मीन लग्न में सूर्य ग्रह ! जान लो, विशेष स्थिति, शुभ व अशुभ प्रभाव और महत्वपूर्ण फलादेश के साथ कुछ उपाय

मीन लग्न में सूर्य ग्रह

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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मीन लग्न के जातक, धार्मिक बुद्धि से ओतप्रोत, मेहमानों का आदर करने वाले, सामाजिकता के साथ चलने वाले, नियमों का पालन करने वाले होते है। ऐसे जातक आस्तिक और ईश्वर के प्रति बहुत विश्वास रखने वाले होते हैं।  सामान्य गुणों की बात करें तो, ये जातक, जल क्रीड़ा करने में कुशल, विनम्र, सुरतिवान, स्त्री- प्रिय, प्रचंड, श्रेष्ठ पंडित, चतुर अल्पभोजी, चंचल, धूर्त , श्रेष्ठ रत्नाभूषणों को धारण करने वाला, अनेक प्रकार की रचनाएं करने में कुशल होते हैं।   

स्वभाव की बात करें तो ऐसे जातक यशस्वी, सतोगुणी, आलसी, रोगी, अधिक संततिवान, बड़ी आँखों वाला तथा अकस्मात हानि उठाने वाले होते हैं | शरीर से सामान्य कद , ठोढ़ी, में गड्ढा होता है तथा मस्तिष्क अच्छी तरह से विकसित होता है। 

इन जातकों को अपने जीवन काल में अपनी प्रारंभिक अवस्था में सामान्य जीवन मध्यम अवस्था में दुख और अंतिम अवस्था में सुख मिलता है। इन्हें इनके भाग्य का साथ, 21 से 24 वर्ष की आयु में मिलता है। तो, आइये आज के इस ‘मंगल भवन’ के लेख  में हम आपको मीन लग्न में सूर्य ग्रह के विशेष प्रभाव और फलादेश की जानकारी विस्तार से देने जा रहे हैं। हमारे साथ लेख में अंत तक बने रहिए व् हमें अपने महत्वपूर्ण सुझाव जरूर दें।

इस लग्न के लग्न भाव में यदि सूर्य ग्रह की स्थिति है तो, सूर्य यहाँ उनकी मीन यानी (मित्र) राशि में होगा। इस राशि लग्न के वे छठे भाव का स्वामी, छठे भाव से आठवें होकर लग्न में विराजमान होंगे। परिणाम स्वरूप उस जातक को उसके पिता का श्रेष्ठ सुख मिलेगा व पिता समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति होगा। साथ ही, जातक को पिता की अतुल्य संपत्ति भी मिलेगी। सूर्य की ऐसी स्थिति में, जातक के शत्रु बहुत अधिक होंगे पर लग्न में होने से शत्रुओं पर विजय मिलेगी। ऐसे जातक बहुत परिश्रमी होगा व सुगठित देह का स्वामी होगा।

यहां, सूर्य की लग्नस्थ शुभ दृष्टि सप्तम भाव (कन्या राशि) पर होगी। जिससे जातक की वैवाहिक सुख श्रेष्ठता से मिलेगा। लेकिन, ऐसे जातक के उग्र स्वभाव के कारण दाम्पत्य जीवन में जीवनसाथी से टकराहट होगी।

यदि मीन लग्न में सूर्य ग्रह के प्रभाव होंगे तो, ऐसे जातक को सिरदर्द की बीमारी होगी, हाई ब्लड प्रेशर, मस्तिष्क की गर्मी रहेगी।

इस  लग्न में सूर्य की दशा व अंतर्दशा जातक के लिए मध्यम परिणाम देने वाली होगी। जहां जातक को उसके तेज स्वभाव से अशुभ और पिता पक्ष से शुभ व सकरात्मक प्रभाव मिलेंगे।

इस लग्न के लिए सूर्य की स्थिति मिले जुले परिणाम देने वाली होती है। क्योंकि, यहां सूर्य लग्न के लिए सूर्य छठे भाव का स्वामी होता है।कुंडली के इस छठे भाव को रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, प्रतिस्पर्धा, स्वास्थ्य परेशानी जैसी चीजों से सम्बन्धित बताया जाता है। 

इस कारण सूर्य इस लग्न के लिए इन सभी चीजों को प्रदान करने वाला ग्रह भी बन जाता है। लेकिन, इसके अलावा आशंका, पीड़ा, झूठ जैसी चीजें भी जीवन में आती है जिससे जातक को नकारात्मक प्रभावों का सामना करना पड़ता है।

लेकिन,लग्न का सूर्य जातक को अधिकार भी देता है, ऐसे जातक कुशल नेतृत्व और व्यापारी रविय्ये के होते हैं। वकालत करने के बहुत अच्छे गुण होते हैं। किसी भी अच्छे बुरे व्यसन से निपटने में ऐसे जातक कुशलता से भूमिका निभाते हैं। 

