क्या आप जानते हैं, ग्रहों की महादशा और अंतर्दशा के बारे में? तो जान लीजिए, ग्रहों के गोचर के साथ, ग्रहों की महादशा व अंतर्दशा के बारे में भी!

ग्रहों की महादशा और अंतर्दशा

जिस प्रकार, जीवन को चलाने के लिए वातावरण जरूरी है! उसी प्रकार वातावरण को चलाने के भी कुछ नियम होते हैं! सौर मंडल भी ग्रहों के आधार पर चलता है! ज्योतिष शास्त्र राशियों के साथ कुंडली में उपस्थित बारह भावों की जानकारी देता है! हमने हमारे ‘मंगल भवन’ के पिछले लेख में आपको ग्रहों के गोचर के बारे में बताया! अब आगे हम लेख में आपको ग्रहों की महादशा व अंतर्दशा  के बारे बताएँगे! तो लेख में दी गई जानकारी जरुर पढ़े और अपनी प्रतिक्रिया देना न भूले- 

ज्योतिष शास्त्र में, ग्रहों की दशाओं को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है! यानी यदि किसी जातक के जन्म से लेकर मृत्यु तक की गणना करना हो तो, ग्रहों,महादशाओं के गणना में नक्षत्रों पर आधारित दशा और पद्धतियाँ एक सबसे अधिक लोकप्रिय माध्यम है! ज्योतिष में, चंद्रमा जिस नक्षत्र में उस दिन उपस्थित होते हैं, वह उस दिन का नक्षत्र कहलाता है व उस नक्षत्र का जो स्वामी ग्रह कहा गया है, उसकी महादशा जन्म के समय मान्य होती है! उसके बाद क्रम अनुसार प्रत्येक नक्षत्र या ग्रह की महादशा जीवन में आती रहती है! आइये जानें, ज्योतिष में ग्रहों की दशाओं का कैसे विभाजित किया गया है?- 

ग्रहों की दशाओं और उनकी समय अवधि को इस प्रकार विभाजित किया गया है-

  • महादशा- ग्रहों के अनुसार एक समय तक प्रभावशाली होती है!  
  • अंतर्दशा- अंतर्दशा का प्रभाव अधिक से अधिक 3 वर्ष 4 माह तक रहता है।
  • प्रत्यंतर दशा- 6 महीनों तक प्रभाव देती है! 
  • सूक्ष्म दशा- सूक्ष्म दशा का प्रभाव कुछ दिनों तक रहता है!
  • प्राण दशा- कुछ घंटों का फलकथन करने में लाभकारी होती हैं।

यह एक ज्योतिष घटना है! ग्रहों की दशा अपनी अवधि में सदैव एक सा फल नहीं देती। दशा में अंतर्दशा, प्रत्यंतर दशा, सूक्ष्म दशा, प्राण दशा और गोचर की स्थिति के अनुसार प्रभाव में परिवर्तन आते रहते हैं! यदि सभी स्थितियां शुभ होती है तो, उस समय जातक को उनके फल भी बहुत उत्तम और शुभ मिलते हैं! लेकिन, यदि कुछ स्थिति शुभ और कुछ अशुभ हो तो, फल भी मिश्रित मिलेगा! यदि ग्रहों की स्थिति, जातक के लिए शुभ है तो दशा की कुल अवधि में जातक को औसत फल शुभ ही मिलेगा!

ज्योतिष में, अंतर्दशा, प्रत्यंतर दशा, सूक्ष्म दशा, और प्राण दशा ग्रहों की महादशा के और भी भागो में बताई गई है! जो किसी जातक के जीवन में विभिन्न समयों पर होने वाली घटनाओं और प्रभावों की जानकारी देती है! इन दशाओं के फल अलग-अलग ग्रहों के स्वभाव और दूसरे ग्रहों से संबंध पर निर्भर होता है!  

  1. यह महादशा का एक छोटा हिस्सा है, जो एक निश्चित अवधि तक चलती है।
  2. प्रत्येक अंतर्दशा का स्वामी एक ग्रह होता है, और इस ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर पड़ता है।
  3. अंतर्दशा के दौरान, व्यक्ति के जीवन में विभिन्न प्रकार की घटनाएं हो सकती हैं, जैसे कि वित्तीय लाभ, वैवाहिक जीवन, स्वास्थ्य, और शिक्षा आदि। 

यह प्रत्यंतर दशा, अंतर्दशा का एक छोटा रूप है! प्रत्यंतर दशा का स्वामी भी एक स्वामी ग्रह होता है, और यह ग्रह भी अंतर्दशा के स्वामी ग्रह के प्रभाव में होता है। प्रत्यंतर दशा के दौरान, जातक के जीवन में छोटी- घटनाएं और परिवर्तन होते हैं, जो अंतर्दशा के मुख्य प्रभावों को और भी स्पष्ट करते हैं। 

ये सूक्ष्म दशा, प्रत्यंतर दशा से भी छोटा रूप है! सूक्ष्म दशा के दौरान, जातक के जीवन में बहुत ही छोटी और सूक्ष्म घटनाएं होती हैं। सूक्ष्म दशा का प्रभाव उनके स्वामी गृह के प्रभाव पर निर्भर करता है!

प्राण दशा, का प्रभाव सूक्ष्म दशा से भी छोटी समय अवधि के लिए होता है! यह दशा जातक के जीवन में छोटी- छोटी घटनाओं को दर्शाती है। प्राण दशा का स्वामी ग्रह भी होता है, जो सूक्ष्म दशा के स्वामी ग्रह के प्रभाव देने के कारक हैं! 

