कुम्भ लग्न में सूर्य ग्रह की मारक स्थिति ! लग्नेश शनि के शत्रु ग्रह की भूमिका में प्रभाव, फलादेश और जरूरी सुझाव |

कुम्भ लग्न में सूर्य ग्रह

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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंभ लग्न पर शनि देव का आधिपत्य होता है। इस राशि को स्थिर व वायु तत्व प्रधान राशि माना गया है। इस राशि के जातकों का विशेष गुण होता है कि, ऐसे जातक मिलनसार, स्पष्टवादी निस्वार्थ भाव से सेवा करने में उद्धत रहते है। साथ ही, वे नए-नए मित्र बनाने व उनसे स्थायी संबंध बनाने में भी श्रेष्ठ व्यवहार का परिचय देते हैं। 

दूसरों की बातों को ध्यान से सुनना इनकी एक अच्छे श्रोता होने की विशेष पहचान है। अपने परिवार का विशेष ध्यान तो रखते ही हैं, साथ ही अपने दोस्तों का भी बहुत ख्याल रखते हैं। इनका स्वभाव बहुत ही विनम्र व कृतज्ञ होने से किसी मित्र या संबंधी द्वारा किए गए उपकार को ये कभी नहीं भूलते हैं। 

लेकिन, किसी अन्य के द्वारा किया गया इनके साथ कपट पूर्ण व्यवहार को भी ये जीवन भर भुला नहीं पाते हैं। ये जातक अपने साथ, किसी बुरे व्यवहार का प्रतिशोध लेने से भी नहीं हिचकिचाते है। कुंभ लग्न के जातकों में अनुसंधानात्मक व प्रतिबंधात्मक योग्यता का भी एक विशेष गुण होता है। 

ज्योतिष शास्त्र की विशेष गणना के अनुसार, इस लग्न (Aquarius Ascendant) में सूर्य ग्रह सप्तम भाव का स्वामी होकर एक प्रबल मारक ग्रह की भूमिका में होते हैं। चूँकि, सूर्य लग्नेश शनि के परम शत्रु है, इसलिए यह कुंडली के किसी भी भाव में होने पर कष्टकारी फल देते हैं। लेकिन, इन जातकों का विवाह के बाद भाग्योदय, उच्च सरकारी पद या व्यापार में लाभ होने के योग बनते हैं। ग्रहों के योग से इनके, यह वैवाहिक जीवन में कलह या विलंब होने के भी योग रहते है। 

इस लग्न में सूर्य सप्तमेश स्वामी होने से अशुभ फल दाता गृह माने जाएंगे। इसके अलावा, सूर्य लग्नेश शनि का शत्रु ग्रह भी है, इसलिए, द्वितीय मारकेश होने के प्रभाव भी देंगे। जब, सूर्य इस लग्न के प्रथम स्थान में होगा तो, यह सूर्य पितृ कारक होकर पितृ स्थान से कोण में व स्वयं के भाव (सिंह राशि) से सातवें व नौवें भाव का फल को प्रभावित करेंगे।

इस प्रभाव में जातक कुछ चिड-चिडे होते हैं, और उन्हें जल्दी गुस्सा आ जाता है। इन जातकों को पिता की अच्छी संपत्ति सुख मिलता है। विदेश जाने पर ये जातक बहुत सफलता, नाम व प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं। यदि व्यापार\ व्यवसाय में साझेदारी करते हैं तो, भी इन्हें कार्यों में बहुत सफलता मिलती है। लेकिन, इनके जीवन में सफलता संघर्ष के बिना नहीं मिलेगी।

इस लग्न कुण्डली में, लग्नस्थ सूर्य की दृष्टि सप्तम भाव यानी अपने ही घर (सिंह राशि) पर होगी। इसके परिणाम स्वरूप जातक का भाग्योदय विवाह के बाद होगा।

 लग्न में सूर्य ग्रह से प्रभावित जातक, मध्यम कद, गोलाकार मुख और आकर्षक चेहरे वाला होगा। ऐसे जातक की संतानें जातक से अलग व दूर रहेंगी।

लग्न में सूर्य की दशा अंतर्दशा में जातक को धन सम्बन्धी और आर्थिक मजबूती मिलती है।

लेकिन, पारिवारिक कलह की सथियों का सामना करना पड़ता है। यानि, सूर्य की ये अवधि जातक के लिए, मिश्रित फल दायक होती है। लग्न में सूर्य के प्रभाव के मुख्य बिंदु इस प्रकार है।

