कर्क लग्न में मंगल ग्रह का प्रभाव!, लग्न का निर्धारण, मारक/ कारक, उसकी शुभ/अशुभ स्थिति

कर्क लग्न में मंगल ग्रह

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ज्योतिष शास्त्र में क्रांतिवृत्त फल कथन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके बारहवें हिस्से को राशि कहा जाता है। जिसके द्वारा प्रत्येक राशि अपने गुण धर्मों के कारण जानी एवं पहचानी जाती है। इस राशिचक्र के बारह भागों में प्रत्येक भाग को 30 अंश समान रूप से प्राप्त होता है। आकाश मंडल में स्थित भचक्र अपने सम्पूर्ण अंशात्मक मान के कारण बारह खण्ड़ों एवं 27 नक्षत्रों के समूह से निर्मित होता है। जिससे सम्पूर्ण क्रांतिवृत्त  का मान 360 अंश के रूप में स्थापित हो जाता है। इसी कारण क्रांतिवृत्त में मेष से लेकर मीन पर्यन्त बारह राशियां क्रमिक रूप से आती रहती है। प्रत्येक राशि अपने गुण धर्माें के कारण जातक एवं जातिकाओं को सकारात्मक और नकारात्मक परिणामों को देती है।

अतः मंगल भवन के इस लेख में आचार्य अंकुश कर्क लग्न में मंगल ग्रह के कुछ खास प्रभाव, कारक, मारक आदि और उसके फल कथन के संदर्भ में सारगर्भित तथा विस्तृत लेख को प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस विशेष जानकारी के लिए आप हमारी इस प्रस्तुति को अंत तक जरूर पढ़े। आपके बहुमूल्य सुझावों को हम सादर आमंत्रित करते हैं। 

भारतीय वैदिक ज्योतिष शास्त्र में व्यक्ति के नामराशि का निर्धारण किस प्रकार से होता है? यह प्रश्न सर्वधारण के मन एवं विचारों मे उठता रहता है। कि आखिर क्या होती है नाम राशि और जन्म राशि..? यानी जन्म के समय चन्द्रमा जिस भी नक्षत्र में होता है। उसी के अनुसार राशि का निर्धारण होता है। जैसे किसी बालक एवं बालिका के जन्म के समय रोहिणी नक्षत्र विद्यमान था तो, उसकी वृषभ राशि होगी। किन्तु पश्चिमी जगत् में सूर्य के अनुसार राशि का निर्धारण करने की प्रथा प्रचलित है। जो कि अत्यंत स्थूल मानी जाती है। क्योंकि श्री सूर्य का भचक्र लगभग एक महीने का होता है। प्रत्येक राशि का स्वामी और उस राशि पर ग्रहों का प्रभाव दृष्टि संबंध आदि फल कथन के लिए बहुत ही प्रभावी एवं जरूरी उपकरण मे शामिल हैं। कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा माना जाता है। इसी प्रकार प्रत्येक राशि के स्वामी ग्रह अलग-अलग होते हैं।

ज्योषिशास्त्र के अनुसार जब भचक्र के अनुसार किसी जातक एवं जातिका का जन्म जब इस धरती में होता है तो, उस समय में पूर्वी क्षितिज में जो राशि इस बालक एवं बालिका के जन्म के समय आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित हो रही होती है। वही उसकी लग्न होती है। यानी बालक एवं बालिका के जन्म के समय आकाश मण्ड़ल में कौन से ग्रह एवं नक्षत्र विद्यमान थें? तथा जन्म के वक्त कौन सी लग्न उदित हो रही थी यह निर्धारण उस समय एवं नक्षत्रों तथा ग्रहों के स्थिति के अनुसार हो पाता है। इस प्रकार से यह ज्ञात करने के लिए वैदिक ज्योतिष में 12 प्रकार के चिन्हों को स्थापित किया गया है। जिसे लग्नों के रूप में मान्यता प्राप्त हैं। लग्न शरीर एवं आत्म तत्व को प्रकट करता है।