सूर्य के इस स्थान के स्वामित्व के प्रभाव से जातक में चीजों से लड़ने का साहस भी बहुत प्रबल होता है। सूर्य की दशा काल में सूर्य के प्रबल प्रभाव और अशुभ स्थिति ,में जातक को उपरोक्त विषयों से सम्बन्धित परिणाम मिलते हैं। लग्न में सूर्य के मजबूत होने पर जातक को जीवन में, बहुत सफलता मिलती है। 

इस लग्न में, सूर्य षष्ठ भाव का स्वामी होकर जातक के रोग, ऋण, शत्रु, अपमान, चिंता, आशंका, पीड़ा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी वणिक वृत्ति, साहूकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, कोई भी अच्छा बुरा व्यसन इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि करते हैं। जातक की जन्मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान और शुभ प्रभाव में होने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ परिणाम देखने को मिलते हैं। जबकि कमजोर और अशुभ प्रभाव में रहने से जातक को अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।

इस लग्न में सूर्य देव छठे भाव के स्वामी हैं। जो कि, रोग भाव के कारण वह कुंडली के रोगेश की भूमिका निभाते हैं। इसलिए वह एक मारक ग्रह माने जाते हैं। कुंडली के किसी भी भाव में स्थित सूर्य देव अपनी दशा व अंतर्दशा में जातक को कष्ट ही देते हैं। क्योंकि, वह इस लग्न कुंडली के अतिमारक ग्रह माने गए हैं। आये इनके कुछ मुख्य प्रभाव जान लेते हैं-

  1. कुंडली के छठे और बारहवें, भाव में स्थित सूर्य देव विपरीत राजयोग में आकर जातक को शुभ फल देते हैं। लेकिन, इसके लिए लग्नेश बृहस्पति का शुभ और बलि होना अनिवार्य है।
  2. आठवें भाव में सूर्य देव अपनी नीच राशि के कारण विपरीत राजयोग की स्थिति में नहीं होते हैं इसलिए प्रभाव में भी कमी आती है।
  3. कुंडली में सूर्य की अशुभता होने पर जातक को कभी भी बिना ज्योतिष की सलाह के माणिक इस लग्न रत्न नहीं पहनना चाहिए।
  4. कुंडली में सूर्य से सम्बन्धित उपाय करके व उचित दान कर इस ग्रह के मारकेत्व को कम किया जाता है।

इस  लग्न (Pisces Ascendant) की कुंडली में सूर्य छठे भाव (षष्ठम भाव) का स्वामी की भूमिका निभाते हैं। ज्योतिष शास्त्र में छठे भाव को रोग, ऋण और शत्रु का कारक होता है। इस कारण मीन लग्न में सूर्य को आमतौर पर एक अशुभ, मारक और रोगेश ग्रह की श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन इसकी स्थिति के अनुसार इसके प्रभाव जातक के लिए शुभ भी हो सकते हैं। 

  1. चूँकि,इस लग्न में सूर्य छठे भाव (कठिनाइयों का भाव) के स्वामी है, इसलिए इसकी महादशा या अंतर्दशा में जातक को बहुत संघर्ष या रोग देखने को मिलते हैं।
  2. (लग्न) पर नकारात्मक प्रभाव होने पर जातक को पाचन, आंखों की कमजोरी या हड्डियों से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
  3. यदि कुंडली में, सूर्य लग्न या सप्तम भाव में हो, तो वैवाहिक जीवन में कलह और जीवनसाथी के साथ वैचारिक मतभेद रहते है।
  4. कुंडली के आठवें या बारहवें भाव में सूर्य की स्थिति जातक के लिए अचानक धन हानि और अत्यधिक खर्च का कारण बनती है।
  5. इस लग्न में छठे भाव का स्वामी होने के कारण जातक को शत्रुओं, ऋण (कर्ज) और कानूनी विवादों में उलझा सकता है। 

लग्न में कुछ विशिष्ट स्थितियों और भावों में होने पर सूर्य मीन लग्न वालों के लिए लाभकारी और शुभ प्रभाव देते हैं- 

  1. यदि सूर्य कुंडली के छठे भाव में ही स्थित हो, तो यह ‘हर्ष योग’ जैसी स्थिति बनाता है, जिससे जातक को शत्रुओं पर विजय प्राप्त और प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफलता मिलती है।
  2. लग्न कुंडली दसवें भाव में सूर्य ‘दिग्बली’ होता है। जिससे सरकारी नौकरी, उच्च पद, राजनीति में सफलता और समाज में मान-सम्मान मिलता है।
  3. नौवें भाव में सूर्य जातक को धार्मिक प्रवृत्ति और पिता व भाग्य का सहयोग देने वाला होता है।
  4. ग्यारहवें भाव में सूर्य लक्ष्यों की प्राप्ति और धन-संपदा में वृद्धि का कारक बनता है।

इस लग्न के जातकों के लिए, धन प्रदाता ग्रह मंगल है। धनेश मंगल की शुभ स्थिति, धन स्थान से संबंध स्थापित करने वाले ग्रहों की स्थिति व धन स्थान पर पड़ने वाले ग्रहों के दृष्टि संबंध से जातक की आर्थिक स्थिति, आय के स्रोत वैभव-संपत्ति का पता चलता है। 

