लग्न में चन्द्र ग्रह के विशेष प्रभाव, स्थिति और कुछ आसान उपाय के साथ बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी!

लग्न में चन्द्र ग्रह

ज्योतिष शास्त्र की गणना की महत्वपूर्ण कड़ी होती है ग्रहों की स्थिति, भाव के अनुसार प्रभाव, ग्रहों की दशा\ महादशा प्रणाली और कुछ आसान उपायों से उनका निराकरण। इन्ही महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अनुभवी आचार्यों के द्वारा किसी जातक की राशि के अनुसार, भविष्यफल देखा जाता है। गणना के अनुसार मनुष्य के जीवन में 9 ग्रह और उनकी 9 महादशाएं भी होती हैं। 

वैदिक ज्योतिष कहता है कि, गणना के अनुसार चंद्र ग्रह की महादशा का समय दस वर्ष का होता है। चंद्रमा की महादशा का पुर्ण भोग्यकाल दस साल के समय अवधि का होता है। इसके साथ ही, अन्य ग्रहों की अंतरदशाएं भी आती हैं।  जिनका प्रभाव भी जातक के जीवन पर मिला-जुला होता है। तो, आइए आज के इस ‘मंगल भवन’ के लेख  में हम आपको लग्न में चन्द्र ग्रह के विशेष प्रभाव  और स्थिति के साथ उपाय की जरूरी जानकारी देंगे। 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्रमा की प्रकृति बहुत ही शीतल और शुभ मानी जाती है। किंतु विभिन्न लग्नों में चंद्रमा के प्रभाव और स्थिति अलग-अलग होती है। इसी, स्थिति पर ही निर्भर करता है, की ये प्रभाव शुभ और अशुभ दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। अलग-अलग लग्न में चंद्रमा का प्रभाव भी अलग होते हैं। ऐसे में, उनकी  दशा\महादशा के परिणाम के प्रभाव और फलादेश भी अलग होते हैं। आगे लेख में हम आपको लग्न में चन्द्र ग्रह की विशेष स्थिति के बारे में जानकारी देंगे-

                                                       लेख को पूरा पढ़ें-

ज्योतिष में, लग्नस्थ चंद्रमा पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, तो ऐसे जातक बलवान, निरोगी, धनी व सुखी होते है। और यदि पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो, ऐसे जातक को हीनता ग्रस्त, निराशावादी व अनेक दुःख भोगने वाले होते हैं।

राशियों के अनुसार, देखें तो, मेष, वृषभ,  कर्क राशि में, चन्द्र की स्थिति बलवान होती है। जिसके शुभ प्रभाव से ये जातक, सुंदर काया वाले होते हैं। मिथुन व कन्या राशि के लिए चन्द्र की स्थिति के प्रभाव होने पर वे अधिक बोलने की प्रवृत्ति यानी वाचाल होते हैं। सिंह व धनु राशि में चंद्रमा अहंकारी, जनप्रिय व घूमने-फिरने में रूचि लेने वाले होते हैं। 

तुला राशि के चन्द्र ग्रह के प्रभाव उन्हें संतुलित व्यक्तित्व के बनाते हैं। वृश्चिक राशि के लिए चंद्र उत्साही प्रवृत्ति और मकर राशि के लिए चंद्र निराशा जिनका प्रभाव देने वाली भूमिका में होते हैं। कुंभ राशि के लिए एस मन के कारक ग्रह के प्रभाव उन्हें, दोहरे व्यक्तित्व के बनाते हैं। 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, लग्नस्थ चन्द्र की स्थिति होने पर यह जातक को बहुत ही संवेदनशील, कल्पनाशील, सुंदर और सौम्य व्यक्तित्व के होते हैं। यदि यहां चन्द्र के शुभ प्रभाव हो तो, यह जातक को मानसिक सुख, आम लोगो से अलग व लोकप्रिय, मान-सम्मान व धनि होने के शुभ प्रभाव देते हैं। जबकि अशुभ या पीड़ित होने पर वे जातक को, मानसिक अस्थिरता, अज्ञात भय, कफ/मोटापे की समस्या और माता के स्वास्थ्य में परेशानियां देने का कारक होता है। 