इस लग्न में जन्म लेने वाले जातको के शारीरिक संरचना एवं उनके शरीर तथा स्वभाव के संदर्भ में यदि देखें तो यह शारीरिक रूप से मजबूत और अधिकांशतः छोटे  कद काठी के होते है। यानी अपनी देह की बनावट के कारण यह मज़बूत  दिखाई देते है। किन्तु बचपन में कमजोर तथा दुबले एवं पतले प्रतीत होते रहते हैं। इनका चेहरा गोल बना हुआ रहता है। हालांकि  यह देखने में ऐसे प्रतीत होते है। मानों इन्हें भय बना हुआ हैं। हालांकि यह धीर एवं गम्भीर रहते हुए दुनियांदारी को देखते रहते है। और अपने अलगे कदम को सार्थक करने की योजना बनाते हुए नज़र आते है। इसीलिए इन्हें कई बार नकल करने वाला कहा जाता है। क्योंकि यह बुद्धिमान एवं बलवान होते हैं। इनका रंग फीका और गेंहुआ तथा भूरा रंग होता हैं। कंधे मूजबूत और चैड़े होते है। यह सीधे नहीं चलते है। यानी यह कुछ झुककर अपनी शारीरिक बनावट के अनुसार चलते है।

इस लग्न में जन्म लेने वाले जातकों के स्वभावगत बातें बड़ी अच्छी होती है। यह सौम्य रहते है। यदि कोई नहीं छेड़े तो, यह अक्सर अपने काम से काम रखने वाले होते है। यदि कोई इन्हें छेड़ता एवं परेशान करता है तो, उसे छोड़ते नहीं है, कही न कहीं जब इन्हें मौका मिलता है तो, उसे उसकी भाषा में जवाब देते है। यह पुषर्थ करने वाले ईमानदार, नेता एवं अभिनय एवं फिल्म कला संगीत की दुनियां में महारथ हासिल करने वाले होते हैं। धीर तथा गम्भीर और सृजनात्मक कामों में इनकी रूचि बनी हुई रहती है। नये अवसरों को अनुसार अपने कामों को बढ़ाने और उससे लाभांश अर्जित करने के यह बाजीगर होते है। यानी जिस प्रकार इन्हें नया वातावरण मिल जाता है। उसी के अनुसार अपने को ढ़ालते रहते है। जब तक इन्हें पसंद है। यानी मन एवं विचारों में जब इन्हें यह एहसास होने लगता है। कि वातावरण इनके विपरीत जा रहा है। तो यह वहाॅ रहना पंसद नहीं करते हैं। न्याय प्रिय और अपने परिश्रम के द्वारा धन संचय करने में लगे हुए रहते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी एवं खानपान प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों मे वांछित लक्ष्यों को अर्जित करने में लगे हुए रहते हैं।

यह एक आदर्श जीवन साथी साबित होते है। जो इन्हें धोखा देता है। उसे भी यही धोखा देना पसंद करते है। किन्तु जो इनके साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाता उसके साथ यह पूरी ईमानदारी के साथ मिलने के प्रयास में रहते हैं। हालांकि कई बार यह मूड़ी और हठी स्वभाव के होते है। अगर इनका मन नहीं किया तो यह किसी की बात को मानने के लिए तैयार नहीं होते है। चाहे वह कोई भी कहे, यदि इन्हें इस बात का एहसाास हो गया कि, उनके सम्मान को खराब करने के लिए उनसे कार्य कराया जा रहा है तो, वह उस कार्य एवं आदेश को कतई मानने को तैयार नहीं होते हैं। हालांकि कई बार यह न्याय एवं धैर्य पूर्वक किसी कार्य करने में विश्वास करते हैं। तेज गति से चलने वाले और कुशाग्र बुद्धि वाले होते है। किन्तु विपरीत लिंग के प्रति इनकी कामुकता अधिक बढ़ी हुई रहती है। इन्हें अक्सर सर्दी जुकाम, और श्वसन तंत्र के रोग एवं मौसम के बदलाव के कारण शारीरिक बीमारियां बनी हुई रहती हैं।