इसके अलावा, पंचमेश चंद्रमा, लग्नेश बृहस्पति व लाभेश शनि की अनुकूल स्थिति में भी मीन लग्न के जातकों के लिए धन व ऐश्वर्य की वृद्धि में सहायक होती हैं। वैसे मीन लग्न के लिए शनि, शुक्र, बुध और सूर्य अशुभ होते हैं। मंगल और चंद्र शुभ फलदायक होते हैं, अकेला गुरु राजयोग कारक होता है।

आत्मविश्वासी और आकर्षक, लेकिन स्वास्थ्य समस्याएं और जीवन में उतार-चढ़ाव का कारक।

धन और संपत्ति की प्राप्ति, लेकिन वाणी में कठोरता और परिवार के साथ संबंधों में तनाव की स्थिति।

मीन लग्न में सूर्य ग्रह

साहस और पराक्रम, भाई-बहनों के साथ अच्छे संबंध और पराक्रम शक्ति से सफलता का कारक।

परिवार और माता-पिता के साथ अच्छे संबंध, सुख और शांति और घर का वातावरण सुखद।

रचनात्मक और साहस का प्रतीक, संतान के साथ अच्छे संबंध और प्रेम संबंधों में सफलता।

स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं, लेकिन शत्रुओं पर विजय और आय\रोजगार में सफलता।

वैवाहिक जीवन में सफलता और समृद्धि, जीवनसाथी के साथ अच्छे संबंध और साझेदारी में सफलता।

जीवन में उतार-चढ़ाव की समस्या, अचानक घटनाओं का सामना और स्वास्थ्य समस्याएं।

धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में रुचि, पिता के साथ अच्छे संबंध और भाग्य में वृद्धि।

करियर में सफलता और समृद्धि , उच्च पद और प्रतिष्ठा की प्राप्ति और समाज में मान-सम्मान।

लक्ष्यों की प्राप्ति, मित्रों और संबंधियों का सहयोग और धन की वृद्धि।

आध्यात्मिक और धार्मिक गतिविधियों में रुचि, उच्च पद और प्रतिष्ठा की प्राप्ति, लेकिन जीवन में उतार-चढ़ाव और खर्च की अधिकता।

  1. सूर्य ग्रह को मजबूत करने के लिए “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र का जाप बहुत लाभकारी होता है। यह मंत्र सूर्य की ऊर्जा को शुद्ध करता है और आत्मविश्वास को बढ़ाता है।
  2. जल अर्पित करना सूर्य को प्रसन्न करने का एक अच्छा तरीका है। रोजाना सुबह सूर्योदय के समय तांबे के पात्र में जल भरकर उसे सूर्य को अर्पित करें। जिससे जीवन में सफलता मिलती है।
  3. सूर्य को प्रसन्न करने के लिए सोने और चांदी का दान करना विशेष रूप से लाभकारी होता है।
  4. रविवार को सूर्य के लिए उपवास रखना और पूजा करना सूर्य को प्रसन्न करने का एक प्रभावी उपाय है।
  5. सूर्य का प्रभाव न केवल ग्रहों की स्थिति पर, बल्कि आपके आंतरिक गुणों पर भी होता है। इसलिए अच्छे आचरण के साथ सक्रिय रहना, ईमानदारी और जिम्मेदारी से जीवन जीने से सूर्य की सकारात्मकता को बढ़ाया जा सकता है।

Q. मीन लग्न में सूर्य ग्रह की क्या विशेष स्थिति होती है?

An. इस  लग्न (Pisces Ascendant) की कुंडली में सूर्य छठे भाव (षष्ठम भाव) का स्वामी की भूमिका निभाते हैं। ज्योतिष शास्त्र में छठे भाव को रोग, ऋण और शत्रु का कारक होता है। इस कारण मीन लग्न में सूर्य को आमतौर पर एक अशुभ, मारक और रोगेश ग्रह की श्रेणी में रखा जाता है।

Q. मीन लग्न में, सूर्य ग्रह के शुभ प्रभाव क्या होते हैं?

An. इस लग्न में, यदि सूर्य कुंडली के छठे भाव में ही स्थित हो, तो यह ‘हर्ष योग’ जैसी स्थिति बनाता है, जिससे जातक को शत्रुओं पर विजय प्राप्त और प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफलता मिलती है। लग्न कुंडली दसवें भाव में सूर्य ‘दिग्बली’ होता है। जिससे सरकारी नौकरी, उच्च पद, राजनीति में सफलता और समाज में मान-सम्मान मिलता है।

Q. मीन लग्न के पांचवे भाव में सूर्य की स्थिति हो तो क्या होता है?

An. इस लग्न के पांचवे भाव सूर्य की स्थिति हो तो, जातक के लिए रचनात्मक और साहस का प्रतीक, संतान के साथ अच्छे संबंध और प्रेम संबंधों में सफलता देने के कारक होते हैं।

Q. मीन लग्न के लिए शुभ ग्रह कौन से हैं?

An. मीन लग्न के लिए शनि, शुक्र, बुध और सूर्य अशुभ होते हैं। मंगल और चंद्र शुभ फलदायक होते हैं, अकेला गुरु राजयोग कारक होता है।

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