वैसे तो, लग्न में चंद्रमा   शुभ माना जाता है। जिसके प्रभाव से जातक सुंदर, भावुक हृदय वाला, कोमल  व वैभव-संपदा से धनी होते हैं। ऐसे जातकों को सामाजिक कार्यों में बहुत रुचि होती है जिससे और समाज में सम्मान भी मिलता है।

जन्म कुंडली में, चंद्रमा के प्रभाव व शुभ फलों की प्राप्ति के लिए इस ग्रह का शुभ व मजबूत होना जरूरी है। लेकिन, यदि चंद्रमा हीन हो, अस्त हो, तो ऐसे जातक कृष्ण पक्ष नवमी से शुक्ल पक्ष षष्ठी तक व्यर्थ का भय डरपोक व दुर्बल महसूस करने वाले होते हैं। 

इसके अलावा, अकेला चंद्रमा क्षीण हो या उस पर कोई शुभ ग्रह की दृष्टि या प्रभाव न हो तो ऐसे जातक रोगी होते हैं। इन्हें अक्सर खांसी, जुकाम व वात रोग से सम्बन्धित बीमारियाँ होती रहती हैं। ऐसे जातक को जल से भय रहता है।

  1. चन्द्र के शुभ प्रभाव में जातक आकर्षक, कोमल हृदय, गोल चेहरा व सुन्दर काया के साथ सुखद जीवन व्यतीत करने वाले होते हैं।
  2. चन्द्र के मजबूत होने पर जातक मन से खुश, शांत और प्रसन्न रहने वाला होता है। उन्हें जीवन में सभी सुख-सुविधाएं मिलती हैं।
  3. बलि चन्द्र के प्रभाव से जातक धर्म-कर्म के मार्ग पर चलने वाला और दयालु प्रवृत्ति का होता है।
  4. चन्द्र के शुभ प्रभाव में जातक को, समाज में प्रसिद्धि और बहुत लोकप्रियता मिलती है।
  5. कुंडली में बलि और शुभ चन्द्र के प्रभाव से जातक रचनात्मक कार्यों में श्रेष्ठ व निपूर्ण होते है और कल्पनाशील होते हैं। 
  1. अशुभ चंद्र के अशुभ प्रभाव होने पर जातक, मन में अनिश्चितता, बेचैनी, तनाव, भय और अज्ञात घबराहट का शिकार रहते हैं।
  2. पीड़ित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को कफ, खांसी, सर्दी, दमा, मोटापा, या नेत्र सम्बन्धी रोग जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
  3. अशुभ चन्द्र के प्रभाव से जातक कभी-कभी अत्यधिक भावुक या डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं।
  4. चन्द्र के अशुभ प्रभाव से जातक अस्थिर मन, अनिश्चित निर्णय क्षमता और सही समय पर सही निर्णय लेने में असहाय होता है।
  5. यदि कुंडली में, चंद्रमा पीड़ित हो, तो माता के स्वास्थ्य में समस्या या उनसे वैचारिक मतभेद होने की समस्या होती है।

हमारे ‘मंगल भवन’ के ज्योतिष आचार्यों  का मानना है कि, जन्म कुंडली में चंद्रमा की स्थिति के आधार पर ही उनके प्रभाव शुभ या अशुभ दोनों ही प्रकार से प्राप्त होते हैं। शुभकारी चंद्रमा के प्रभाव उनकी दशा\महादशा काल के दौरान भी बेहद अच्छा व शुभ हो सकता है। जबकि, अशुभ चंद्रमा बेहद हानिकारक और अशुभ प्रभाव देने का कारक होता है। 

ज्योतिष शास्त्र में इस ग्रह को बेहद लाभदायक और शुभ कारी ग्रहों में से एक ग्रह की संज्ञा दी जाती है। क्योंकि, इनके शुभ प्रभाव और मजबूत होने पर जातक, कल्पनाशील और ज्ञानवान होने के साथ मानसिक रूप से भी बहुत शांत और स्थिर होता है। 