वैदिक ज्योषिशास्त्र में मंगल और सूर्य एक दूसरे के मित्र हैं। जो इस संसार का अनवरत् रूप से कल्याण करते चलें आ रहे हैं। मंगल अपनी ताकत एवं अत्यंत ऊर्जा से युक्त होने के कारण शरीर में स्फूर्ति देने वाला कहा जाता है। यह नवग्रह मण्ड़ल में सेनाध्यक्ष की पदवी से युक्त माना जाता है। इसे युद्ध कौशल में निपुण एवं वीर पराक्रमी, साहसी, तथा निडर, कहा जाता है। यह अपने स्वाभाविक गुणों के कारण अति शीघ्र उत्तेजित होने वाला तथा जल्द ही युद्ध के लिए शंखनाद करने वाला माना जाता है। यह क्रोध से भरा हुआ तथा ज्वलनशील पदार्थों एवं मादक पदार्थों से जुड़ा हुआ माना जाता है। वाद एवं विवाद में तत्पर रहने वाला। इसे अग्नि एवं भूमि, भवन तथा लघु भ्राता से जोड़कर देखा जाता है। इसे सर्जरी करने वाला डाक्टर, मकैनिकल फील्ड़ दुर्घटना, चोट एवं घाव तथा आक्रामकता के गुणों से युक्त माना गया है। यह शासन एवं प्रशासन में पुलिस, सेनापति एवं अस्थिर बुद्धिवाला कहा जाता है। मजदूर वर्ग का मुखिया और उन्हें अनुशासित करने वाला माना गया है। मंगल तम्बाकू, तथा अस्त्र एवं शस्त्रों एवं बारूदी सुरंग एवं बारूद निर्माण और औजारों के निर्माण से जुड़ा हुआ माना गया है। वैदिक ज्योातिष शास्त्र में इसे अशुभ एवं पाप ग्रह की संज्ञा प्राप्त है। जब किसी जातक एवं जातिका की कुण्ड़ली में इसकी उग्रता एवं अशुभ प्रभाव प्रकट होते है। तो व्यक्ति का जीवन तहस नहस होने लगता है। वह व्यवहारों में चिड़चिड़ा तथा उग्र होने लगता है। छोटी-छोटी बातों में गुस्सा करना आम बात उसके लिए हो जाती है। वैवाहिक जीवन के भावों से मंगल का अशुभ प्रभाव तो हर कोई जानता है। यानी उसके बहुत ही अशुभ परिणाम मिलते हैं। 

कर्क लग्न के स्वामी चन्द्रमा होते है। जो कि सौम्यता एवं सुन्दरता तथा शीतलता को प्रकट करते है। यह सौम्य एवं पापी दोनों ही श्रेणियों में आते है। इस लग्न के स्वामी स्त्री ग्रह में शामिल है। इनका जल तत्व है। किन्तु मंगल एक बलवान तथा पुरूष ग्रह है। जो पराक्रमी और सेनापति है। किसी कार्य को करवा लेने की क्षमता इनमें बहुत खूब मौजूद रहती है। मंगल ग्रह की चन्द्रमा के साथ नैसर्गिक मित्रता है। हालांकि  मंगल इस राशि में नीच का हो जाता है। यहाॅ लग्नगत स्थित मंगल जातक को कई मोर्चे  पर नकारात्मक परिणामों को देने वाला रहता है। क्योकि मंगल कू्रर ग्रह है तो, क्षीण चन्द्रमा पाप ग्रह में शामिल है। इसलिए जातक कई बार उग्र एवं चिड़चिड़ा होने लगता है। किन्तु यहाॅ सबसे सकारात्मक बात यह है कि, मंगल चन्द्रमा का योग तथा युति जातक के लिए सुयोग कारक मानी जाती है। इस कर्क लग्न में मंगल पंचमेश एवं दशमेश है। जिससे यह शुभ एवं योग कारक हो जाता है। मंगल इस लग्न में स्वयं ही योग कारक सिद्ध हो जाता है। यानी ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल को कर्क लग्न में योग कारक ग्रह की श्रेणी में शामिल किया गया है। क्योंकि यह पंचमेश और दशमेश होन के कारण मंगल को इस लग्न में योग कारक माना जाता है। हालांकि इससे उत्पन्न होने वाले अन्य दोष एवं योगों को भी जान लेना चाहिए। 

यहाॅ मंगल यदि लग्नगत है तो, वह प्रथम भाव में होने पर चैथे तथा सातवें और आठवें स्थानों को अपनी दृष्टि से देखेगा। यदि मंगल चतुर्थ स्थान में है, तो भी वह दारा भाव, कर्म भाव और लाभ भाव को देखेगा। जिससे मुनष्यों को वैवाहिक जीवन में कई तरह के कष्ट एवं दुःख मिलते हुए रहते हैं। जिससे उसे शारीरिक चोट एवं घाव तथा पीड़ा आदि होने के आसार बन जाते हैं। हालांकि यहाॅ इस बात का पूरा ध्यान देना चाहिए कि, मंगल किस स्थिति में वहाॅ है? वहाॅ जिस भी भावगत बैठा है, वहाॅ उसका संबंध किसी नीच ग्रह, पीड़ित ग्रह और अशुभ ग्रह के साथ कोई संबंध तो नहीं बन रहे है। या फिर वह ग्रह जो मंगल से संबंध स्थापित कर रहा है, वह बली या पीड़ित है। या फिर पाप या अशुभ ग्रहों से दृष्ट एवं युत है। इन सभी पहलुओं को समुचित अघ्ययन के करने बाद ही कोई स्पष्ट फलादेश मिल सकता है। यानी मंगल की स्थिति को जानना और उसके अशुभ एवं शुभ प्रभाव को समझना लेना अत्यंत आवश्यक बना हुआ रहता है।

