़ली में आठवे एवं बारवें भावगत विद्यमान हो, तो यह जातक की कुण्ड़ली में विपरीत राज योग देने वाला रहता है। हालांकि इस योग के निर्धारण के अन्य नियमों को ध्यान में रखकर ही इसे विपरीतराज योग की संज्ञा दी जा सकती है। सिर्फ भाव का स्वामी होने और उसके उन भावों से बैठने से ही विपरीत राज योाग नहीं रहेगा। क्योंकि अन्य नियमों को जब समुचित रूप से लागू किया जाता है। तो इस योग के भंग होने या बनने की पुष्टि तभी हो पाती है।
3 मंगल रोग और आय भाव का स्वामी है। चंद्रमा द्वितीय भाव यहाॅ चन्द्रमा की युति लक्ष्मीयोग को निर्मित करने वाली हैै।
4 मिथुन लग्न के स्वामी बुध और लनस्थ मंगल जो रोग और आय भाव के स्वामी है। वही बुध केन्द्र भाव के स्वामी है। इन दोनों की युति जब केन्द्र स्थानों में स्वराशिगत उच्च राशि गत हो तो मंगल से रूचक नामक योग बनाता है तथा बुध भद्र योग को निर्मित करने वाला होता है।
5 मिथनु लग्न में मंगल यदि द्वितीय भाव गत विद्यमान है तो, यहाॅ उसकी नीच राशि होगी। तथा कर्क से सातवीं मकर राशि उसकी उच्च राशि है। यानी मंगल मकर के 28 अंश में परम उच्च का होता है। तथा कर्क के इतने ही अंशों में परम नीच का हो जाता है। नीच का मंगल अशुभ तथा धन हांनि रोग, भय पीड़ा, परिजनों से विरोघ कुटुम्ब के लिए घातक रहेगा।
मिथनु लग्न के लिए कारक ग्रह
1 इस लग्न के लिए लग्न स्वामी बुध केन्द्र भावों का प्रथम एवं चतुर्थ भावों का स्वामी यह स्वतः ही योग कारक है। वही शुक्र पंचम स्थान का स्वामी होने के कारण योग कारक है। यहाॅ शुक्र व्ययाधीश होने के पश्चात् भी योग कारक बना हुआ रहेगा।
2 गुरू केन्द्र स्थानों का स्वामी होने के कारण दोष युक्त अकारक होता है। हालांकि फल कथन में गुरू की शुभता एवं अशुभता का ध्यान रखते हुए अंतिम निर्णय लेना चाहिए। यानी कुण्ड़ली के सभी पहलुओं का समुचित विचार करने के बाद ही अंतिम निष्कर्ष देना उपयुक्त रहता है।
मंगल के संकेत
यदि कुण्ड़ली में मंगल शुभ होकर बैठा है, तो निश्चित रूप से आपको शुभ तथा सकारात्मक परिणाम मिलेगे। क्योंकि यह कैरियर के क्षेत्रों में उच्च मुकाम को देने वाला रहता है। जिससे यश विजय, धन लाभ, गाड़ी, बंगला, नौकर तथा मित्र और अच्छे भाइयों को देने वाला रहता है। यह अच्छे मंगल के संकेत हैं। किन्तु अशुभ मंगल के कारण जीवन में अशुभ संकेत और बुरे परिणाम आते रहते हैं। जिससे व्यक्ति निराश हताश और छोटी-छोटी बातों में झगड़ा करने के संकेत देता रहता है।
उपाय
यदि कुण्ड़ली में मंगल अशुभ परिणाम दे रहा हो, तथा उसके कारण नकारात्मक स्थिति उभर रही हो तो, आपको कुछ सरल एवं उपयोगी उपायों को करना चाहिए।
1 श्री यंत्र को प्रतिष्ठत करवा करकें उसे अपने पूजा स्थान में रखें। उसकी नियमित रूप से पूजा और अर्चना करें।
2 बंदरों को भीगे हुए चनें ड़ाले। मन्दिर में जाकर हनुमान जी को कामिया सिंदूर तथा चमेली का तेल अर्पित करे।
श्री मारूति यंत्र को स्थापित कर उसकी प्रतिदिन धूप और कपूर जलाकर आरती एवं पूजा करें।
3 श्री बंजरंग बाण या फिर सुन्दर काण्ड़ का पाठ करें। मंगल ग्रह के मंत्रों का जाप एवं अनुष्ठान करवायें। तथा ब्राह्मणों को दान देकर उन्हें प्रणाम करें। और अशीर्वाद लें।