ज्योतिष में, दशाओं के फल अलग-अलग ग्रहों के स्वभाव और उनके दूसरे ग्रहों के साथ संबंध पर निर्भर हैं। जैसे- इस प्रकार समझे-

  • सूर्य की अंतर्दशा में, सूर्य की प्रत्यंतर दशा जातक के जीवन में, वाद-विवाद, आर्थिक कठिनाइयाँ, वैवाहिक समस्याएं और सिर में दर्द सम्बन्धी परेशानियाँ देती है! 
  • शनि की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा अशुभ प्रभाव के फल प्रदान करती है, क्योंकि शनि और सूर्य को एक-दूसरे का परम शत्रु माना जाता है! 
  • गुरु की अंतर्दशा में गुरु की ही प्रत्यंतर दशा होती है तो, यह जातक के जीवन में सकारात्मक प्रभाव लाती है! लेकिन कुंडली में गुरु मजबूत अवस्था में होना चाहिए! 

ज्योतिष शास्त्र में, ग्रहों की महादशा और अंतर्दशा की एक निश्चित अवधि तय की गई है! इस निर्धारित समय अवधि के अनुसार, प्रत्येक ग्रह को 3 नक्षत्र में बांट दिया गया है! इसलिए नक्षत्रों की संख्या 27 हो जाती है, जो ग्रहों की संख्या नौ है! किसी भी नक्षत्र में ग्रह की महादशा चंद्रमा की नियुक्ति के आधार पर होती है! यानी जातक के जन्म के समय नक्षत्र कुछ ग्रहों की महादशा का निर्धारण करते हैं। और किसी नक्षत्र में दशा की अवधि भी चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर करती है। यदि जातक के जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में प्रवेश करता है, तो आपको उस विशेष नक्षत्र के शासक ग्रह की महादशा प्राप्त होगी! इसी प्रकार, यदि चंद्रमा पहले से ही किसी नक्षत्र से हो कर गुजरता है, तो कुछ नक्षत्रों में चंद्रमा की केवल कुछ अंश ही रहता है! यानी आपको उस विशेष नक्षत्र के शासक ग्रह के महादशा की बहुत ही कम अवधि मिलेगी! यहाँ हमने ग्रहों के नक्षत्रों के साथ निर्धारित समय अवधि का सार बनाया है, जो इस प्रकार है-

ग्रहों की महादशा और अंतर्दशा
क्रमांकग्रहमहादशा का समय \वर्षनक्षत्र की स्थिति 
1.सूर्य ग्रह 6 वर्षक्रतिका, उत्तरा फाल्गुनी, उतरा आषाढ़ 
2.चंद्र ग्रह 10 वर्षरोहिणी, हस्त, श्रवण 
3.मंगल ग्रह 07 वर्षमृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा 
4.राहु ग्रह 18 वर्षआर्द्रा, स्वाती, शतभिषा 
5.गुरु बृहस्पति ग्रह 16 वर्षपुनर्वसु, विशाखा, पूर्व भाद्रपद 
6.शनि ग्रह 19 वर्षपुष्य, अनुराधा, उत्तराभाद्रपद 
7.बुध ग्रह 17 वर्षआश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती 
8.केतु ग्रह 07 वर्षमघा, मूल, अश्विनी 
9.शुक्र ग्रह 20 वर्षपूर्वा फाल्गुनी, पूर्वा आषाढ़, भरणी 

ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की दशा और महादशा एक बहुत महत्वपूर्ण घटना है! इन दशाओं का अध्ययन करके, हम जातक को उनके भावी समय की जानकारी दे सकते हैं! साथ ही, वह सही समय पर उसके उपाय भी कर सकता है! एसा करने से आप किसी बड़े नकारात्मक प्रभाव से बच सकते हैं!  इसलिए घटनाओं की जानकारी होना बहुत जरूरी है! 

Q. ग्रहों की दशा और अंतर्दशा क्या होती है?

An. यह एक ज्योतिष घटना है! ग्रहों की दशा अपनी अवधि में सदैव एक सा फल नहीं देती। दशा में अंतर्दशा, प्रत्यंतर दशा, सूक्ष्म दशा, प्राण दशा और गोचर की स्थिति के अनुसार प्रभाव में परिवर्तन आते रहते हैं! यदि सभी स्थितियां शुभ होती है तो, उस समय जातक को उनके फल भी बहुत उत्तम और शुभ मिलते हैं!

Q. सूर्य की महादशा कितने समय की होती है?

An. सूर्य की महादशा 6 साल की होती है!

Q. क्या ग्रहों के गोचर और महादशा में, अंतर होता है?

An. ज्योतिष शास्त्र में, ग्रहों की दशाओं को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है! यानी यदि किसी जातक के जन्म से लेकर मृत्यु तक की गणना करना हो तो, ग्रहों,महादशाओं के गणना में नक्षत्रों पर आधारित दशा और पद्धतियाँ एक सबसे अधिक लोकप्रिय माध्यम है! ज्योतिष में, चंद्रमा जिस नक्षत्र में उस दिन उपस्थित होते हैं, वह उस दिन का नक्षत्र कहलाता है व उस नक्षत्र का जो स्वामी ग्रह कहा गया है, उसकी महादशा जन्म के समय मान्य होती है!

Q. शनि की महादशा में कौन से नक्षत्र हैं?

An. शनि की महादशा में, पुष्य, अनुराधा, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में हैं!

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