मंगल यदि शुभ ग्रहों से संबंध बना रहा हो तथा उनसे युत एवं दृष्ट हो तो, वह बालक एवं बालिकाओं को शुभ तथा सकारात्मक परिणामों की सौगात देने वाला कहा जाता है। जिससे इसकी दशा एवं अंतरदशा में जातकों को कई तरह के शुभ परिणाम मिलेगे। जैसे कार्य क्षेत्रों में पदोन्नति और सम्मान व्यापारिक उन्नति एवं पारिवारिक प्रतिष्ठा तथा संतान सुख के योग बन जाते हैं। व्यक्ति जीवन सुखहाल बना हुआ रहता है।हालांकि  अशुभ एवं पाप ग्रहों के साथ संबंध तथा योग एवं युति होने के कारण शुभ परिणामों का सतत् आभाव बना हुआ रहता है। दशा एवं अंतरदशा के शुभ एवं अशुभ परिणाम मंगल की कुण्ड़ली में स्थिति के अनुसार ही ज्ञात होता है। कर्क लग्न के लिए मंगल को कारक ग्रह माना जाता है। जिससे यह ज्ञात होता है कि, मंगल यहाॅ शुभ स्थिति में हैं, तो निश्चित तौर पर यह शुभ एवं सकारात्मक परिणामों को लेकर आयेगा।  

इस लग्न के लिए शनि एवं सूर्य मारकेश की भूमिका में रहेगे। यानी इस लग्न में जब इन ग्रहों की दशा आयेगी तो, इन ग्रहों की कुण्ड़ली में किस प्रकार की स्थिति है उसी के अनुसार शुभ एवं अशुभ स्थिति के अनुसार इन्हें शुभ और अशुभ फल मिलते हैं। इस लग्न के जातकों को इनकी शुभता एवं अशुभता की स्थिति के अनुसार ही रोग पीड़ाएं दुःखादि होते रहते हैं। कई बार अचानक चोट, तबियत का खराब होना और मृत्यु भय आदि भी ग्रहों की स्थिति के अनुसार उत्पन्न होने के आसार बन जाते है। इस राशि के लिए हालांकि मंगल पंचमेश एवं दशमेश होने के कारण अशुभ श्रेणी में नहीं आता है।

मंगल कर्क लग्न के लिए यद्यपि कारक ग्रह की श्रेणी में शामिल है। हालांकि यह बात अलग है कि, मंगल जब इस लग्न में होता है तो, वह नीचगत होने के कारण कुछ नकारात्मक प्रभावों को देने वाला हो जाता है। यह जातकों की कुण्ड़ली में लग्नगत पाप ग्रह से आक्रांत हो शत्रु ग्रहों के साथ किसी प्रकार से संबंध स्थापित कर रहा हो तो, निश्चित तौर पर इसकी शुभता में कमी आ जाती है। ऐसे में कुण्ड़ली की समीक्षा करने के बाद ही मंगल की अशुभता का पैरा मीटर निकल सकता है। 

इस लग्न के स्वामी चन्द्रमा ग्रह हैं, जिन्हें नवग्रह मण्ड़ल में राज पदवी प्राप्त है। यह माता का कारक कहा जाता है। ज्योषित में चन्द्रमा को मन से जोड़ कर देखा जाता है। यह मन को नियंत्रित करने वाले प्रमुख अधिष्ठाता ग्रह देवता हैं। वहीं मंगल पराक्रम से मंगल को जोड़ा जाता है। मंगल को युवराज कहा जाता है। किन्तु इस लग्न के लिए मंगल पंचमेश तथा दशमेश के स्वामी होते है। यहाॅ मंगल योग कारक होने के कारण जातकों को शुभ तथा सकारात्मक परिणामों को देने वाला माना जाता है। हालांकि जो ज्योतिष के नियम हैं, उनके अनुसार कुण्ड़ली का विश्लेषण करवाने के बाद ही यह निष्कर्ष निकल सकता है। कि वह अमुक जातक एवं जातिका के लिए इस प्रकार के परिणामों को अधिक देगा। जैसे शुभ एवं अशुभ परिणाम।