इसलिए, जीवन में सफलता पाने के लिए जन्म कुंडली में चंद्रमा का बहुत शक्तिशाली होना व शुभ प्रभाव में होना बहुत ही जरूरी है। इसके साथ ही, चन्द्रमा को लग्न भी माना जाता है, जिसे ‘चन्द्र लग्न’ कहा जाता है। अत: जन्म कुंडली में चंद्रमा का बली होना बहुत ही आवश्यक है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यदि चंद्रमा वृश्चिक राशि में कमजोर या शत्रु राशि में स्थित है, तो यह निश्चित रूप से नकारात्मक परिणाम देने का कारक होगा। इसके साथ ही, चंद्र का किसी पाप ग्रह जैसे शनि, मंगल, राहु, केतु और क्रूर ग्रह सूर्य से पीड़ित होने पर भी यह जातक के जीवन में समस्या देने का कारक होता है।

इसलिए कुंडली, में चन्द्र ग्रह दशा के फल को समझने के लिए अन्य ग्रहों की स्थिति को उचित रूप से समझना बहुत जरूरी है। नीच चंद्रमा की महादशा जातक को कई तरह से हानि, व अशुभ प्रभाव दे सकती है। यदि चन्द्रमा पाप ग्रह से पीड़ित हो और लग्नेश व पंचम भाव का पाप ग्रह से पीड़ित होने पर जातक को मानसिक असंतुलन जैसे पागलपन, सिज़ोफ्रेनिया और मिर्गी आदि जैसे विकार हो सकते हैं।

  1. लग्न ले पहले भाव में चन्द्र के प्रभाव होने पर जातक बलवान, ऐश्वर्यशाली, सुखी, व्यवसायी, गायन वाद्य प्रिय और स्थूल शरीर का होता है।
  2. दूसरे भाव में चंद्रमा हो तो ऐसे जातक मधुरभाषी, सुंदर, भोगी, परदेशवासी, सहनशील और बहुत ही शांत होते हैं।
  3. लग्न के तीसरे भाव में चन्द्र के प्रभाव होने पर जातक, पराक्रम से धन प्राप्त करने वाला, धार्मिक, यशस्वी, खुश मिजाज, आस्तिक और मीठा बोलने वाले होते हैं।
  4. लग्न के चौथे भाव में चन्द्र के प्रभाव होने पर जातक दानी स्वभाव, मानी, सुखी, उदार स्वभाव, रोग रहित, विवाह के पश्चात कन्या संततिवान, सदाचारी, सट्टे से धन कमाने वाला और क्षमाशील प्रवृत्ति का होता है।
  5. पांचवे भाव में चंद्र के प्रभाव होने पर जातक शुद्ध विचार वाला, बुद्धि, चंचल, सदाचारी, क्षमावान तथा शौकीन मिजाज का होता है।
  6. लग्न के छठे भाव में चन्द्र ग्रह के प्रभाव होने पर जातक कफ रोगी, नेत्र रोगी, अल्पायु, आसक्त, मित व्ययी होता है।
  7. सातवें, भाव में चंद्र ग्रह के प्रभाव होने पर जातक सभ्य, धैर्यवान, नेता, विचारक, प्रवासी, जल यात्रा करने वाला, अभिमानी, व्यापारी, वकील और स्फूर्तिवान होता है।
  8. लग्न के आठवें भाव में चंद्रमा के प्रभाव होने से जातक विकारग्रस्त, कामी, व्यापार से लाभ वाला, वाचाल, स्वाभिमानी, बंधन से दुखी होने वाला और ईर्ष्यालु होता है।
  9. नौंवे भाव में चंद्रमा के होने से जातक संततिवान, संपत्तिवान, धर्मात्मा, कार्यशील, प्रवास प्रिय, न्यायप्रिय , विद्वान और साहसी होता है।
  10. दसवें भाव में चंद्रमा के होने से जातक कार्यकुशल, दयालु, निर्मल बुद्धि, व्यापारी, यशस्वी, संतोषी और दूसरों का भला सोचने वाले होते हैं।
  11. लग्न के ग्यारहवें भाव में चंद्रमा होने से जातक चंचल बुद्धि, गुणी, संतति और संपत्ति से युक्त, यशस्वी, दीर्घायु, विदेश में रहने वाला और राज्य कार्य में श्रेष्ठ होता है।
  12. लग्न के बारहवें भाव में चंद्रमा होने से जातक नेत्र रोग से ग्रसित, कफ रोग, क्रोध, एकांत प्रिय, चिंतनशील, मृदुभाषी और अधिक व्यय करने वाला होता है।
लग्न में चन्द्र ग्रह

