शनि ग्रह का ऐसा संयोजन नहीं पता होगा आपको, क्या फल है अन्य ग्रहों के साथ व क्या करना है उपाय?

शनि के शुभ प्रभाव

कई बार हमें समझ नहीं आता है, कि, जीवन में क्यों इतने कष्ट आ रहे हैं। इनका एक विशेष कारण होता है।

 कुंडली में नव ग्रहों का गोचर  हर राशि को प्रभावित करता है। लेकिन, कुंडली के कुछ भाव (घर) ऐसे होते हैं, 

जहां उनका विशेष शुभ प्रभाव होता है। तो आज के इस ‘मंगल भवन’ के लेख  में हम आपको शनि ग्रह और उनसे शुभ प्रभावित कुंडली के विशेष भावों की जानकारी देंगे। इसके अलावा, कर्मदाता कहें जाने ग्रह का अन्य ग्रहों के साथ प्रभाव कैसा है यह भी विस्तार से जानेंगे। कुछ ऐसी राशियां जो शनि को बहुत प्रिय है उन राशियों के साथ अन्य राशियों के लिए उपाय क्या है? यह जानकारी भी है…..

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, शनिदेव को क्रूर ग्रह की संज्ञा दी जाती है। ऐसा उनके लिए इसलिए कहा जाता है कि, वे जातकों को उनके कर्मों के अनुरूप फल देते हैं। इसके अलावा उन्हें, पापी ग्रह भी मानते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि शनि से आपको केवल अशुभ फल ही नहीं मिलते। शनिदेव तो कर्म के अनुसार फल देते हैं। उनका मुख्य कार्य कर्मों के आधार पर न्याय देना है। इसके अलावा, शनि शुभ और अशुभ दोनों ही प्रकार के फल देते हैं। 

ज्योतिष में, शनिदेव का संबंध शुभ ग्रहों से हो, तो यह जातक के लिए भाग्योदय का कारक होता है। यही शनि अगर लग्न अथवा त्रिकोण में तुला, धनु, मकर, कुंभ या मीन राशि में हो तो ऐसे जातक राजा या शासक के समतुल्य पद प्राप्त करते हैं। ऐसे जातक अपने जीवन में एक राजा या शासक के समान मान-सम्मान और सभी प्रकार के भौतिक सुख-सुविधाओं का सुख भोगते है। आइए, आगे लेख में हम कुंडली के ऐसे विशेष भावों के बारे में जानेंगे, जहां कर्मफल दाता शनि शुभ फलदायी हैं।

यदि कुंडली के पहले भाव यानी लग्न भाव में, शनि देव विराजमान हों तो, ऐसा जातक बहुत धनी होता है। अगर लग्न में शनि स्थित है और यह तुला, मकर  या कुंभ लग्न हो, तो ऐसे जातक राजा की सभी सुख-सुविधाओं और मान-सम्मान प्राप्त करते हैं। इसके साथ ही ऐसे जातकों को देश या किसी विशेष स्थान का आधिपत्य का सौभाग्य भी मिलता है। लग्न भाव में saturn यदि स्वराशि या उच्च राशि में हो तो जातक राजा की भांति सम्पन्न और बहुत विद्वान होता है।

छठे भाव में शनि ग्रह विराजमान हो तो, ऐसे जातक कभी किसी शत्रुओं से भय नहीं होता है। कोई भी बड़े से बड़ा भंयकर युद्ध भी क्यों न हो ऐसे जातक की हमेशा जीत होती है। इसके साथ ही ऐसे जातक महा दानी की प्रवृत्ति के होते हैं। वे अपने, बंधु और मित्रों का सहयोग करने वाले धनी स्वभाव के होते हैं। इसके साथ ही, वे अधिक भोजन करने वाले और कामुक स्वभाव के होते हैं। 

यदि कुंडली के ग्यारहवें भाव में, शनि किसी शुभ ग्रह के साथ हो तो, यह जातक को धनवान, दीर्घायु, शूर वीर और स्थिर बुद्धि का वरदान है। ऐसे जातक कभी किसी लम्भी बीमारी की समस्या से पीड़ित नहीं होते हैं।

हालांकि, ऐसे जातक को संतान सुख की कमी हो सकती है। इसके अलावा, ग्यारहवें भाव का शनि जातक को दीर्घायु और धनवान बनाता है। वैसे तो, इस भाव में saturn संतान के लिए अनुकूल परिणाम नहीं देते हैं। लेकिन, जातक को सभी गुणों से युक्त बनाते हैं।

ज्योतिष में शनि जिस राशि में हो, वें जातक को अनुशासन, कर्म, जिम्मेदारी, विलंब और अनेक समस्याओं को देने वाले होते हैं। जब यह अन्य ग्रहों के साथ युति में होते हैं तो, तो इसका प्रभाव अन्य ग्रहों की ऊर्जा को बदल देता है।  जिससे अक्सर जीवन में महत्वपूर्ण सबक के साथ कुछ अच्छे तो कुछ बुरे फल मिलते हैं। तो आइए जानें कि जब शनि अन्य ग्रहों के साथ होते हैं तो, क्या प्रभाव देते हैं।