मंगल का प्रभाव बुद्धि भाव से होने के कारण व्यक्ति को सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों पर बड़ी कामयाबी मिलती है। यहाॅ व्यक्ति आई. आई. टी. इंजीनियरिंग तथा अच्छे मित्रों से युक्त रहता है। कार्य क्षेत्र में विशेष सफलता एवं पदोन्नति मिलती है। यदि मंगल कर्मभाव गत स्थिति हो तो और शुभ ग्रहीय प्रभाव से च्युत न हो तो निश्चित तौर पर आजीविका के क्षेत्रों बड़ा सफलता मिलता है। वह राजा के समान होता है।

इस लग्न के लिए मंगल शुभ तथा कारक ग्रहों की श्रेणी में शामिल होने के कारण शुभ प्रभावों को बढ़ाने वाला रहता है। हालांकि ज्योतिष के सिद्धान्तों के अनुसार कुण्ड़ली की समीक्षा करने के पश्चात् अंतिम निर्णय निकल सकता है।

इस लग्न में मंगल पुत्र भाव के स्वामी यदि लग्नेश चन्द्रमा से यदि युति तथा दृष्टि संबंध बना रहा हो तो, जातक को संतान सुख तथा आई. आई. टी. इंजीनियरिंग आदि के क्षेत्रों में महारथ हासिल होती है। तथा सेना नायक या फिर कोई बड़ा अधिकारी होता है।

इस लग्न में मंगल व्यक्ति को सफल रानैतिक एवं कुशल वक्ता की श्रेणी में लाने वाला रहता है। वह विद्वान एवं श्रेष्ठ बन जाता है।

इस लग्न में मंगल व्यक्ति को समाज में मान प्रतिष्ठा एवं अच्छे वाहन का लाभ देने वाला रहता है।

इस लग्न का स्वामी चन्द्रमा ग्रह है, जो जल तत्त्व है, तथा इसे स्त्री ग्रह की संज्ञा प्राप्त है। इसे सौम्य एवं पाप दोनों तरह की संज्ञाएं प्राप्त है। यह सत गुणी माना जाता है। किन्तु इस लग्न में विद्यमान मंगल ग्रह अग्नि तत्व एवं कू्रर ग्रह है, इस कर्क राशि में मंगल नीच का माना जाता है। जिससे मंगल के शुभ प्रभावों को कमजोर करने वाला हो जाता है। हालांकि मंगल कारक होने के कारण शुभ परिणामों को देने वाला ही रहता है। मंगल त्रिकोण का स्वामी होने के कारण यदि लग्न में लगनस्थ  है। यह योग कारक माना जाता है।

इस लग्न में विद्यमान मंगल जातक के सेहत को कमजोर करने वाला होता है। तथा शरीर में दर्द एवं पीड़ाओं को दे सकता है।

1- कर्क लग्न की कुण्ड़ली में यदि मंगल पहले, चैथे, सप्तम, अष्टम और बारहवें भाव में विद्यमान हो तो, यह मांगलिक दोष को उत्पन्न करने वाला होता है।

2- इस लग्न में मंगल पंचम एवं दशम भाव का स्वामी है। यदि मंगल लग्न एवं केन्द्र स्थानों से संबंध बना रहा हो तो, यह राजयोग देने वाला हो जाता है।

3- मंगल और चन्द्रमा की युति लक्ष्मी योग को निर्मित करने वाली होती है। यानी मंगल शुभ परिणामों को देने वाला होता है।

4- कर्क लग्न के स्वामी चन्द्रमा और लनस्थ मंगल जो पंचम और दशम भाव के स्वामी है। वही चन्द्रमा केन्द्र भाव के स्वामी हैं। जब मंगल केन्द्र स्थानों में स्वराशिगत उच्च राशि गत हो तो मंगल से रूचक नामक योग बनाता है।

5- कर्क राशि का मंगल नीच राशि में होता है। कर्क से सातवीं मकर राशि उसकी उच्च राशि है। यानी मंगल मकर के 28 अंश में परम उच्च का होता है। तथा कर्क के इतने ही अंशों में परम नीच का हो जाता है।

कर्क लग्न में मंगल ग्रह

1- इस लग्न के लिए लग्न स्वामी चन्द्रमा है। यहाॅ मंगल पंचम एवं दशम भावों का स्वामी है। जो योग कारक माना जाता है। यहां मंगल दोष से मुक्त कहा गया है।