जन्म कुंडली में, प्रत्येक ग्रह का विशेष महत्व और प्रभाव होता है। उसी प्रकार चन्द्र के शुभ प्रभाव के लिए भी यहां हमने आपको कुछ विशेष उपाय बताए हैं, जो इस प्रकार हैं-  

  1. चन्द्र शिव जी के मस्तक पर विराजमान है, इसलिए सोमवार को विशेष रूप से शिवजी की पूजा करें, शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाएं और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
  2. सोमवार के दिन, को दूध, चावल, चीनी, सफेद कपड़े, या चांदी का दान करने से चन्द्र ग्रह मजबूत होता है।
  3. प्रतिदिन, अपनी माता के चरण स्पर्श करें, आशीर्वाद लें और उन्हें खुश रखें। इससे चंद्रमा के शुभ फल मिलते हैं।
  4. ज्योतिष में, बाएं हाथ की कनिष्ठा उंगली में चांदी की अंगूठी (मोती के साथ या बिना) या गले में चांदी की चेन पहनने से चन्द्र ग्रह मजबूत होता है।
  5. मानसिक शांति के लिए ध्यान (Meditation) करें और पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। शुभ प्रभाव के लिए विशेष रूप से पूर्णिमा व्रत  करें।
  6. चन्द्र के बीज मंत्र ‘ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः’ का नियमित रूप से जाप करें।
  7. चन्द्र से शुभ फलों की प्राप्ति के लिए, पानी या दूध का मुफ्त वितरण करें। इसके अलावा, घर में चांदी के बर्तनों का प्रयोग करें।

Q. चन्द्र ग्रह को महत्वपूर्ण ग्रह क्यों माना गया है?

An. चंद्रमा की प्रकृति बहुत ही शीतल और शुभ मानी जाती है। किंतु विभिन्न लग्नों में चंद्रमा के प्रभाव और स्थिति अलग-अलग होती है।  इस ग्रह को बेहद लाभदायक और शुभ कारी ग्रहों में से एक ग्रह की संज्ञा दी जाती है। क्योंकि, इनके शुभ प्रभाव और मजबूत होने पर जातक, कल्पनाशील और ज्ञानवान होने के साथ मानसिक रूप से भी बहुत शांत और स्थिर होता है।

Q. लग्न में चन्द्र ग्रह के क्या प्रभाव होते हैं?

An. लग्नस्थ चन्द्र की स्थिति होने पर यह जातक को बहुत ही संवेदनशील, कल्पनाशील, सुंदर और सौम्य व्यक्तित्व के होते हैं। यदि यहां चन्द्र के शुभ प्रभाव हो तो, यह जातक को मानसिक सुख, आम लोगो से अलग व लोकप्रिय, मान-सम्मान व धनि होने के शुभ प्रभाव देते हैं।

Q. लग्न में चंद्र ग्रह के लिए क्या विशेष उपाय करना चाहिए?

An. चन्द्र शिव जी के मस्तक पर विराजमान है, इसलिए सोमवार को विशेष रूप से शिवजी की पूजा करें, शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाएं और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

Q. लग्न में चन्द्र के अशुभ होने पर क्या होता है?

An. लग्न में, चंद्र के अशुभ प्रभाव होने पर जातक, मन में अनिश्चितता, बेचैनी, तनाव, भय और अज्ञात घबराहट का सीकर रहते हैं। अशुभ या पीड़ित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को कफ, खांसी, सर्दी, दमा, मोटापा, या नेत्र सम्बन्धी रोग जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

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