जब शनि ग्रह सूर्य ग्रह के साथ युति करते हैं तो, यह जातक को आत्म-अभिव्यक्ति के साथ समस्याएं देने वाली होती है। क्योंकि, सूर्य अहंकार, अधिकार और आत्मसम्मान का कारक है और शनि अनुशासन और प्रतिबंधों का प्रतीक है। जिससे जातक को आत्मविश्वास और पहचान के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। हालांकि, यदि यहां ग्रहों की शुभ स्थिति हो तो, जातक एक बेहद ज़िम्मेदार और मेहनती बनता है जो दृढ़ता से सफलता हासिल करता है।

ज्योतिष में चन्द्रमा मन, भावनाओं और माता का कारक है। जबकि शनि अलगाव और क्रूरता लाता है। तो इन ग्रहों की युति से जातक को भावनात्मक दमन, अकेलापन और जीवन के प्रति गंभीर दृष्टिकोण मिलता है। लेकिन, यह युति जातक को भावनात्मक परिपक्वता, धैर्य और समस्या के समाधान खोजने की बेहतरीन क्षमता देती है।

कुंडली में मंगल ऊर्जा, जुनून और क्रोध की क्रियाशीलता का कारक कहलाता है, जबकि शनि अनुशासन और देरी का प्रतीक है। तो शनि का मंगल ग्रह के साथ होना जातक के जीवन में धक्का-मुक्की वाला प्रभाव देती है। यानी मंगल ग्रह का प्रभाव, कार्य करना चाहता है, लेकिन शनि ग्रह का प्रभाव उस कार्य को होने से रोकता है। जिससे जातक एक दृढ़ निश्चयी और धैर्यशील व्यक्ति बनता है। जो दृढ़ता से सफलता को प्राप्त करता है। 

ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह संचार, बुद्धि और तर्क का कारक है। लेकिन, शनि संरचना और गंभीरता के कारक ग्रह है। इसलिए यह युति जातक की विश्लेषणात्मक क्षमताओं का विकास करती है। जिससे जातक एक गहन विचारक, रणनीतिकार और महान दार्शनिक बनता है। हालांकि, युति में शनि का प्रभाव होने से यह धीमी गति से सीखने और विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने में कठिनाई का भी सूचक हो सकता है।

गुरु बृहस्पति को विस्तार और शुभ फलदायी माना जाता है, जबकि शनि का एक संकुचित और जटिल गतिशीलता का कारक है। इस युति के प्रभाव से जातक को आशावाद और यथार्थवाद के बीच के अंतर का पता चलता है। जिससे जातक व्यावहारिक और बुद्धिमान बनता है। ऐसे जातकों को सफलता देर से मिलती है। लेकिन अनुशासन और दृढ़ता के साथ होने से कार्यों को स्थिरता प्राप्त होती है।

ज्योतिष में शुक्र प्रेम, सौंदर्य और भोग-विलासिता का प्रतिनिधित्व करता है। जबकि शनि प्रतिबंधों और कर्म के अनुसार फल कारक है। यानी इस युति के प्रभाव से जातक को मुश्किलें, विवाह में देरी या भावनात्मक अलगाव का जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन, यह रिश्तों में जिम्मेदारी और वफादारी के भाव को भी बढ़ावा देता है। 

राहु को कुंडली में छाया ग्रह माना जाता है। यह जिस चीज़ को भी छूता है, उसे दोगुना कर देता है, और शनि के साथ युति होने पर, यह महत्वाकांक्षा में वृद्धि का कारक बनता है। जिससे जातक में अत्यधिक कर्म-प्रेरित होने का भाव आता है। यह युति सफलता, अधिकार और भौतिक संसाधनों के प्रति जातक में रूचि पैदा कर सकती है। 

ज्योतिष में केतु ग्रह वैराग्य, आध्यात्मिकता और पूर्वजन्म के कर्मों का प्रतिनिधित्व करता है। केतु जब शनि के साथ युति में होता है तो, यह जातक में अत्यधिक अनुशासित गुण का प्रभाव देता है लेकिन साथ ही ऐसा जातक आंतरिक रूप से सांसारिक मोह से विमुख रहता है। यह युति जातक के आध्यात्मिक विकास के लिए एक शुभ योग है।  लेकिन यह अलगाव, कर्म संघर्ष और सत्य की गहनता का बोध कराता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि को मकर और कुंभ राशि का स्वामित्व प्राप्त है। इसलिए ये राशियां शनि की सबसे प्रिय राशियां मानी जाती हैं। जिन पर शनि की विशेष कृपा रहती है। इसके अलावा, वृषभ और तुला राशि शनि की मित्र राशियां हैं, जिनमें शनि उच्च के होते हैं। इन राशियों को भी शनि से अच्छे फल प्राप्त होते हैं। आइये विस्तार से जाने अन्य राशियों पर शुभ प्रभाव – 