4 लाल वस्तुओं का दान करें, जिसमें लाल मसूर और लाल रंग के कपड़े, तांबे के लोटे तथा आचमी आदि का दान करें।
5 मन्दिर में काॅपर की तार यानी लाइट की व्यवस्थाओं में अपना आर्थिक सहयोग दें।
6 माॅ भगवती गौरी को उत्तम श्रृंगार वस्त्राभूषण आदि अर्पित करें।
7 घर एवं परिवार में छोटे भाई के साथ सहानुभूति रखें। उन्हें अप्रिय न कहें। ध्यान रखें बिना ज्योतिषीय परामर्श के कोई अगूंठी एवं कड़ा तथा रत्न आदि न धारण करें।
8 मांगलिक दोष होने पर उसके निवारण हेतु मंगल का जाप एवं उसकी पूजा तथा घट विवाह आदि शास्त्रीय विधि विधान से करवायें।
निष्कर्षः
मंगल भवन के इस मिथुन लग्न के लेख से जो ज्योतिषीय निष्कर्ष आ रहा है। वह बता रहा है कि, यदि मंगल आपकी कुण्ड़ली में अशुभ हैं, नीचगत, तथा पाप पीड़ित एवं अस्त और शत्रु क्षेत्रीय हैं, तो आपको इस लग्न में मंगल की शुभ और अशुभ स्थिति के अनुसार शुभ एवं अशुभ दोनों ही तरह के परिणाम मिलेगें। क्योंकि मंगल इस लग्न में रोगेश एवं लाभेश होता है। तथा वह जिन भावों में स्थिति होगा उसके स्वामी और ग्रहों के अनुसार ही व्यक्ति को शुभ तथा अशुभ परिणाम देने वाला रहेगा। अतः सारांश यह हैं, कि इस लग्न में मंगल मुख्यरूप से पापी और अशुभ माना गया है। किन्तु सम्पूर्ण विश्लेषण के बाद ही उसकी शुभता एवं अशुभता के प्रभाव की तीव्रता को जाना जा सकता है।
FAQS\ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-
Q. मिथुन लग्न में मंगल शुभ होता है या अशुभ?
An. मिथुन लग्न में मंगल सामान्यतः अशुभ माना जाता है क्योंकि यह षष्ठ (रोग) और एकादश (लाभ) भाव का स्वामी होता है। हालांकि, शुभ दृष्टि या युति होने पर यह अच्छे परिणाम भी दे सकता है।
Q. क्या मिथुन लग्न में मंगल मांगलिक दोष बनाता है?
An. हाँ, यदि मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में हो तो मांगलिक दोष बन सकता है, जिससे वैवाहिक जीवन में बाधाएँ आ सकती हैं।
Q. मिथुन लग्न में मंगल का करियर पर क्या प्रभाव होता है?
An. शुभ स्थिति में मंगल इंजीनियरिंग, पुलिस, सेना, चिकित्सा और टेक्निकल क्षेत्रों में सफलता देता है। अशुभ होने पर करियर में संघर्ष और अस्थिरता आ सकती है।
Q. मिथुन लग्न में मंगल का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है?
An. अशुभ मंगल उच्च रक्तचाप, चोट, दुर्घटना, सिरदर्द और गुप्त रोगों का कारण बन सकता है। शुभ स्थिति में यह ऊर्जा और साहस प्रदान करता है।
Q. मिथुन लग्न के लिए मंगल किन भावों को प्रभावित करता है?
An. मंगल प्रथम भाव से चतुर्थ, सप्तम और अष्टम भाव पर दृष्टि डालता है, जिससे घर, विवाह और आयु से जुड़े मामलों पर प्रभाव पड़ता है।
Q. मिथुन लग्न में मंगल के अशुभ प्रभाव से कैसे बचें?
An. हनुमान जी की पूजा, सुंदरकांड पाठ, लाल वस्तुओं का दान और मंगल मंत्र जाप करने से अशुभ प्रभाव कम किया जा सकता है।
Q. क्या मिथुन लग्न में मंगल धन लाभ देता है?
An. हाँ, यदि मंगल शुभ हो और चंद्रमा से संबंध बनाए तो यह धन, प्रतिष्ठा और लाभ के अच्छे अवसर प्रदान करता है।