लग्न में, सातवें भाव (वैवाहिक जीवन और साझेदारी) के स्वामी होने के कारण, सूर्य जातक के स्वास्थ्य और दांपत्य जीवन के लिए मारक प्रभाव देने का कार्य करते हैं।

इस लग्न में, सूर्य और शनि के शत्रुता पूर्ण संबंध होने के कारण जातक को सामान्यतः अशुभ परिणाम देते हैं। लेकिन, जब सूर्य की स्थिति कुंडली में प्रबल न हो तो, सूर्य देव का रत्न माणिक कभी भी धारण नहीं करना चाहिए।

लग्न कुंडली में, यदि सूर्य केंद्र भाव (पहले, चौथे, सातवें, या दसवें) या त्रिकोण (पांचवें, नौवें) भाव में स्थित हो, तो वह शुभ ग्रहों के प्रभाव में होकर राजयोग का निर्माण करता है। ऐसे जातक बहुत ही, प्रभावशाली व्यक्तित्व के होते हैं और दूसरों के बीच बहुत ही प्रशंसा प्राप्त करते हैं। यदि सूर्य सिंह राशि (सातवें) या मित्र राशि में हो, तो जातक को ससुराल पक्ष से लाभ, धनी जीवनसाथी और मान-प्रतिष्ठा मिलती है।

यदि कुंडली के किसी भाव में सूर्य के साथ राहु का मेल या युति हो तो, ऐसे जातक अक्सर सरकारी नौकरी में बाधा या व्यापार में संघर्ष का सामना करते हैं।

यदि सूर्य के साथ मंगल की स्थिति हो तो, ऐसे जातक के विवाह में देरी, राहु हो तो अलगाव, और केतु की स्थिति हो तो, गृहस्थ सुख में कमी जैसे अशुभ प्रभाव मिल सकते हैं।

सूर्य के साथ गुरु बृहस्पति के होने से जातक का विवाह के बाद जबरदस्त भाग्योदय होता है। 

ज्योतिष में सूर्य को देवता की उपाधि दी गई है, जिसके प्रकाश से, समस्त विश्व प्रकाशित होता है। सूर्य इस लग्न के सातवें  भाव के स्वामी होकर जातक के लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मृत्यु मैथुन, चोरी, झगड़ा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है। लग्न कुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान और शुभ प्रभाव में होने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फल प्राप्त होते हैं, लेकिन, जबकि कमजोर और अशुभ प्रभाव में होने पर जातक को अशुभ फल प्राप्त होते हैं।

  • जीवनसाथी का साहसी, उच्च परिवार से और प्रभावशाली।
  • विवाह के बाद भाग्योदय और धन लाभ की प्रबल संभावना।
  • सूर्य यदि केंद्र या त्रिकोण में हो, तो सरकारी क्षेत्र से लाभ और मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति।
  • लग्न के तृतीय स्थान (मेष-उच्च) में सूर्य-बुध या सूर्य-मंगल की युति जातक को महान पराक्रमी और धनवान बनाती है। 
  • इस लग्न में, सूर्य के सातवें भाव के स्वामी होने से, यह जातक के लिए मारक प्रभावशाली होते हैं।
  • जीवनसाथी के साथ वैवाहिक सुख में कमी, अहंकार के कारण अनबन या अलगाव।
  • सिरदर्द, हृदय रोग, या उच्च रक्तचाप की समस्या।
  • पिता के साथ वैचारिक मतभेद या स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं।

इस लग्न में जन्म लेने वाले जातकों  के लिए धन प्रदाता ग्रह गुरु बृहस्पति है। जिससे इस लग्न में धनेश बृहस्पति की शुभ स्थिति, धन स्थान से संबंध जोड़ने वाले ग्रहों की स्थिति और धन स्थान पर पड़ने वाले ग्रहों के दृष्टि संबंध से जातक की आर्थिक स्थिति, आय और धन-संपदा के स्रोत के बारे जानकारी मिलती है। 