मकर राशि के स्वामी स्वयं शनिदेव हैं, इसलिए इस राशि के वे अत्यंत शुभ फलदायी होते हैं।  एस राशि के जातकों पर शनि की सीधी कृपा रहती है। उन्हें अपने जीवन में मेहनत के बाद अपार सफलता मिलती है। 

कुंभ राशि शनि की स्वराशि है, जिससे इस राशि पर उनकी विशेष कृपा रहती है। कुंभ राशि के लिए शनिदेव की कृपा से करियर में स्थिरता, धन लाभ और कार्यों में सफलता देने वाली होती है। लेकिन मेहनत बहुत करनी पड़ती है।  साथ ही, स्वास्थ्य व रिश्तों पर भी अधिक ध्यान देना होगा।  विशेष रूप से साढ़ेसाती के अंतिम चरण में सतर्क रहने की आवश्यकता है। 

शनि के शुभ प्रभाव

वृषभ राशि के स्वामी शुक्र ग्रह हैं, और शुक्र को ज्योतिष में शनि का मित्र ग्रह मन गया है। इस कारण शनि देव वृषभ राशि के जातकों को करियर में बहुत सफलता और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

तुला राशि में, शनि उच्च स्थान के होते हैं और शुक्र के साथ मित्रतापूर्ण संबंध रखते हैं। इसलिए, इस राशि के जातकों के लिए भी शनि के प्रभाव उनके व्यवसाय और करियर में सफलता देने वाला होता है।

ग्रह शनि को मजबूत करने के लिए हमारे ‘मंगल भवन’ के वरिष्ठ आचार्यों ने ये आसान उपाय बताए हैं। जो कि इस प्रकार हैं-

  1. शनि की विशेष कृपा दृष्टि के लिए आप शनिवार को काले तिल, उड़द की दाल, सरसों का तेल और काले चने का दान करें। 
  2. शनि को मजबूत करने के लिए अनाथ आश्रम और वृद्धाश्रम में दान करें और जरूरतमंदों की सेवा करें। गरीबों की सेवा से शनि प्रसन्न होते हैं।
  3. शनी देव को प्रसन्न करने हेतु सदैव कौवे और काले कुत्ते को रोटी खिलाएं।
  4. शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा करें और शनि चालीसा या शनि स्तोत्र का पाठ करें।  साथ ही, शनि मंत्र ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ और ‘ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः‘ का जाप करें। जिससे शनिदेव की कृपा मिलती है। 
  5. आप शनिदेव के साथ भगवान शिव और संकट मोचन हनुमान जी की आराधना भी कर सकते हैं। 
  6. शनि देव के शुभ फलों के लिए, अमावस्या पर पीपल के पेड़ पर मीठा जल चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं। 
  7. शनि देव अनुशासन प्रिय ग्रह है, इसलिए आलस्य से बचें, ईमानदार रहें, और एक अनुशासित दिनचर्या का पालन करने से वे प्रसन्न होते हैं।
  8. झूठ बोलने से बचें, इससे शनि अशुभ फल देते हैं। साथ ही, मांस-मदिरा का सेवन न करें, विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार के दिन सात्विक भोजन करें।
  9. अपने कर्मचारियों या कमजोर वर्ग के मजदूर लोगों का अपमान न करें और उनकी हमेशा सहायता करें।
  10. शुभ फलों को प्राप्त करने के लिए आप किसी अनुभवी ज्योतिषी की सलाह से नीलम रत्न धारण कर सकते हैं।

Q.ज्योतिष में शनि ग्रह का क्या महत्व है?

An. वैदिक ज्योतिष के अनुसार, शनिदेव को क्रूर ग्रह की संज्ञा दी जाती है। ऐसा उनके लिए इसलिए कहा जाता है कि, वे जातकों को उनके कर्मों के अनुरूप फल देते हैं। इसके अलावा उन्हें, पापी ग्रह भी मानते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि शनि से आपको केवल अशुभ फल ही नहीं मिलते। शनिदेव तो कर्म के अनुसार फल देते हैं।

Q. शनि ग्रह को कौन सी राशियों के स्वामी है?

An. शनि को मकर और कुंभ राशि का स्वामित्व प्राप्त है। इसलिए ये राशियां शनि की सबसे प्रिय राशियां मानी जाती हैं। जिन पर शनि की विशेष कृपा रहती है। इसके अलावा, वृषभ और तुला राशि शनि की मित्र राशियां हैं, जिनमें शनि उच्च के होते हैं।

Q. शनि की शुभता के लिए कौन सा रत्न शुभ है?

An. शुभ फलों को प्राप्त करने के लिए आप किसी अनुभवी ज्योतिषी की सलाह से नीलम रत्न धारण कर सकते हैं।

Q. कुंडली के कौन से भाव में शनि शुभ फलदायी हैं?

An. यदि कुंडली के पहले भाव यानी लग्न भाव में, शनि देव विराजमान हों तो, ऐसा जातक बहुत धनी होता है। अगर लग्न में शनि स्थित है और यह तुला, मकर  या कुंभ लग्न हो, तो ऐसे जातक राजा की सभी सुख-सुविधाओं और मान-सम्मान प्राप्त करते हैं।

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