2- शुक्र केन्द्र तथा आय भाव का स्वामी होने के कारण दोष युक्त अकारक होता है। हालांकि फल कथन में इसकी शुभता एवं अशुभता का ध्यान रखते हुए अंतिम निर्णय लेना चाहिए।

हालांकि मंगल को इस लग्न के लिए योग कारण माना गया है। किन्तु यहाॅ मंगल यदि अपने मित्र क्षेत्र एवं शुभ ग्रहों से योग तथा संबंध स्थापित कर रहा है तो, जातक एवं जातिकाओं को राजसी सुख सुवधिाओं को देने वाला होता है।

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यदि कुण्ड़ली में मंगल का विश्लेषण करने के पश्चात् यह ज्ञात हो कि, मंगल अशुभ परिणाम दे रहा है तो, आपको कुछ सरल एवं उपयोगी उपायों को करना चाहिए।

1- श्री बजरंज बाण या फिर सुन्दरकाण्ड़ का पाठ करें, या करवायें।

2- लाल या सफेद गाय की सेवा करें। उसे हरी घास खिलाएं। श्री मारूति यंत्र को स्थापित कर उसकी प्रतिदिन धूप और कपूर जलाकर आरती एवं पूजा करें।

3- श्री भौमाय नमः मंत्र का जाप प्रतिदिन 108 बार जरूर करें।

4- लाल वस्तुओं का दान करें।

5- मन्दिर में लाल कालीन को दान दें।

6-  मंगला गौरी का व्रत रखें।

7- घर एवं परिवार में छोटे भाई के साथ समाजस्य स्थापित करें। ध्यान रखें बिना ज्योतिषीय परामर्श के कोई अगूंठी एवं कड़ा तथा रत्न आदि न धारण करें।

8- मांगलिक दोष के निवारण हेतु मंगल ग्रह का वैदिक मंत्रों के साथ अनुष्ठान एवं घट विवाह आदि विधि विधान से करवायें।

निष्कर्षः  मंगल भवन के इस कर्क लग्न के लेख से जो ज्योतिषीय निष्कर्ष आ रहा है। वह बता रहा है कि, मंगल इस लग्न के लिए योग कारक है। यदि वह पाप पीड़ित है। तो इसके शुभ प्रभावों को खराब या फिर कमजोर कर सकता है।

Q. कर्क लग्न में मंगल ग्रह शुभ होता है या अशुभ?

An.  कर्क लग्न में मंगल पंचम और दशम भाव का स्वामी होने के कारण योगकारक ग्रह बनता है। हालांकि नीच राशि में होने से इसके कुछ अशुभ प्रभाव भी दिखाई दे सकते हैं।

Q. कर्क लग्न में मंगल नीच का क्यों होता है?

An.  कर्क राशि जल तत्व की और चन्द्रमा की राशि है, जबकि मंगल अग्नि तत्व का ग्रह है। इस विरोधी प्रकृति के कारण मंगल यहाँ नीच का माना जाता है।

Q. कर्क लग्न वालों के लिए मंगल कौन से भावों का स्वामी है?

An.  मंगल कर्क लग्न में पंचम (संतान, बुद्धि) और दशम (करियर, कर्म) भाव का स्वामी होता है, इसलिए इसे योगकारक ग्रह माना जाता है।

Q. कर्क लग्न में मंगल के अशुभ प्रभाव क्या हो सकते हैं?

An. अशुभ स्थिति में मंगल क्रोध, स्वास्थ्य समस्याएं, वैवाहिक जीवन में तनाव और दुर्घटना की संभावना बढ़ा सकता है।

Q. कर्क लग्न में मंगल के शुभ प्रभाव क्या होते हैं?

An.  शुभ स्थिति में मंगल व्यक्ति को साहसी, सफल, उच्च पद प्राप्त करने वाला और राजनैतिक या तकनीकी क्षेत्र में सफल बनाता है।

Q. कर्क लग्न में मंगल के लिए कौन से उपाय करने चाहिए?

An.  मंगल दोष के लिए हनुमान जी की पूजा, बजरंग बाण पाठ, लाल वस्त्र दान, “ॐ भौमाय नमः” मंत्र जाप और गौ सेवा लाभकारी माने जाते हैं।

Q. क्या कर्क लग्न में मंगल मांगलिक दोष बनाता है?

An.  हाँ, यदि मंगल 1, 4, 7, 8 या 12वें भाव में हो तो मांगलिक दोष बन सकता है, जिसका प्रभाव वैवाहिक जीवन पर पड़ता है।

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