इसके अतिरिक्त, पंचमेश बुध भाग्येश शुक्र व लग्नेश शनि की अनुकूल स्थितियां भी कुंभ लग्न वाले जातकों के लिए धन और ऐश्वर्य में, वृद्धि करने में सहायक होती हैं। वैसे कुंभ लग्न के लिए गुरु, चंद्रमा व मंगल अशुभ है। शुक्र शुभ फलदायक है, गुरु मारकेश होकर भी पूरी तरह मारक प्रभाव नहीं देते हैं। सूर्य सप्तमेश और लग्नेश का शत्रु होने के कारण मारकेश का काम करेगा।

कुम्भ लग्न में सूर्य ग्रह

हमारे ‘मंगल भवन’ के वरिष्ठ आचार्यों के अनुसार, कुंभ लग्न में सूर्य की स्थिति सप्तमेश (मारक) होकर शनि का शत्रु होने से अशुभ फलदायक होती है। इसलिए, इसे मजबूत करने के लिए यहां हमने कुछ उपाय बताए हैं जो इस प्रकार है-

  1. प्रतिदिन सुबह सूर्य को जल चढ़ाएं, तांबे के लोटे में रोली और लाल फूल मिलाकर अर्घ्य सूर्य को प्रबल करने का विशेष उपाय है।
  2. सूर्य के मंत्र “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का प्रतिदिन 108 बार जाप करें।
  3. रविवार के दिन गाय को गुड़ खिलाएं और जरूरतमंदों को गेहूं और गुड़ का दान करें।
  4. पिता और बुजुर्गों का सम्मान करें।
  5. हमेशा सत्य बोले और आचरण को पवित्र रखें।

कुल-मिलाकर कुम्भ लग्न में सूर्य ग्रह सातवें भाव (सिंह राशि) का स्वामी होकर केंद्र का अधिपति होने की भूमिका में होते हैं। लेकिन. लग्नेश शनि ग्रह से शत्रुता होने के के कारण यह मुख्यतः मारक (अशुभ) परिणाम ही देते हैं । यदि, लग्न कुंडली में, सूर्य बलवान स्थिति में हो तो, जातक को राज्य कृपा, यश और धनी ससुराल का लाभ मिलता है, जबकि कमजोर या अशुभ स्थिति में अहंकार, स्वास्थ्य समस्याओं, वैवाहिक जीवन में कलह और पिता से मतभेद के अशुभ परिणाम मिलते हैं।

Q. कुम्भ लग्न में सूर्य ग्रह की क्या विशेष स्थिति होती है?

An. इस लग्न (Aquarius Ascendant) में सूर्य ग्रह सप्तम भाव का स्वामी होकर एक प्रबल मारक ग्रह की भूमिका में होते हैं। चूँकि, सूर्य लग्नेश शनि के परम शत्रु है, इसलिए यह कुंडली के किसी भी भाव में होने पर कष्टकारी फल देते हैं।

Q. कुम्भ लग्न के लिए शुभ ग्रह कौन से हैं?

An. इस लग्न के लिए पंचमेश बुध भाग्येश शुक्र व लग्नेश शनि की अनुकूल स्थितियां भी कुंभ लग्न वाले जातकों के लिए धन और ऐश्वर्य में, वृद्धि करने में सहायक होती हैं। वैसे कुंभ लग्न के लिए गुरु, चंद्रमा व मंगल अशुभ है। शुक्र शुभ फलदायक है, गुरु मारकेश होकर भी पूरी तरह मारक प्रभाव नहीं देते हैं। सूर्य सप्तमेश और लग्नेश का शत्रु होने के कारण मारकेश का काम करेगा।

Q. कुम्भ लग्न के लिए सूर्य के अशुभ प्रभाव में क्या होता है?

An. इस लग्न में, सूर्य के सातवें भाव के स्वामी होने से, यह जातक के लिए मारक प्रभावशाली होते हैं। जीवनसाथी के साथ वैवाहिक सुख में कमी, अहंकार के कारण अनबन या अलगाव।

Q. कुम्भ लग्न में सूर्य ग्रह के होने से कौन सी युति व योग बनते है?

An. लग्न कुंडली में, यदि सूर्य केंद्र भाव (पहले, चौथे, सातवें, या दसवें) या त्रिकोण (पांचवें, नौवें) भाव में स्थित हो, तो वह शुभ ग्रहों के प्रभाव में होकर राजयोग का निर्माण करता है। ऐसे जातक बहुत ही, प्रभावशाली व्यक्तित्व के होते हैं और दूसरों के बीच बहुत ही प्रशंसा प्राप्त करते हैं।

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